समाचार ब्यूरो
25/03/2018  :  10:40 HH:MM
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की राजनीति असफलता या अस्तित्व की
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भारत देश ,समस्त प्रदेश और समस्त निवासियों से बना हैं ,जिसने जन्म लिया यहाँ पर वह भारतीय और उसे सब जगह आने जाने की स्वतंत्रता होती हैं। कोई भी समाज अन्य समाजों से नहीं जुड़ता तब तक समाज की कल्पना करना बेमानी होगी. मानव जीवन म ें इतनी जरूरत ें होती ह ंै और उनकी भरपार्इ सब पक्र ार के लोगो ं स े होती ह ंै .और मनुष्य अपने भविष्य की सुखद स्थिति को बनाने जहाँ उसका भाग्य, जहाँ उसकी रोजी रोटी लिखी होती हैं वहां जाने को बरबस मजबूर हो जाता हैं।
वर्षों भी ग्रामीण अंचलों में भविष्य अंधकारमय होने के कारण और अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन के लिए ऐसी जगह जाता हैं जहाँ से वह अपनी कल्पना को साकार करता हैं.यह कोई जरुरी नहीं हैं की सबको अनुकूल ही सफलता मिलती हैं.करोड़ों लोग हैं जिनको एक जगह या घर नसीब नहीं होता और किसी किसी के भाग्य इतना बलशाली होता हैं और पाप पुण्य का ठाठ होने से अपनी क्षमता का योग्यतम प्रदर्शन कर सब कुछ पा लेते हैं। महानगरों की संरचना मात्र वहां के मूल निवासियों से नहीं होती। यदि हम उदाहरण दके र बात कर े तो मबुं र्इ  का अस्तित्व मात्र मानलो 4 सौवर्ष  का ह ंै तब वहा ं भी कोर्इ  न कोई बाहरी व्यक्ति आये होंगे और उनके साथ अन्य लोगों का आना हुआ और जब समाज विकसित होता हैं तो उनकी पूर्ती के लिए मजदुर ,कारीगर ,मेकेनिक्स ,व्यापारी ,आना शुरू हुआ। .उन्होंने आपने विकास किया साथ ही वहां के बाशिंदों को सुविधाएं दी.कोर्इ  भी मनष्ु य सब काम म ें निपण्ु ा नही ं होता और न हो सकता ,इस पक्र ार महाराष्ट  ्र प्रान्त के साथ अन्य स्थानों के लोगों का आवागमन हुआ और धीरे धीरे नगर ,महानगर की संज्ञा प्राप्त कर आज आर्थिक राजधानी के रूप में पहचान बनायीं। इसमें किस किसका कितना योगदान हैं यह कहना मुश्किल हैं पर गिलहरी जैसा योगदान देकर आज यह स्थिति बनी हैं। जब समाज समूह में होता हैं तब अस्तित्व की लड़ाई के लिए राजनीती का सहारा लिया जाता हैं अन्यथा इस बड़ी दुनिया में कोई किसी को नहीं पहचानता बून्द बून्द से सागर बनता हैं और सागर बून्द समाय हो जाता हैं। कुछ समय स े यह पत्र ीत हो रहा ह ंै की जब समाज हर पक्र ार स े सम्पष्टु हो जाता ह ंै तब उस े अन्य समाज गौण लगने लगती हैं। राजा के साथ उसके पिच्छलग्गू न हो तो राजा वसै ा ही हो जाता ह ंै जसै े जसै े फौज का सने ापति या बिना स्तन की औरत .महाराष्ट ्र म ें कुछ राजनैतिक पार्टिया कुछ समय के बाद अपनी असफलता को छिपाने या अपने अस्तित्व को बताने ऐसा शिगूफा छोड़ देती हैं जिससे कुछ हलचल होने लगती हैं और वे समाचारों के मुख्य पृष्ठ पर छाने का प्रयास करने लगते हैं। कभी उत्तर प्रदेश ,तो कभी बिहार या कभी गुजरात के लोंगो के प्रति अपना आक्रोश निकालने कुछ ना कुछ बहाना ढूढंते हैं। पर ये नहीं समझते जो वहां वर्षों से रहकर उनकी उन्नति में अपना श्रम का योगदान देकर उनको स्थापित किया। क्या वे बिना वोट या समूह के अपने को बचा सकते हैं। वैसे बाहरी निवासियों के बिना मुम्बईकर कुछ नहीं कर सकते। आज जितनी गगनचुम्बी इमारतें ,कारखाने और अन्य कामों में इनका योगदान हैं उतना स्थानीय लोगो का नहीं हैं। वे लोग अपने परिवार जानो ,नाते रिश्तेदारों को छोडक़र नारकीय जीवन जी कर व्यवसाय नौकरी मजदूरी करते हैं अपना पेट काटकर पैसा जमा करते हैं और परिवार का भरण पोषण करते हैं और मुंबईकरों को सेवा देते हैं यह क्या कम हैं। उनका ऋणी मुंबईकरों को भी होना चाहिए। पर ऐसा न करके उन्हें बाह्य मानकर उनको तिरस्कृत करना कहाँ तक उचित होगा.!






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