समाचार ब्यूरो
23/01/2018  :  18:49 HH:MM
क्या केवल गरीब ही है सबसे बड़ा ‘मुजरिम’?
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गत् 70 वर्षों से देश में लोकतंत्र के होने के बावजूद खासतौर पर सत्ता विरोधी दलों द्वारा यही बताने व जताने की कोशिश की जाती है कि सत्ता में बैठी सरकार पूंजीवादियों, उद्योगपतियों तथा कारपोरेट के हितों का ध्यान रखने वाली सरकार है। कई उत्साही नेता तो यह तक कह देते हैं

कि यह सरकार ही पूंजीवादी व्यवस्था का पोषण करने वाली तथा गरीबों का खून चूस कर उद्योगपतियों का पेट भरने वाली सरकार है। आिखर क्या वजह है कि देशभर में चुनाव के दौरान गरीबों, मज़दूरों, किसानों, बेरोजग़ारों तथा समाज के दबे-कुचले व पिछड़े वर्ग के लोगों के विकास तथा उत्थान की बात करने वाली सरकारें चाहे वह किसी भी विचारधारा की सरकारें क्यों न हों, चुनाव जीतने के बाद गरीबों व पिछड़ों तथा आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों के हितों के बारे में सोचने के बजाए उद्योगपतियो ं तथा कारपोरटे  घरानो ं के लोगो ं के हितो ं के बार े म ें ही क्यो ं सोचती हैं? क्या वजह है कि चुनाव में जिन नेताओं के हाथ जोडक़र
जनता से विनम्र मुद्रा में वोट मांगते हुए प्रकाशित किए गए पोस्टर तथा विज्ञापन हर गली-कूचों में दिखाई देते हैं चुनाव जीतने के बाद पांच वर्षों तक उसी नेता की मुद्रा पूरे अहंकार से भरी हुई होती है। आमतौर पर एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने कार्यकाल के दौरान अकूत धनार्जन करने, संपत्तियों पर कब्ज़ा करने, अपने परिजनों, रिश्तेदारों तथा साथियों को लाभ पहुंचाने और अपनी दबंगई का लोहा मनवाने की कोशिश में लगा रहता है। चुनाव के बाद उसे न तो आप हाथ जोड़े देख सकेंगे न ही वह विनम्रतापूर्वक आपके दरवाज़े पर आपकी समस्याओं को पूछने के लिए कभी दस्तक देता हुआ दिखाई देगा।

