समाचार ब्यूरो
06/12/2017  :  09:55 HH:MM
चाबहार का रणनीतिक रास्ता
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निर्विवाद है कि चाबहार परियोजना का हिस्सा बनकर भारत ने एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक पहल की। परमाणु विवाद को लेकर ईरान पर लगे पश्चिमी प्रतिबंधों से इसे आगे बढ़ाने में देर हुई। मगर पाबंदियां हटते ही काम तेजी से हुआ। नतीजतन, रविवार को ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी के हाथों इसके पहले चरण का उद्घाटन हुआ।

इस बंदरगाह से मध्य एशियाई देशों से कारोबार के लिए भारत की पाकिस्तान पर निर्भरता समाप्त होगी। साथ ही बिना पाकिस्तानी रास्तों का इस्तेमाल किए जमीनी रास्ते से अफगानिस्तान तक पहुंचा जा सकेगा। भारत ने चाबहार बंदरगाह के निर्माण में 50 करोड़ डॉलर का निवेश किया है। यानी इसमें भारत का आंशिक  स्वामित्व है। इसके अलावा भारत इस बंदरगाह तक पहुंचने के मार्गों के निर्माण से भी जुड़ा है। ईरान में एक अरब 60 लाख डॉलर के निवेश से बन रहे जहेदान-चाबहार रेल मार्ग में भी उसकी भागीदारी है। यह कहना तो अतिशयोक्ति होगी कि इन मार्गों के जरिए भारत चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को चुनौती दे सकेगा। इसके बावजूद इसके जरिए उसने अपने लिए वैकल्पिक मार्ग बनाने की दिशा में अहम कदम बढ़ाया है। अफगानिस्तान का पहलू इसके अतिरिक्त है। अफगानिस्तान में विभिन्न प्रकार के निर्माण एवं सहायता कार्यों से भारत जुड़ा हुआ है।

जबकि पाकिस्तान नहीं चाहता कि अफगानिस्तान में भारत की कोई भूमिका हो। वह इल्जाम लगाता रहा है कि अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति बनाकर भारत पाकिस्तान में अस्थिरता फैलाने में लगा रहा है। इसके मद्देनजर बिना पाकिस्तानी भू-मार्ग का उपयोग किए अफगानिस्तान तक पहुंचने की सुविधा प्राप्त होना भारत के
लिए एक रणनीतिक सफलता है। इससे अफगानिस्तान भी कराची बंदरगाह के जरिए अपना सारा व्यापार करने की मजबूरी से मुक्त हो जाएगा। इससे वह पाकिस्तान के बरक्स अधिक स्वतंत्र नीति अपना सकेगा। गौरतलब है कि चाबहार बंदरगाह ग्वादार बंदरगाह से पहले तैयार हो गया। वहां सिर्फ 80 किलोमीटर की दूरी पर चीन ग्वादार बंदरगाह मध्य एशिया से कारोबार को ध्यान में रखकर ही बना रहा है। अब चूंकि चाबहार वैकल्पिक मार्ग के रूप में विभिन्न देशों को उपलब्ध होगा, तो उससे ग्वादार को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। भारत के लिए इस बंदरगाह के महत्त्व इससे भी जाहिर है कि इसके उद्घाटन से ठीक पहले रूस यात्रा से लौटते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज शनिवार को ईरान में रुकीं। बहरहाल, इसके पूरे फायदे तभी भारत को मिलेंगे, अगर ईरान से उसके संबंध मधुर बने रहे।






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