समाचार ब्यूरो
11/02/2018  :  18:34 HH:MM
महिला अस्मिता : दर्पण झूठ न बोले
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अब तो हमारे ही देश के अनेक ईमानदार व स्पष्टवादी लेखकों, चिंतकों तथा बुद्धिजीवियों द्वारा स्वयं यह स्वीकार किया जाने लगा है कि हम भारतवासी दोहरे मापदंड अपनाते हैं तथा अपने जीवन में दोहरे चरित्र का आचरण करते हैं। भ्रष्टाचार में संलिप्त कोई भी दूसरे व्यक्ति को भ्रष्टाचार से दूर रहने का भाषण पिलाता है, दुष्कर्मी व दुराचारी स्वयंभू संत संसार को सद्चरित्रता का उपदेश देता है।

रिश्वतखोर व्यक्ति दूसरों से ईमानदारी बरतने की उम्मीद रखता है। धन-संपत्ति का भूखा साधू दूसरों को माया मोह से विरक्त रहने की सीख देता है। महिलाओं का अपमान, तिरस्कार व निरादर करने वाले लोग महिलाओं के मान-सम्मान की दुहाई देते हैं। दिन-रात अनैतिकता के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति नैतिकता का पाठ
पढा़ ता ह।ै इस पक्र ार के सकै डो़ ं एसे े उदाहरण ह ंै जो यह साबित करत े ह ंै कि हमारा समाज किस प्रकार अपने जीवन में दोहरा आचरण अपनाता है। ऐसा ही एक सर्वप्रमुख विषय जिसपर हमारे देश में हमेशा चर्चा छिड़ी रहती है वह है स्त्री के मान-सम्मान, उसके आदर व अस्मिता का विषय। जा़ हिर ह ै इस विषय पर भी हमार े दश्े ा का परुु ष समाज वसै ा ही या उसस े भी बढक़र दोहरा चरित्र रखता है जैसाकि दैनिक जीवन के अन्य विषयों में रखता आ रहा है।

