समाचार ब्यूरो
23/02/2018  :  16:24 HH:MM
चिंता उत्पन्न करता चीन का प्रभावी कदम लेखक
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चीन ने अरबों डॉलर वाली इकोनॉमिक कॉरिडोर परियोजना से जहां दुनिया के तमाम देशो का ध्यान अपनी ओर खींचा वहीं उसने कमजोर देशों के अंदरुनी मामलों में हस्तक्षेप कर अमेरिकी साम्राज्य को चुनौती देने जैसा काम भी कर दिखाया है।

इसे लेकर अमेरिका लगातार चीन को चेताता आ रहा है कि वह छोटे और कमजोर देशों को दबाने की कोशिश न करे, न ही उन्हें किसी प्रकार से धमकाए या फिर उन्हें उक्साने का ही प्रयास करे, लेकिन चीन ने इसे गीदड़ भभकी मानते हुए वही किया जो उसे करना था। 

इसके चलते उसने भारत से डोकलाम विवाद को सुलझाने की बजाय मनमर्जी चलाने का काम जारी रखा है, वहीं तमाम पड़ोसी मुल्कों खासतौर पर पाकिस्तान में अंदर तक पैठ बना ली है। चीन के प्रभाव का परिणाम ही है कि पाकिस्तान सीनेट ने चाइनीज भाषा ‘मंदारिन’ को अपने देश में आधिकारिक भाषा का दर्जा देने वाला प्रस्ताव पारित कर दिया। यहां यह कहना गलत होगा कि पाकिस्तान ने ऐसा करके चीन के प्रति अपनी मधुरता को प्रस्तुत किया है, बल्कि ऐसा करना पाक की मजबूरी है। दरअसल यह सभी जानते हैं कि अमेरिका ने आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान से लगातार दूरी बनाई हुई है और उस पर कार्रवाई करते हुए जहां आर्थिक मदद  पर रोक लगाई वहीं संभावित आंतकी ठिकानों पर ड्रोन से हमले भी किए हैं। इसे देखते हुए पाकिस्तान को एक ऐसे ‘आका’ की दरकार थी जो उसकी समयसमय पर आर्थिक मदद कर सके और वक्त आने पर अमेरिका से दो-दो हाथ करने की ताकत भी रखता हो। इसी के तहत पाकिस्तान ने चीन को  इस्लामाबाद लाने और उसका सियासी खैरमक़्दम करने वाली रणनीति पर काम शुरु किया है। यह अलग बात है कि पाकिस्तान के ही अनेक भाषाविद और अपनी मातृभाषा से ह्रश्वयार करने वाले जिम्मेदार लोग सरकार के इस फैसले का विरोध करते और कहते हैं कि यदि भाषाओं को आगे बढ़ाने का ही सवाल है तो पिछले 70 साल में अंग्रेजी, अरबी और उर्दू के साथ अब चाइनीज जैसी भाषाओं को तो आगे बढ़ाने का काम किया जा रहा है, लेकिन क्षेत्रीय व स्थानीय भाषाएं एवं बोलियां जिनमें पंजाबी और पश्तो प्रमुख हैं को कोई अहमीयत नहीं दी गई है, जो कि बताता है कि पाक सरकार स्थानीय भाषाओं के साथ गलत कर रही है। चीनी भाषा को
रोजगार उपलब्ध कराने वाली भाषा के तौर पर पेश किया जा रहा है, यही वजह है कि पाकिस्तानी मीडिया प्रचारित कर रहा है कि पाक में ज्यादा से ज्यादा बच्चों और नौजवानों को ‘मंदारिन’ पढ़ाने और सिखाने का काम शुरु हो गया है। इस दावे के पीछे चीन द्वारा आर्थिक गलियारे के लिए 60 बिलियन डॉलर का निवेश करना बताया जाता है। यह दावा भी पूर्व के दावों की ही तरह खोखला साबित होने वाला है, क्योंकि सभी जानते हैं कि जो कारोबारी होता है वह पैसा यदि कहीं किसी काम में लगाता है तो उससे मुनाफा कमाने के लिए ही लगाता है, अन्यथा नुक्सान उठाने के लिए कोई क्योंकर कारोबार करेगा। इसलिए चीन ने अपने लाभ के लिए ही पाकिस्तान में निवेश करना स्वीकारा है। वैसे यहां आपको बतलाते चलें कि चीन की इस कूटनीतिक चाल का शिकार पाकिस्तान ही नहीं बल्कि श्रीलंका भी हो चुका है।






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