समाचार ब्यूरो
10/02/2018  :  11:46 HH:MM
जब गांधी जी ने साधुओं से सवाल किया...!
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उत्तर प्रदेश में हो रहे दंगों में मीडिया रिपोर्ट़ों अक्सर सत्ता दल पर ही दंगा भडक़ाने के आरोपों की झड़ी लगा रही हैं। कासगंज हिंसा को लेकर बरेली के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट से लेकर अन्य तमाम लोग इस मामले में संघ परिवार को घेर रहे हैं और संघ परिवार भा.ज.पा. भी इस मामले में बेफिक्र है क्योंकि इससे उसका वोट बैंक और मजबूत होने की संभावना जो है।

दुख और हैरत की बात है कि ये सब तिरंगा यात्रायें व अन्य यात्राओं की आड़ में किया जा रहा है। वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक कृष्ण प्रताप सिंह ने अपने एक लेख में लिखा है कि बाल गंगाधर तिलक के निधन के बाद स्वतंत्र आंदोलन को नये सिरे से संजोने की जिम्मेदारी संभाल रहे महात्मा गांधी 10 फरवरी 1921 को बनारस में काशी विद्यापीठ के शिलान्यास के बाद ट्रेन से फैजाबाद पहुंचे। उनका इरादा अयोध्या जाकर साधुओं और संतों को स्वाधीनता आंदोलन से जोडऩा था। अपने आराध्य "रामराजा" की जन्मभूमि की ये गांधीजी की पहली यात्रा थी। 11 फरवरी को सुबह 11 बजे अयोध्या में साधुओं की सभा में उन्होंने साफ-साफ कहा भारतवर्ष में 56 लाख साधु हैं। ये सभी बलिदान के लिये तैयार हो जायें तो अपने तप व प्रार्थना से भारत को स्वतंत्र करा सकते हैं। गांधीजी ने आगे कहा कि लेकिन ये "अपने साधुत्व के पथ से हट चुके हैं। इसी प्रकार मौलवियों ने भी केवल हिन्दू और मुसलमानों को आपस में लड़ाया है। मैं दोनों से कह रहा हूँ। यदि आप अपने धर्म से वंचित हो जायें, विधर्मी हो जायें और अपना धर्म समाप्त कर दें तब भी ईश्वर का ऐसा कोई आदेश नहीं हो सकता जो आप लोगों को ऐसे दो लोगों के बीच शत्रुता उप्तन्न करने की अनुमति दे जिन्होंने एक दूसरे के साथ कोई गलती नहीं की है।" दक्षिण के हीरो आगे हैं आज सारे देशभर में संघ परिवार नफरत की सियासत करने का एक बड़ा संस्थान बनता जा रहा है। मुस्लिमों के खिलाफ नफरत के बाद वो खान पान पर रोक लगाने से लेकर मनोरंजन के साधनों को भी प्रभावित करके उन्हें अपनी दादागिरी से डरा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय जैसी संस्थान को भी वो बंदी बनाने पर तुला है। आम जनता में बेचैनी है कि वो अब धीरे-धीरे अपने खानपान, रीति-रिवाजों व मनोरंजन साधनों पर भी पहरा बैठाने वालों से डर कर रहें, नफरतों को बढ़ाने वालों के खिलाफ जहां मीडिया व सर्वोच्च न्यायालय मुखर है पर फिल्मी जगत की बड़ी हस्तियां अभी भी मौन हैं, सिर्फ अपने स्वार्थ़ों के चलते वरना यदि वो आगे बढ़ जायें तो देशभर में आम लोग, दलित वर्ग के, पिछड़े वर्ग के वामपंथी आदि सभी उनके साथ आ जायेंगे और बिहार चुनावों की तरह उनकी फिर से हवा बंद हो सकती है। दक्षिण भारत के फिल्मों के कलाकार नफरत फैलाने वालों और दंगा फैलाने वालों को जवाब देने में काफी आगे रहते हैं। नफरतों और हिंसा की सियासत के खिलाफ दक्षिण भारत के सितारे प्रकाश राज ने जो बयान दिये वो काबिले तारीफ हैं।
कमल हसन, रामाराव, एम.जी.आर आदि लोगों ने अपनी आवाज समय-समय पर जनता के लिये उठाइऔ। नतीजे में नफरतबाज दक्षिण में पनप नहीं पाये। यदि उत्तर भारत में समाजवादी पार्टी व बहुजन समाजवादी पार्टी वाले एक हो जायें तब भी उनका गुब्बारा फट जाये पर ऐसा होने में कुछ देर लग रही है। गांधी के विचारों पर चलने की बातें करने वाली कांग्रेस ने कभी गांधी के विचारों को समझा नहीं और ना ही उसका प्रचार-प्रसार ही किया वरना आज देश में डर, हिंसा और नफरतों के व्यापारी इतने सम्पन्न नहीं बन पाते। गांधी के रास्ते पर चलने की कांग्रेस अब तो कुछ सोचे। गांधीजी ने हरिद्वार में साधु संतों से बड़ा स्पष्ट कहा था कि यदि गाय की रक्षा के लिये मुसलमानों की हत्या करते हैं तो उन्हें हिन्दू धर्म का परित्याग कर देना चाहिये। हिन्दुओं को इस प्रकार के निर्देश कहीं भी नहीं दिये गये हैं। कलकत्ता के हमारे मारवाड़ी भाइयों ने मुझे कसाइयों के हाथों से दो सौ गायों की रक्षा के लिये कहा था। मैने कहा मैं एक भी गाय की रक्षा नहीं करूँगा जब तक कसाइयों
को ये न बता दिया जाये कि वो बदले में कौन सा नया पेशा अख्तियार करें क्योंकि वो जो करते हैं हिन्दुओं की भावना को ठेस पहुंचाने नहीं करते।

बम्बई में कसाइयों से चर्चा : बम्बई में क्या हुआ?  गांधीजी बोले कसाइयों के पास सैकड़ों गायें थीं। कोई भी हिन्दू उनके पास नहीं गया। खिलाफत कमेटी के लोग गये और उन्होंने कहा ये ठीक नहीं है। वे गायें छोड़ दें और बकरियां खरीदें। कांग्रेसियों ने सब गायें समपर्तित कर दीं। किसी को भी एक पैसा नहीं देना पड़ा। इसे गाय
की रक्षा कहते हैं। उन्होंने कहा कि किसी जानवर की रक्षा का तात्पर्य निर्बल एवं असहाय की रक्षा से है। भारत में गाय की रक्षा का कानून 1980 में ही बना दिया गया है। इस पर पालन भी काफी हद तक हो रहा है पर सियासत के लिये, सत्ता के लिये फिर उसका नाम लेकर हत्यायें की जा रही हैं। जिसके मामले में सर्वोच्च न्यायालय व मीडिया का बड़ा तब्का लड़ाई भी लड़ रहा है व नफरतों के व्यापारी इन संस्थाओं को कमजोर बनाने पर तुले हैं। गोवा के मुख्यमंत्री मीट की वकालत करते हैं और उत्तर प्रदेश के कुछ चरमपंथी नफरतबाज इस मामले को लेकर देश में दंगा फैलाना चाहते हैं। आखिर ये कब तक चलेगा? हमारे नौजवानों को सोचना होगा।






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