हमारी प्राचीन संस्कृति तथा हमारे धर्म-शात्र महिलाओं के प्रति कैसा नज़रिया रखते थे यह बात भारतीय संस्कृति में खासतौर पर हिंदू धर्म में स्वीकार्य अनेक पूज्य देवियों से साफ पता चलती है। इन देवियों के अतिरिक्त धर्म व इतिहास से जुड़ी अनेक गाथाएं भी ऐसी हैं जो महिलाओं की अस्मिता, उनके शौर्य, साहस तथा उनके सद्चरित्र का बखान करते हैं। यहां तक कि दुर्गा पूजा के दिनों में होने वाले कन्या पूजन के दिन तो केवल कुंआरी बालिकाओं को ही पूजने की परंपरा हिंदू समाज में चली आ रही है। राजनैतिक स्तर पर भी यदि हम देखें तो प्राय: दोहरा चरित्र अपनाने वाले राजनीतिज्ञ भी दिखावे के लिए ही क्यों न सही परंतु कभी- कभी महिलाओं को ‘आधी आबादी’ कहकर संबोधित करते नजऱ आते हैं तथा उन्हें समाज के प्रत्येक क्षेत्र में बराबर का आरक्षण दिए जाने की परै वी भी करत े रहत े ह।ंै यह और बात ह ै कि अभी हमार े दश्े ा म ें महिलाओ ं को 33 प्रतिशत वह आरक्षण भी पूरी तरह से नहीं दिया जा सका जिसके लिए न केवल महिलाएं बल्कि पुरुष भी काफी लंबे समय से संघर्षरत हैं। परंतु यदि हम विभिन्न पार्टियों में शीर्ष पदों पर या दूसरी पंक्ति में नजऱ डाल कर देखें तो लगभग सभी दलों में ऐसी महिलाएं देखी जा सकती हैं जो हमें राजनैतिक रूप से शक्तिशाली दिखाई देती हैं। और उन्हें देखकर हमें यह तसल्ली भी हो सकती है कि महिलाएं भारतीय  राजनीति में अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं। परंतु क्या महिलाओं को लेकर हमें जो कुछ दिखाई दे रहा है वास्तविकता भी ऐसी ही है? या फिर हमारे देश में महिलाओं की स्थिति शायद उतनी बद्तर है जितनी किसी दूसरे देश में नहीं? महिला सम्मान के संदर्भ में राजस्थान की धरती का ही एक प्रसंग भी जान लीजिए। पिछले दिनों एक वीडियो वायरल हुआ जिसे देखकर किसी भी आम इंसान के रोंगटे खड़े हो जाएं और इस वीडियो को देखने के बाद निश्चित रूप से कोईभी मनुष्य यह सोचने के लिए मजबूर हो जाए कि आखिर वह किस देश में और किस युग में और किस समाज में जी रहा है। वायरल वीडियो के अनुसार राजस्थान के एक सुनसान रेगिस्तानी क्षेत्र में एक गरीब परिवार की झोंपड़ी के पास एक मोटरसाईकल व एक ट्रैक्टर आकर रुकता है। उसके बाद दो पुरुष एक अधेड़ महिला को डंडों से पीटने राजस्थानी भाषा में बोलते हुए उसे गालियां देते हैं। दरअसल, यह युवक अधेड़ महिला के सामने से उसकी जवान बेटी को उठाकर ले जाना चाहते हैं जिसका उसकी मां और वहां खड़े उसी परिवार के एक-दो बच्चे भी रो-पीट कर, चीख- चिल्ला कर विरोध करते हैं। और आखिरकार वह दबंग गुंडे तड़पती, चीखती-चिल्लाती मां के सामने ही ट्रैक्टर पर बिठाकर उस जवान लडक़ी को लेकर चले जाते हैं। वीडियो के साथ कैह्रश्वशन लिखने वाले ने लिखा है कि राजस्थान के कई क्षेत्रों में इसी प्रकार से दबंग लोग
गरीब घरों की युवतियों को उठा ले जाते हैं तथा उनके साथ बलात्कार करते हैं। यह भी लिखा गया है कि यह सब काम पुलिस प्रशासन की जानकारी में होता है तथा यह लोग इतने निडर हैं कि दिन के उजाले में ही यह सब काम करते हैं। केवल राजस्थान ही नहीं बल्कि देश के अधिकांश भागों में महिलाओं की लगभग यही स्थिति है। बलात्कार करना, बलात्कार के बाद हत्या कर देना, सामूहिक बलात्कार, शारीरिक उत्पीडऩ, महिला के शरीर के साथ हैवानियत की हदें पार कर जाना, किसी भी व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को गालियों के रूप में भी उसकी मां-बहन, बेटी को ‘याद’ करना, प्रत्येक महिला पर बुरी नजऱ डालना, महिला को संभोग मात्र की वस्तु समझना यही सब हमारे देश में महिलाओं की वास्तविक स्थिति है। और हमारे देश के पुरुष प्रधान समाज की इसी सोच ने भारतवर्ष का नाम पूरी दुनिया में बदनाम भी कर दिया है। दुनिया के कई देश समय-समय पर अपने भारत भ्रमण करने वाले पर्यट्कों को इसी संदर्भ में दिशा निर्देश भी जारी करते रहते हैं तथा उन्हें चौकस व सचेत रहने की हिदायत देते हैं। हमारे देश में महिला की दुर्गति तो वास्तव में उसके जन्म के समय से ही शुरु हो जाती है। नारी अपमान की जि़म्मेदारी से महिलाएं भी स्वयं को अलग नहीं रख सकतीं। क्योंकि एक महिला स्वयं महिला होने के बावजूद सर्वप्रथम पुत्र पैदा होने की मनोकामना करती है पुत्री की हरगिज़ नहीं। प्राय: ऐसी खबरें आती रहती हैं कि किसी महिला ने अपनी नवजात कन्या शिशु को इधर-उधर जाकर फेंक दिया। यह काम अकेला पुरुष कभी भी नहीं कर सकता। बिना महिला की सहमति के न तो कन्या भ्रूण हत्या हो सकती है न ही पैदा की हुई कन्या कूड़ेदान में या इधर- उधर फेंकी जा सकती है। ज़ाहिर है जब कन्या को जन्म देने वाली मां द्वारा प्रोत्साहन मिलता है तभी कोई पुरुष उस नवजात कन्या को कूड़े के ढेर के हवाले करके आता है। किसी पुरुष द्वारा कन्या के साथ मान-सम्मान जुड़े होने या उसके पालन-पोषण या विवाह पर आने वाले खर्च की बात सोचना तो बाद का विषय है। लिहाज़ा हमारे देश में नारी अस्मिता की बातें करना भी हमारे समाज के लोगों द्वारा अपनाए जाने वाले दोहरे चरित्र व दोहरे मापदंड का ही सबसे मज़बूत उदाहरण है। हम लाख देवियों की पूजा कर लें, महिला मान-सम्मान के लिए भाषण देते फिरें, बेटी बचाओबेटी पढ़ाओ अभियान चलाकर लोक लुभावनी बातें करते फिरें परंतु हकीकत यही है कि भारतवर्ष में नारी की अस्मिता व सम्मान की जो वास्तविक स्थिति है वह दर्पण में साफ दिखाई दे रही है और ज़ाहिर है दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता।






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