समाचार ब्यूरो
24/03/2018  :  10:59 HH:MM
फेसबुक डाटा लीक मामले की गंभीरता के सियासी मायने
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फेसबुक डाटा लीक मामले की वजह से इन दिनों भारतीय राजनीति में भूचाल आया हुआ है। इसे लेकर मीडिया में नेताओं की गलाकाट टिह्रश्वपणियां सुर्खियां बटोर रही हैं। सत्ताधारी दल भाजपा और मुख्य विपक्षी कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी अपने चरम पर है।
सोशल मीडिया के इस हडक़ंप के बीच कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे पर कैंब्रिज एनालिटिका की सेवाएं लेने का आरोप लगा रही हैं। यह अलग बात है कि फेसबुक के जनक और सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने अपनी व कंपनी की गलती मानते हुए फेसबुक पोस्ट में लिखा कि मैंने फेसबुक प्रारंभ किया था अत: इस ह्रश्वलेटफॉर्म पर जो होता है, उसके लिए अंतत: मैं ही जिम्मेदार हूं। जहां तक डाटा लीक का मामला है तो इसे रोकने के लिए मैं काफी गंभीर हूं। इसके साथ ही जुकरबर्ग आश्वस्त करते हुए कहते हैं कि गलती हुई है तो जरुरी कदम भी उठाए जाएंगे और किसी को भी इसका बेजा इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। इससे यह तो साफ हो गया कि जो फेसबुक डाटा लीक मामला है वह सीधे-सीधे कंपनी से जुड़ा मामला है और इसका असर अगले आम चुनाव में किस तरह से होता है या हो सकता है इस पर विचार-विमर्श तो किया जा सकता है, लेकिन कयास लगाकर किसी एक पक्ष को दोषी ठहरा देना और फिर देश की प्रमुख समस्याओं से लोगों का ध्यान भटका देना कहीं से भी उचित करार नहीं दिया जा सकता है। दरअसल यह मामला जब से सामने आया है तभी से प्रमुख पार्टियों के नेता एक-दूसरे को चोर ठहराने में लगे हुए हैं। इस मामले में जहां कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का कहना है कि भाजपा मोसुल में मारे गए 39 भारतियों के मुद्दे से देशवासियों का ध्यान भटकाने के लिए कथित एजेंसी की सेवा लेने का आरोप उनकी पार्टी पर मढ़ रही है। इसके फौरन बाद ही केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का बयान आता है कि राहुल का संपूर्ण सोशल मीडिया अभियान कैंब्रिज एनालिटिका की मदद से संचालित किया जाता है। इस संबंध में उन्होंने बैठक भी की है। अत: सवाल उठता है कि कांग्रेस पिछले पांच माह से चुप क्यों है? राहुल गांधी सफाई क्यों नहीं देते।' केंद्रीय मंत्री पूछते हैं कि इस मामले पर कांग्रेस ने चुह्रश्वपी क्यों साधी हुई है? वहीं रविशंकर ने सफाई देते हुए यह भी कह दिया कि भाजपा ने तो कभी भी इस एजेंसी की सेवाएं नहीं लीं। इन बयानों को वर्तमान राजनीतिक परिदृष्य पर रखकर देखें तो मालूम चलता है कि राहुल की बात में कुछ तो दम जरुर है, क्योंकि इस समय मोदी सरकार के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि इराक के मौसुल में मारे गए 39 भारतियों को क्यों बचाया नहीं जा सका? आखिर क्या वजह थी कि एक शख्स चीख-चीख कर कहता रहा कि उसके सामने उन्हें गोली मार दी गई और सरकार झुठलाती रही कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। इन तथ्यों और वारदात को सामने रखते हुए मोदी सरकार को देश की जनता के सामने जवाब देना ही चाहिए, लेकिन वह ऐसा नहीं करेगी, क्योंकि वह जानती है कि बचाव से बेहतर है अटैक करना। इसलिए उसने फेसबुक डाटा लीक मामले को उछालकर सभी का ध्यान इस ओर खींचने का काम किया है। इससे पहले अगर केंद्र सरकार को बात ही करनी थी तो इस विषय पर करती कि आधार कार्ड का डाटा कैसे लीक हो रहा है और क्योंकर लोगों की निजता के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। फिलहाल मामला अदालत में है, इसलिए कुछ खास कहा-सुना नहीं जा सकता, लेकिन इतना तो बताया ही जा सकता है कि हाल ही के दिनों में आधार डाटा चोरी-छिपे बैंचने का मामला भी सामने आया था, तब किसी ने कोई जिम्मेदारी नहीं ली और न ही उसका माकूल जवाब ही दिया गया। इसके बाद यदि बात करें नोटबंदी के बाद बैंकों की कारगुजारियों की तो इस पर भी मोदी सरकार कुछ कहने की स्थिति में नजर नहीं आती है। यह अलग बात है कि जो काम बैंक को करना चाहिए था वह भी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नोटबंदी की घोषणा करते हुए नजर आ चुके हैं। अब जबकि बैंकों का पैसा लूटकर उनके करीबी कहे जाने वाले कुछ लोग विदेश भाग चुके हैं तो सवाल उठ रहे हैं कि आखिर यह सरकार किनके साथ है? देश की गरीब जनता की खून-पसीने की कमाई को बैंकों के जरिए चंद अमीरजादों को सौंप दिया जाने वालों के साथ या फिर ईमानदारी के साथ देश की तरक्की में लगा मेहनतकश मजदूर के साथ। क्या इस पर चर्चा नहीं होनी चाहिए? इसी तरह देश का किसान कर्ज के बोझतले दबकर आत्महत्या करने को मजबूर होता है, लेकिन सरकार उनकी कर्ज माफी पर ध्यान नहीं देती और न ही इस बात पर ध्यान देती है कि किसान का जीवन-स्तर सुधारने के लिए बीज, खाद और पानी के साथ ही साथ कृषि संबंधी संसाधनों की सुगम उपलब्धता किस तरह की जा सकती है, उल्टा उसके पास एक सीधा-सपाट जवाब होता है कि वह कुछ नहीं कर सकती है जो करना है राज्य अपने स्तर पर कर लें। क्या इस विषय पर बात नहीं होनी चाहिए? अफसोस, जब सुनने वाला आंख, कान और नाक बंद कर लेता है तो उसे न तो कुछ दिखाई देता है, न कुछ सुनाई देता है और न ही उसे किसी मृत शरीर की दुर्गंध ही आती है। इस कारण देश की राजनीति में फेसबुक डाटा लीक मामला भूचाल लाने वाला साबित हो जाता है, वर्ना यह कौन नहीं जानता कि सोशल मीडिया को चंद मिनटों में ब्लॉक करके समस्या का समाधान खोजा जा सकता है, लेकिन यहां समस्याएं पैदा की जाती हैं समाधान तलाशने के लिए नहीं बल्कि उन्हें सियासी मुद्दा बनाकर वोटबैंक को हथियाने के लिए। इसलिए फेसबुक भी चलता रहेगा और लीक मामला भी, जिसे चिंता करनी है तो करें, वर्ना देश की सियासत तो अपने ढर्रे पर ही है।






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