हरियाणा मेल ब्यूरो
14/11/2017  :  09:29 HH:MM
दिल्ली की हवा पर एनजीटी की तलवार
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दि ल्ली सरकार ने वायु प्रदूषण की जानलेवा भयानकता को देखते हुए एक बार फिर सम-विषम कारें सडक़ों पर उतारने का फैसला लिया है। इसके मुताबिक सम और विषम नंबर वाले निजी वाहन एक-एक दिन के अंतराल से पांच दिन चलाए जाएंगे, लेकिन इस घोषणा के होते ही राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने इस फैसले पर अजीबो-गरीब ढंग से रोक लगा दी।
एनजीटी ने कहा है कि दिल्ली सरकार के इस आदेश पर वह प्रतिबंध तो नहीं लगा रहा है, लेकिन इस फॉर्मेले को उसकी अनुमति के बाद ही लागू किया जाए। अब इस द्विअर्थी इबारत का क्या अर्थ निकाला जाए ? एनजीटी की स्थापना बिगड़ते पर्यावरण को सुधारने के लिए की गई थी, बावजूद उसने यह विरोधाभासी आदेश
क्यों दिया यह समझ से परे है। एनजीटी ने दिल्ली में हेलीकॉह्रश्वटर से पानी छिडक़ाव की सलाह भी दी है। लेकिन यह सुझाव खर्चीला होने के कारण अप्रासंगिक है। हालांकि दिल्ली सरकार ने फायर बिग्रेडों के जरिए पेड़ों की धुलाई शुरू कर दी है। जिससे पेड़ों की वायु प्रदूषण सोखने की क्षमता बढ़ जाए। लेकिन यह उपाय कितना कारगर साबित होगा, यह कालांतर में पता चलेगा।

पिछले साल भी दिल्ली में सम-विषम फॉर्मूला लागू किया गया था। तब केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण वोट ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि ऐसे कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, जो यह साबित करे कि सम-विषम योजना लागू करने से वायु प्रदूषण नियंत्रित हुआ हो ? दिल्ली सरकार के साथ संकट यह भी है कि जब भी वह प्रदूषण नियंत्रण के परिप्रेक्ष्य में पहल करती है तो दिल्ली के उपराज्यपाल आदेश में रोड़ा अटका देते हैं। ऐसे में विवाद की स्थिति उत्पन्न होने पर सर्वोच्च न्यायालय भी यह दलील देता है कि उपराज्यपाल ही दिल्ली के संवैधानिक प्रमुख हैं। लिहाजा दिल्ली सरकार के लिए उनकी सहमति अनिवार्य है। अब सवाल उठता है कि क्यों नहीं कि जब दिल्ली में वायु घ्प्रदूषण की भयानकता के चलते जब 20 प्रतिशत रोगियों की वृद्धि एकाएक हो गई हो, तब उपराज्यपाल पर भी क्यों नहीं यह जुम्मेबारी डाली जाती कि वे इस समस्या के निदान की दिशा में पहल करें। यह तब और जरूरी हो जाता है। जब किसी महानगर के नागरिकों को घर से बाहर न निकलने की सलाह दी जाए।
सारे विद्यालय बंद करना पड़ें। ऐसा अकसर सांप्रदायिक तनाव या युद्ध की स्थिति बनने पर होता है। लेकिन देश की राजधानी धुंआ-धुंआ हुई दिल्ली को प्रदूषित वायु के कहर बरप जाने के कारण झेलना पड़ रहा है। इसके फौरी कारण हरियाणा, पंजाब व उत्तरप्रदेश के खेत में फसलों के जलाए जा रहे अवशेष बताए जा रहे हैं। डंठल जलाने कोई नई बात नहीं है, ये हजारों साल से चली आ रही परंपराए हैं। इसलिए सारा दोष इन पर मढऩा, मूल समस्या से ध्यान भटकाना है। असली वजह बेतरतीब होता शहरीकरण और दिल्ली में बढ़ते वाहन हैं। इन वाहनों से निकले धुंए की वजह से पहली बार पता चला है कि हम अपने पेड़-पौधों में कार्बन डाईऑक्साइड सोखने की क्षमता खो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के एक ताजा शोध स े भी पता चला ह ै कि वाय ु पद्र षू ण के चलत े दुि नया म ें 30 करोड ़ बच्चों को जहरीली हवा में सांस लेनी पड़ रही है। इस स्थिति के चलते भारत में प्रति वर्ष 25 लाख लोगों की मौतें हो रही हैं। यही स्थिती बनी रही तो दिल्ली से लोग पलायन को मजबूर हो जाएंगे। जाड़ों के शुरू होने से पहले और दीवाली के आसपास पिछले कई सालों से यही हालात पैदा हो रहे हैं। जागरूकता के तमाम विज्ञापन छपने के बावजूद न तो आतिशबाजी का इस्तेमाल कम हुआ और न ही पराली जलाने पर अंकुश लगा। पलारी जलाने पर तो जुर्माना वसूलने तक की बात कही गई थी। लेकिन ठोस हकीकत तो यह है कि किसानों के पास पलारी को जलाकर नष्ट करने के अलावा कोई दूसरा उपाय है ही नहीं। यदि केंद्र व राज्य सरकारें विज्ञापनों पर करोड़ों रुपए खर्च करने की बजाय पराली से आधुनिक ईंधन, जैविक खाद और मवेशियों का आहार बनाने वाली मशीनें धान की ज्यादा पैदावार वाले क्षेत्रों में लगवा देतीं, तो कहीं ज्यादा बेहतर था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने मन की बात कार्यक्रम में ठूंठ व कचरा नहीं जलाने की अपील की थी, लेकिन इस अव्यावहारिक नसीहत का कोई असर नहीं हुआ।

वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के नजरिये से पिछले साल राष्ट्रीय हरित पंचाट ने कई कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए थे। उनमें से बाहरी टक्र ो ं के शहर म ें पव्र श्े ा पर रोक लगान े की कोशिश की थी। निजी वाहनो ं के लिए प्रायोगिक तौर पर एक दिन सम और दूसरे दिन विषम कारें चलाने की योजना लागू की गई। ज्यादा डीजल खाने वाली नई कारों के पंजीयन पर आंशिक रोक लगाई गई थी। प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों के खिलाफ भी सख्ती बरतने की बात कही गई थी। दस साल पुरानी कारों को सडक़ों से हटाने के निर्देश दिए गए। लेकिन परिणाम शून्य रहा। यहां तक की वाहनों के बेवजाह इस्तेमाल की आदत पर भी अंकुश
लगाना संभव नहीं हो सका। मसलन बीमारी को जान लेने के बाद भी हम उसका इलाज नहीं कर पा रहे हैं। वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंचने की यही सबसे बड़ी विडंबना है। लिहाजा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन लगातार वायुमंडल में बढ़ रहा है।

अब तक तो यह माना जता रहा था कि वाहनों और फसलों के अवशेषों को जलाने से उत्पन्न होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने में पेड़-पौधों की अहम भूमिका रहती है। पेड़ अपना भोजन ग्रहण करने की प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं। यह बात सच भी है, मगर अब पहली बार देश और दुनिया में यह तथ्य सामने आया है कि बढ़ता प्रदूण पेड़-पौधों में कार्बन सोखने की क्षमता घटा रहा है। बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के लिए जिस तरह से पेड़ों को काटा जा रहा है, इस कारण भी पेड़ों की प्रकृति में बदलाव आया है। शहरों को हाईटैक एवं स्मार्ट बनाने की पहल भी कहर ढाने वाली है। वाहनों की अधिक आवाजाही वाले क्षेत्रों में पेड़ों में कार्बन सोखने की क्षमता 36.75 फीसदी कम पाई गई है। यह तथ्य देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान के ताजा शोध से सामने आया है। संस्थान की जलवायु परिवर्तन व वन आकलन प्रभाव विभाग के वैज्ञानिक डॉ हुकूम सिंह ने ’फोटो सिंथेसिस एनालाइजर’ से कर्बन सोखने की
स्थिति का पता लगाया गया है। लैगेस्ट्रोमिया स्पेसियोसा नाम के पौधे पर यह अध्ययन किया गया। इसके लिए हरियाली से घिरे वन अनुसंधान संस्थान और वाहनों की अधिक आवाजाही वाली देहरादून की चकराता रोड का चयन किया गया है। बाद में इन नतीजों का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद उपरोक्त स्थिति सामने आई। संस्थान के परिसर में पौधों में कार्बन सोखने की क्षमता 9.96 माइक्रो प्रति वर्गमीटर प्रति सेकेण्ड पाई गई। जबकि चकराता मार्ग पर पौधों में यह दर महज 6.3 रही।






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