समाचार ब्यूरो
06/02/2018  :  17:19 HH:MM
आजादी और अमन के मसीहा : खान अब्दुल गफ्फार खान
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खान अब्दुल गफ्फार खान का जन्म पख्तूनख्वा पाकिस्तान में 6 फरवरी 1890 उत्तमान जई के एक समृद्ध परिवार में हुआ । आजादी की लड़ाई का सबक अब्दुल गफ्फार खान ने अपने दादा सैफुल्लाह खान से सीखा था, जो स्वयं लड़ाकू स्वभाव के होने से पठानों पर अंग्रेजों के आक्रमण के समय हमेशा अंग्रेजों के विरुद्ध मदद में जाते थे ।छुट्टियों में समाज सेवा और शिक्षा समाप्ति के बाद देश सेवा ही उनका मुख्य काम था।

वह सीमाप्रांत और बलूचिस्तान के एक महान राजनेता थे ,जो एक राजनेतिक ,अहिंसावादी, आध्यात्मिक नेता और महात्मा गांधी के करीबी मित्र थे। गांधीजी के समान अहिंसावादी होने के कारण इन्हें ‘सीमांत गांधी’ और ‘सरहदी गांधी’ बचपन से ही द्रढ़ स्वभाव होने के कारण ‘बच्चा खान’, ‘बादशाह खान’ और इनके महिला अधिकारों और अहिंसा के समर्थन जैसे सिद्धांतों के कारण भारत में ‘फ्रंटियर गांधी’ के नाम से भी पुकारा जाता है । यह स्वतंत्रता संग्राम के महान नेता तथा ‘स्वतंत्र पख्तूनिस्तान आंदोलन के प्रणेता’ थे। नवंबर 1929 में इन्होंने महात्मा गांधी जी के अहिंसा और सत्याग्रह जैसे सिद्धान्तों से प्रेरित होकर भारत की आजादी व धर्मनिरपेक्षता हेतु ‘खुदाई खिदमतगार’ (अर्थात भगवान के दास , जिसे ‘सुरखपोश’ नाम से भी जानते हैं) नामक सामाजिक संगठन की शुरुआत की ,जिसके लगभग 1,00,000 सदस्य बने और जिसने सरहद के पठानों को अहिंसा का रास्ता दिखाया जो इतिहास में ‘लड़ाके’ के नाम से जाने जाते थे। ‘कांग्रेस कार्य समिति’ के सदस्य बनने के बाद कांग्रेस और खुदाई खिदमतगार दोनो ने 1947 तक मिलजुलकर काम किया। उन्होंने हड़तालों व अहिंसात्मक प्रतिरोध के द्वारा अंग्रेजी पुलिस और सेना का विरोध कर अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ा दी और ‘ख़ईबर-पख्तूनख्वा’ की प्रमुख राजनेतिक शक्ति बन गए । बादशाह खान,
1930 में ‘नमक सत्याग्रह’ में भाग लेने की बाबत जेल गए और वहां उन्होंने सभी मजहबों की किताबों को पढ़ा। बाद में 1931 में जेल से छोड़े जाने पर वह सामाजिक कार्य में संलग्न हो गए ।वह अपनी मूल संस्कृति से विमुख नहीं हुए, इसी वजह से वह भारत के प्रति अत्यधिक सनेहभाव रखते थे। गफ्फार खान साहब का निधन 20 जनवरी ,1988 में पेशावर के घर में हुआ (जहां यह नजर बंद थे) और उनकी इच्छानुसार उन्हें जलालाबाद ,अफगानिस्तान स्थित उनके घर में दफनाया गया। उनके अंतिम संस्कार में 2 लाख से भी ज्यादा लोग शामिल हुए जो उनके महान व्यक्तित्व को दर्शाता है । सन 1987 मे भारत सरकार द्वारा उन्हें सर्वोच्च नागरिक
सम्मान ‘भारत रत्न से नवाजा गया। - सोनू चौधरी






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