हरियाणा मेल ब्यूरो
05/12/2017  :  10:00 HH:MM
क्या कांग्रेस का होगा पुनर्जन्म ?
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कां ग्रेस में एक नए युग की शुरुआत होने जा रही है। राहुल गांधी के नामांकन के साथ ही ये तय हो गया है कि वे कांग्रेस के अध्यक्ष होंगे। यूं तो वर्ष 2013 में ही तय हो गया था कि सोनिया गांधी के बाद कौन कांग्रेस का ताज संभालने जा रहा है। जयपुर के चिंतन शिविर में जब उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया था उसी समय से पार्टी के तमाम फैसलों में उनकी मुहर लगनी जरूरी हो गई थी। फिर भी एक आवरण बना हुआ था।

सत्ता में सोनिया गांधी की अगुवाई में एक केंद्र भी अलग बना हुआ था। संगठन के शीर्ष पर बैठी सोनिया गांधी ने तमाम बुजुर्ग नेताओं के पार्टी में अचानक अप्रासंगिक होने की आशंका पर विराम लगाया। साथ ही बीते चार सालों में वे अपने संरक्षण में राहुल गांधी को नई जिम्मेदारी के लिए तैयार करती रहीं। उन्होंने पार्टी के बुजुर्ग नेताओं और राहुल गांधी की युवा टीम के बीच की खाई को भी पाटने का प्रयास किया। यही वजह है कि आज जब राहुल नई जिम्मेदारी संभालने जा रहे हैं तो पार्टी में विरोध के सुर बड़े नेताओं की ओर से नही उठे। भाजपा को भी राहुल गांधी पर विवाद खड़ा करने के लिए ऐसा चेहरा तलाशना पड़ा जो स्वयम्भू तरीके से कांग्रेस का प्रवक्ता बना रहा। कांग्रेस पूरी तरह से नए नेतृत्व के साथ आगे बढऩे को तैयार है। लेकिन आगे क्या होगा ये बहुत हद तक राहुल गांधी के कौशल, उनकी काबिलियत, व्यवहार और जनसमर्थन पर तय होगा। उनकी ताजपोशी के बाद सोनिया गांधी पार्टी में नेपथ्य में चली जायेगी। राजनीति का यही स्वीकार्य पैमाना भी है। अब सोनिया गांधी चाहकर भी राहुल के फैसलों और उसके प्रभाव पर कोई आवरण नहीं डाल सकेंगी। इसलिए अगर कुछ अच्छा हुआ तो कांग्रेस ताकत के साथ एक नई राह की ओर चल पड़ेगी। अगर गलतियां हुईं, सही समझदार लोगों के बजाए चाटुकारों की जनसमर्थन विहीन जनता से कनेक्ट न रखने वाले नेताओं की फौज तैयार की गई तो पार्टी को और भी बुरा वक्त देखने के लिए तैयार रहना होगा। राहुल गांधी मेहनती हैं। वे कांग्रेस महासचिव बनने के बाद जब यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई के प्रभारी बने उसी वक्त से उन्होंने एक अलग राह पर चलने का माद्दा दिखाया। यूथ कांग्रेस में चुनाव की परंपरा उन्होंने शुरू की। हालांकि पार्टी में नेता
पुत्रों और धनबल वाले नेताओं ने इन चुनावों में भी अपने बर्चस्व का तरीका खोज लिया। कई चुनाव पर विवाद भी हुए। लेकिन राहुल गांधी की नीयत पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। इसी तरह पार्टी का उपाध्यक्ष बनने के बाद राहुल ने पहले भाषण में ही स्पष्ट कर दिया था कि वे लीक पर चलने वाले नही हैं। उन्होंने पार्टी को एक नए ढर्रे पर ले जाने का संकेत दिया था। राहुल गांधी जनता से सीधे कनेक्ट में भरोसा करते हैं। वे छवि को लेकर भी खासे सजग हैं। भ्रष्टाचार का समर्थन करने वाले कथित अध्यादेश को शायद इसी नीयत से उन्होंने फाड़ कर फेंका था कि इससे भ्रष्ट लोगों का बचाव होगा। लेकिन उनका अंदाज विवादों के घेरे में आ गया। इसी तरह कई बार वे सरकार को सही मुद्दों पर घेरने की कोशिश करते हैं। लेकिन शब्द और उनको भाव भंगिमा साथ नहीं देती। उनपर ये आरोप भी लगे कि वे कई बार पार्टी के बड़े नेताओं को भी मिलने का वक्त नहीं देते। अगर ऐसा नही होता तो असम में हेमंत विश्वा कांग्रेस का साथ छोडक़र नहीं जाते।

उत्तराखंड में विजय बहुगुणा,उत्तरप्रदेश में रीता जोशी और गोवा में विश्वजीत सबकी शिकायत उनसे कमोवेश एक जैसी थी। वे मिलते नहीं, मिलते हैं तो तवज्जो नहीं देते। लेकिन राहुल को नजदीक से जानने वाले समझते हैं कि वे कुछ मामलों में झुकना पसंद नही करते। अगर उन्होंने किसी के बारे में विपरीत राय बना लें तो उससे
समझौता नहीं करते। कई बार वक्त खराब हो तो ये चीजें विपरीत हो जाती हैं। लेकिन वक्त अच्छा हो तो यही अद्भुत गुण भी बन जाता है। खैर देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी ज्यादा परिपक्वता और तेवर के साथ पार्टी को मजबूती दे सकें। जनता की उम्मीदों को बेहतर तरीके से समझकर पार्टी को उसके अनुरूप ढाल सकें। मेरी शुभकामनाएं। उम्मीद करते हैं एक नई कांग्रेस का जन्म होगा।






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