समाचार ब्यूरो
20/03/2018  :  16:59 HH:MM
कांग्रेस की एकजुटता का राज
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कां ग्रेस हिन्दुस्तान की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है, लेकिन हाल के सालों में जिस तेजी से इसकी ताकत में लगातार गिरावट आई है, उससे उसे अपने स्वयं के अस्तित्व को बचाना भी मुश्किल लगने लगा है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि जहां केंद्र की राजनीति में विपक्ष की भूमिका निभाना भी दुश्वारी समझा जा रहा है

तो वहीं अब दो-चार राज्य ही ऐसे बचे हैं जहां कांग्रेस की सरकार है। दशकों देश की दशा और दिशा तय करने वाली कांग्रेस का यह हश्र होगा बड़े से बड़े राजनीतिक पंडित ने भी नहीं सोचा होगा। देश में सिद्धांतवादी, समाजसेवी और देशभक्त नेताओं की जमात तैयार करने वाली सौ साल से भी ज्यादा की उम्र वाली कांग्रेस का सूपड़ा साफ किसी विरोधी ने किया हो ऐसा नहीं है। बल्कि उसके अपने ही इसके लिए दोषी हैं, जो कि गुटों में राजनीति करने और स्वयं के वर्चस्व को बनाए रखने की खातिर पार्टी को बड़े से बड़ा नुक्सान करने से भी पीछे नहीं रहे हैं। ऐसे खेमों में बंटती कांग्रेस को जितना नुक्सान अपनों से हुआ उतना देश को कांग्रेसमुक्त करने का दंभ भरने वालों ने भी नहीं किया है। उत्तर और मध्य समेत पूर्व के राज्यों की बात कौन करे यहां तो दक्षिण में भी कांग्रेस अस्तित्व बचाने में लगी है। दक्षिण भारत में सिर्फ कर्नाटक ऐसा बड़ा राज्य है जहां इस समय कांग्रेस की सरकार है। दरअसल मई 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने एकजुटता का परिचय दिया और जीत दर्ज की, जिसके बाद सिद्धारमैया राज्य के मुख्यमंत्री बने। अब वहां भी जिस तरह से विरोध के स्वर उभरे हैं उससे आगामी चुनाव के परिणाम विरोधियों को खुश करने वाले भी आ सकते हैं। बहरहाल इस माहौल में कांग्रेस की कमान युवा नेतृत्व के हाथों में देकर समझा जा रहा है कि शायद अब पार्टी में एकजुटता आ जाएगी और आगामी लोकसभा चुनाव में बेहतर परिणाम लाए जा सकेंगे। इसके लिए कांग्रेस महाधिवेशन में राहुल गांधी के संबोधन पर सरसरी नजर डालनी होगी। उस कांग्रेस महाधिवेशन पर जिसके होने से पहले कहा जा रहा था कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इसके जरिए आम चुनाव 2019 को साधने का काम करेगा। अधिवेशन से वो अमृत प्राप्त होगा जिससे जीत सुनिश्चित होगी। इसके जरिए पार्टी की रणनीति की रुपरेखा तैयार करने और नेताओं व कार्यकर्ताओं में जीत के प्रति जोश भरने का काम भी किया जाएगा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह समेत पूर्व पार्टी अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी अपने संबोधन से पार्टी
नेताओं और कार्यकर्ताओं को जीत का मंत्र देंगे। इसी के तहत बतौर अध्यक्ष अधिवेशन में पहली बार शामिल हुए राहुल गांधी ने जहां युवाओं को दिशा निर्देश दिए वहीं उन्होंने मौजूदा केंद्र सरकार खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास एजेंडे की पोल खोलकर रख दी। मोदी सरकार पर निशाना साध रहे राहुल ने कहा कि वह देश को बांटने की कोशिश कर रहे हैं। अखिल भारतीय कांग्रेस के 84वें महाअधिवेशन में देशभर से पार्टी कार्यकर्ता आए, जिन्हें उन्होंने समझाने का प्रयास किया कि मोदी सरकार सच में क्या कर रही है। इसलिए उन्होंने भाजपा गठबंधन सरकार की तरफ इशारा करते हुए कह दिया कि उनका काम देश को लड़ाना है, समाज को तोडऩा और बांटना है लेकिन कांग्रेस का काम देश को जोडऩे का है। 

मतलब साफ है कि कांग्रेस की नीति देश के प्रत्येक धर्म, जाति, संप्रदाय के लोगों को साथ लेकर चलने की रही है, अब उसी रास्ते पर आगे बढऩा होगा। यह तभी संभव होगा जबकि पार्टी के नेता और कार्यकर्ता आपस में एकजुट होंगे और दूसरों को संदेश दे पाएंगे कि हम सब एक हैं। बात साफ है कि जब हम खुद एक होंगे तभी देश की जनता को एक कर सकेंगे। ऐसा करते हुए विरोधियों के हमलों को सहना और सांप्रदायिक ताकतों से निपटना भी सबसे जरुरी काम होगा। इसके लिए गांधीवादी होने की भी आवश्यकता है, क्योंकि यदि कांटे को कांटे से निकालने की उक्ति यहां लगाई गई तो हिंसा को बल मिलेगा और वह पार्टी या देश के लिए कतई सही नहीं माना जा सकता है। इस प्रकार देखा जाए तो कांग्रेस का महाधिवेशन जहां युवाओं को जोडऩे और एकसाथ आने का पैगाम देता है तो वहीं इसके जरिए लक्ष्य तय किया जाता है कि कांग्रेस और देश को आगे बढ़ाने का रास्ता दिखाया जाए। यह महाधिवेशन बेहतर भविष्य की बात करता है। इसके लिए सुधारवादी
बदलाव की बात करता है। ऐसे में युवाओं को आगे तो करना होगा, लेकिन परंपराओं से बंधे होने के कारण अनुभवी और सशक्त जमीनी नेताओं व कार्यकर्ताओं की अनदेखी भी नहीं की जानी चाहिए। ऐसे अनुभवशाली नेताओं के दिशानिर्देशों के बगैर पार्टी आगे नहीं जा सकती है, इसलिए इनका सम्मान भी बराबर बनाए रखना होगा। इसलिए राहुल कहते हैं कि उनका काम तो युवा और वरिष्ठ नेताओं को जोडऩे का है। वाकई अधिवेशन से अगर कोई अमृत निकला है तो वह एकजुटता ही है, जिसके सहारे आम चुनाव आसानी से जीते जा सकते हैं और पार्टी को पुन: मजबूती प्रदान की जा सकती है।






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