सवाल यह है कि जब लोकतांत्रिक व्यवस्था के नाम पर गरीबों, पिछड़ों, बेरोजग़ारों व शोषित समाज के लोगों को ‘ठगने’ की यह प्रक्रिया गत् सात दशकों से चली ही आ रही है फिर भी यह वंचित समाज आखिर बार-बार इनके झांसों में कैसे आ जाता है? आज जो गरीब, वंचित समाज अपने रोजग़ार, मंहगाई तथा सरकारी बेरुखी का शिकार है वह आने वाले समय में सत्ता के इन्हीं माहिर खिलाडिय़ों में से किसी एक को स्वयं ही फिर चुन बैठेगा और एक बार फिर बदस्तूर उनका लूटना- खसोटना और गरीब जनता का त्राहि-त्राहि करना जारी रहेगा। दरअसल जिस दिन जनता ने इस बात को बखूबी समझ लिया कि आिखर विभिन्न दलों व तथाकथित विचारधारा के नेताओं ने किस प्रकार हमारा ध्यान कभी भावनाओं के नाम पर कभी दिखावापूर्ण झूठे राष्ट्रवाद के नाम पर तो कभी धर्म व जाति के नाम पर उकसा कर कभी राम-रहीम और ईश्वर- अल्लाह के चक्करों में डालकर अपनी आडंबरपूर्ण चालों में उसे उलझा रखा है और सिर्फ इसलिए गरीबों का खून चूस कर उद्योगपतियों की झोली भरी जाती रही है ताकि गरीबों को उकसा, भडक़ा व बहका कर वोट हासिल किया जा सके और पार्टी फंड के नाम पर अथवा अपने व अपने परिवार के गुजऱ-बसर के लिए इन्हीं उद्योगपतियों से समय-समय पर मनचाही रकम ऐंठी जा सके। गोया गरीब जनता ने इन्हें लूटने के योग्य बनाया और इन्होंने गरीबों को ही लूटना और अमीरों व पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाना शुरु कर दिया। इन दिनों देश के लोगों को तरह-तरह की बातों में उलझाकर नए-नए सपने दिखाए जा रहे हैं। मार्किंटिंग, उत्सव तथा आयोजनों पर विश्वास करने वाली वर्तमान सरकार कहीं गीता महोत्सव मनाने में व्यस्त है तो कहीं गंगा सफाई जैसी मुहिम छेड़ रखी है। शहरों के सौंदर्यीकरण के नाम पर उन रेहड़ी वालों तथा फुटपाथ वाले दुकानदारों को उजाड़ दिया गया है जो अपनी छोटी सी पूंजी से सामान खरीदकर सुबह से शाम तक सर्दी-गर्मी और बारिश के दौरान खुले आसमान के नीचे अपना सामान बेचकर अपने परिवार का गुजऱ-बसर किया करते थे। क्या कोई ऐसी सरकार जो गरीबों को रोजग़ार देने की क्षमता तो न रखती हो परंतु यदि कोई व्यक्ति अपने संबंधों के आधार पर अपने साथी मित्रों से कुछ पैसे उधार लेकर स्वरोजग़ार करना चाहे तो सरकार उसे भी बर्दाश्त नहीं कर सकती? आखिर क्या कुसूर है इन मेहनतकश बेरोजग़ार, गरीब दुकानदारों का जिन्हें अपनी रोज़ी-रोटी की खातिर सडक़ों पर अनशन करने के लिए बैठना पड़ता है? पिछले दिनों अंबाला शहर के सिटी पार्क के समीप एक ऐसा ही अनशन रेहड़ी व फुटपाथ के दुकानदारों द्वारा किया गया। कडक़ड़ाती सर्दी की शीतलहरी से भरी इस रात में जिस समय यह बेरोजग़ार लोग खुले आसमान के नीचे सरकार के समक्ष अपने जीविकोपार्जन का सवाल लेकर बैठे थे ठीक उसी समय दिल्ली में भारत-इस्राईल के संबंधों के द्वारा देश के उज्जवल भविष्य पर समीक्षाएं भारतीय मीडिया द्वारा पेश की जा रही थीं। जब इनमें से एक अनशनकारी से इस्राईली प्रधानमंत्री के विषय में पूछा गया तो उसने साफ कहा कि हम गरीबों, मज़दूरों को किसी देश के प्रधानमंत्री या उसके संबंधों से क्या लेना-देना। हर गरीब की पहली ज़रूरत रोटी-कपड़ा और मकान है। नंगे-भूखे व शोषित तथा प्रताडि़त रहकर इजऱाईल से संबंध बेहतर बना कर आखिर हम क्या करेंगे? हमारे ही देश में प्रचलित कहावत है- ‘भूखे भजन न होत गोपाला’ परंतु सरकार भूखे लोगों से ही ‘भजन’ करवाने पर तुली हुई है।

सडक़ों पर स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत् सैकड़ों करोड़ रुपये प्रचार तंत्र पर खर्च किए जा रहे हैं। 38 हज़ार रुपये मूल्य में सरकार गीता की एक प्रति खरीद रही है। इन दिनों आदि-बद्री के उद्गम की कथा का प्रचार करने का जि़म्मा भी हरियाणा सरकार के प्रचार तंत्र ने उठा लिया है। परंतु इन सब शोर-शराबों तथा आम लोगों की भावनाओं से जुड़े ऐसे विषयों को उठाकर सरकार गरीबों को भूखा मरने यहां तक कि भूख हड़ताल पर बैठने के लिए बाध्य कर रही है। हम सब अनेक आर्थिक विश्लेषकों के मुंह से अक्सर सुनते रहते हैं कि किस प्रकार कौन-कौन पूंजीपति किन-किन नेताओं के सहयोग, संरक्षण व माध्यम से देश के बैंकों को चूना लगा रहे हैं। और इसी के साथ-साथ हमने यह भी देखा है कि किस प्रकार देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने अपने बचत खाताधारकों के लिए न्यूनतम जमा धनराशि तीन हज़ार रुपये निर्धारित कर दी है। प्रत्येक तीसरे महीने बैंक द्वारा पेश किए जाने वाले आंकड़ों के अनुसार सैकड़ों करोड़ रुपये खाताधारकों द्वारा न्यूनतम 
धनराशि न रख पाने के कारण वसूले गए। केवल अप्रैल से नवंबर 2017 के मध्य एक हज़ार सात सौ इकहतर करोड़ रुपयों की वसूली गरीब खाताधारकों से की गई। आखिर उनका कुसूर क्या यही है कि वे तीन हज़ार रुपये जैसी मामूली सी रक़म अपने खाते में नहीं रख सकते इसलिए जब-जब उनका न्यूनतम शेष तीन हज़ार से कम होगा हर बार उन गरीब खाताधारकों को इसका भुगतान करना पड़ेगा? क्या सरकार की इन नीतियों से यह ज़ाहिर नहीं होता कि सरकार गरीबों को ही देश का सबसे बड़ा मुजरिम समझती है?






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