समाचार ब्यूरो
07/02/2018  :  11:44 HH:MM
पार्टीविहीन लोकतंत्र और अन्ना हजारे
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अन्ना हजारे चाहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र पार्टीविहीन बन जाए। पांच-छह साल पहले एक विवाह-समारोह में वे मेरे पास आकर बैठ गए और मुझसे पूछने लगे कि इस मुद्दे पर आपका क्या विचार है ? मैंने पूछा कि पार्टियां राजनीति करें, इसमें आपको क्या-क्या एतराज हैं ? उनका जो तर्क उन्होंने मुझे उस समय दिया, वही अभी उन्होंने अखबारों में भी बोल दिया है।

उनका एक मात्र और मुख्य तर्क यह है कि संविधान में कहीं भी पार्टी-व्यवस्था का जिक्र तक नहीं है। धारा 84 (ख) कहती है कि कोई भी भारतीय नागरिक जो 25 साल का हो, वह विधानसभा और लोकसभा का चुनाव लड़ सकता है। तो बताइए, यहां पार्टी कहां से आ गई ? अन्ना से मैं यह उम्मीद नहीं करता हूं कि वे कोई लेख लिखकर या व्याख्यान देकर अपनी बात सिद्ध करेंगे। लेकिन मैंने जब उन्हें बताया कि ब्रिटेन में तो कोई लिखित संविधान ही नहीं है तो वे आश्चर्यचकित रह गए। मैंने उनसे कहा कि इस आधार पर क्या ब्रिटिश संसद और मंत्रिमंडल को अवैध घोषित कर दिया जाए ? अन्ना इन सब बारीकियों में नहीं जा सकते लेकिन उनकी
मूल चिंता सही है कि पार्टीबाजी के कारण लोकतंत्र कभी-कभी एकदम चौपट हुआ-सा लगता है।

पार्टी चलाने के लिए भयंकर भ्रष्टाचार करना पड़ता है। सभी पार्टियों को अपनी विरोधी पार्टियों का जबर्दस्ती विरोध करना पड़ता है। पार्टियां अक्सर प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां बन जाती हैं, जैसी कि आजकल भारत की प्रमुख पार्टियां बन गई हैं। लोकशाही तानाशाही में बदलने लगती है। ये पार्टियां गिरोहों की तरह काम करती हैं। उनके सदस्यों को अपने अंत:करण को ताक पर रखकर मवेशियों की तरह थोक-व्यवहार का हिस्सा बनना पड़ता है। इन तर्कों के आधार पर पार्टीविहीन लोकतंत्र की मांग की जा सकती है लेकिन उससे जितनी समस्याएं हल होंगी, उनसे ज्यादा पैदा हो जाएंगी। तब बहुमत और अल्पमत का महत्व लगभग नहीं के बराबर रह जाएगा। सारे निर्णय सर्वसम्मति के आधार पर करने होंगे। अन्य कई संवैधानिक समस्याएं भी खड़ी हो जाएंगी। ऐसी स्थिति में जरुरी यह है कि दलीय लोकतंत्र को अधिक स्वस्थ और सुदृढ़ बनाने का प्रयत्न किया जाए।






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