हरियाणा मेल ब्यूरो
18/11/2017  :  11:13 HH:MM
मानसिक प्रदूषण ही पर्यावरण प्रदुषण हैं!
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सब जानवर और पशु-पक्षी आराम से अपना जीवन यापन कर रहे थे और जिसका जहाँ निवास था, रह रहे थे। न उनमे कुछ संचय करना, न वाहन और न खाने की चिंता और रखने की चिंता। न बैंक, न लेन देन की झंझट। मनुष्य भी बुद्धिमान जानवर हैं कारण ईश्वर ने बुद्धि दी। इस बुद्धि के कारण ही हमारे ऋषियों, मनीषियों ने इतने ग्रन्थ लिखे और मानव को समझाने ही में लगे रहे और आज भी सब नियम कानून मानव के लिए बने हैं।
हां पशु पक्षियों, पेड़ों, नदियों पहाड़ों के बचाव और संरक्षण के लिए भी कानून बने नाकि उलंघन के लिए। जानवरों, पशुपक्षियों के लिए कही भी गोदाम नहीं बनी और न वृक्ष ने अपने फसल के लिए भी। विगत 25 वर्षों में जब से व्यापार का खुलापन हुआ,बैंकों ने सुगम ऋण देना शुरू किया और स्वाभाविक रूप से आर्थिक
सम्पन्नता आयी तब से हमारा मष्तिष्क में दूषित भाव आया और हम भौतिकवादी हो गए इसके साथ हम प्रकृति से दूर होते गए हमने स्वयं अपनी मुसीबतों को आमंत्रण दिया। व्यक्ति को प्रगतिशील,आधुनिकतावादी होना चाहिए ।तथा उसे जीवनोपयोगी हर सामग्री का उपयोग और उपभोगकर्ता होना चाहिए इससे कोई इंकार नहीं करता पर एक सीमा में। आज हमने हर सीमा को असीमित कर दिया। धन का अधिक होना मनुष्य को एकांगी और एकान्तवादी बना देता हैं ।धन ने सबको बाँट दिया हैं और अब सब स्व केंद्रित होते जा रहे हैं,इसका मुख्य कारण आवश्यकता हैं।

शहर आज इतने विशालतम होते जा रहे हैं की नौकरी पेशा,व्यापारी,स्कूल कॉलेज,संसथान इतने दूर हो गए की हमें वाहनों का उपयोग जरुरी हो गया। इसी प्रकार आर्थिक समृद्धि से हर परिवार के सदस्य का निजी मकान,बंगला होना भी आवश्यक हैं ।समृद्धि के कारण हमारा रहना बहुत उच्चकोटि का होने से हमने जंगलों का दोहन किया यानि बेतहाशा जंगलों की कटाई की जिससे हमारे घर का फर्नीचर बना,पेड़ों के कटने से पशु पक्षियों की सुरक्षा घटी। इसको हमने स्व केंद्रित रखकर दूसरे से अपेक्षा की, वह नियमो का पालन करे, मैं तो कर रहा हूं। धन सम्पन्नता ने हमको उच्चतम दजऱ्े का स्वार्थी बनाया और हमारे देश में कानून का कोई विशेष अर्थ नहीं रहता हैं। धन सम्पन्न अपने प्रतिष्ठा के अनुरूप अपनी भौतिक सामग्री का संचय करता हैं उसके पास कोई सीमा नहीं होती ।एक घर में अनेक वाहन होना उनकी प्रतिष्ठा का सूचक हैं। होना भी चाहिए पर अब प्रदुषण होने पर रोना क्यों आ रहा हैं ?

इस प्रदुषण जो दिल्ली और उसके आसपास के अलावा सम्पूर्ण विश्व में इसका प्रभाव हैं इसका मूल कारण क्या हैं या क्या हो सकता हैं इसको समझने की जरुरत हैं । यह हमारे मन की उपज हैं हमने अपने मन को अपने शरीर और भावनाओ पर इतना अधिक प्रभावशाली बना लिया हैं की उसके प्रभाव से वंचित न होकर उसके गुलाम हो गए। हमने अपने आपको अमर्यादित बना लिया हैं जबकि हमने अपनी कंपनी को लिमिटेड बनाया क्यों ? हम खाने पीने में, वाहन चलाने में सीमा क्यों रखते हैं ? कारण हमें जि़ंदा रहना हैं पर हमारी अनियमितता या असीमितता से हमने कितने जंगल,पशु पक्षियों को मारा और उजाड़ा।इसका दर्द हमको नहीं होता क्योकि हम हृदयहीन हो गए हैं, स्वार्थी हो गए हैं।






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