समाचार ब्यूरो
25/03/2018  :  10:43 HH:MM
एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग रुकेगा
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अ नुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम-1989 के दुरुपयोग को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले पर सुनाई दे रहीं इक्का-दुक्का नकारात्मक प्रतिक्रियाओं को अहमियत नहीं दी जानी चाहिए।

बेकसूर लोगों की गरिमा और सम्मान की रक्षा के पक्षधर प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति ने फैसले का स्वागत किया है। कांग्रेस के कुछ नेताओं की प्रतिक्रियाओं पर अवश्य आश्चर्य हुआ। वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले को केन्द्र सरकार की नाकामी बताते दिखे। आरोप लगाया कि केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कानून के सख्त प्रावधानों के समर्थन में सही ढंग से बात नही रखी। फैसले को लेकर निराश होने का स्वांग करते ऐसे नेता यहां भी वोट बैंक की राजनीति डूबे थे। महाराष्ट्र के एक मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जो गाइड लाइन जारी की है उसका पालन सुनिश्चित किए जाने पर जहां कानून के दुरुपयोग पर लगाम लग सकेगी वहीं झूठी शिकायतों के कारण प्रताडि़त किए जाने से निर्दोष लोग बचेंगे। कोर्ट ने कहा है कि एससी/एसटी कानून के तहत प्रताडऩा शिकायत मिलने पर तत्काल प्राथमिकी दर्ज नहीं होगी। ऐसी स्थिति में पहले डीएसपी शिकायत की जांच करेंगे कि मामला फर्जी या दुर्भावना से प्रेरित तो नहीं है। इसके साथ अब आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी भी नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट ने बहुत साफ शब्दों में कहा है कि सरकारी कर्मचारी की गिरफ्तारी से पहले सक्षम अथॉरिटी और सामान्य व्यक्ति की गिरफ्तारी से पहले एसएसपी की लिखित मंजूरी लेनी जरूरी होगी। इतना ही नहीं गिरफ्तारी की मंजूरी देते समय अधिकारी कारण दर्ज करेगा। ये कारण आरोपी के साथ-साथ अदालत को भी बताए जाएंगे।

अजा जजा (अत्याचार निवारण)अधिनियम-1989 के बढ़ते दुरुपयोग को लेकर लंबे समय से चिंता व्यक्त की जा रही थी। दुरुपयोग की सबसे अधिक शिकायतें महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश और कुछ हद तक तमिलनाडु से सुनने में आतीं रहीं। इन राज्यों की सरकारों पर कई बार दबाव बनाया गया कि वे केन्द्र से बात कर कानून के प्रावधानों को नरम करने पर जोर दें। सरकारों का ध्यान इस बात की ओर आकृष्ट करने की कोशिशें होतीं रहीं कि सिर्फ बदला लेने या दुर्भावना के चलते शिकायत कर दी जाती हैं। एससी/एसटी कानून के प्रावधान इतने सख्त रहे हैं कि पुलिस आंख बाद कर आरोपी के विरूद्ध कार्रवाई करने टूट पड़ती है। पुलिस के समक्ष आरोपों की सत्यता की पुष्टि करने के बहुत सीमित विकल्प बताए जाते रहे हैं। कानून के दुरुपयोग के कारण पिछले लगभग तीन दशक के दौरान बड़ी संख्या में बेकसूर लोगों ने अपने सम्मान और हितों पर गहरी चोट बर्दाश्त की है। एससी/एसटी कानून के प्रावधानों को कुछ नरम करने के पक्ष में उत्तर प्रदेश में हाल के वर्षों में बात चली थी। वहां यह तक कहा गया था कि अब बड़ी संख्या में ऐसे दलित हैं जिन्हें शोषित नहीं कहा जा सकता। सामाजिक और आर्थिक हैसियत के मामले वो कथित अगड़ों और सवर्णों से भी आगे निकल चुके हैं। महाराष्ट्र में मराठा क्रांति मोर्चा वर्षों से कानून के दुरुपयोग की शिकायत कर रहा है। मोर्चा के नेताओं का कहना था कि विरोधियों और प्रतिद्वंद्वियों के विरूद्ध एट्रासिटी एक्ट का दुरुपयोग करने से लोग नहीं चूक रहे हैं। मोर्चा ने एससी/एसटी कानून के प्रावधानों को तर्कसंगत और उनमें नरमी लाने के लिए महाराष्ट्र में कई बार आवाज उठाई और रैलियां निकालीं। महाराष्ट्र में आम बोलचाल की भाषा में इस कानून का उल्लेख एटॅ्रासिटी एक्ट के रूप में किया जाता है। तमिलनाडु में पीएमके नेता एस रामदौस ने सितम्बर 2009 में मांग की थी कि बढ़ते दुरुपयोग को देखते हुए एससी/एसटी कानून में बदलाव किया जाना चाहिए। इससे बेकसूर लोग प्रताडऩा से बच सकेंगे। अप्रैल 2010 में दिल्ली की एक अदालत ने एससी/एसटी कानून के दुरुपयोग के बढ़ते मामलों पर चिंता व्यक्त की थी। अनुसूचित जाति के एक किरायेदार परिवार ने अपने मकान मालिक के परिवार के नौ सदस्यों के विरूद्ध शिकायत करते हुए कहा था कि इन लोगों ने उनके विरूद्ध जातिसूचक शब्दों का उपयोग कर कानून का उल्लंघन किया है। अदालत ने शिकायत को असत्य पाया। सभी नौ लोगों को आरोपों से मुक्त कर दिया गया। एससी/एसटी एक्ट के सख्त प्रावधानों का खौफ सरकारी और अर्द्धसरकारी दफ्तरों तक में दिखाई देता रहा है। पड़ताल कराई जाए तो ऐसे हजारों मामले देश में निकल आएंगे जिनमे कर्मचारियों और कनिष्ठ अधिकारियों ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सिर्फ सबक सिखाने के मकसद से जाति को आधार और
कानून को हथियान बना कर शिकायत कर दी। कल्पना करें कि ऐसी स्थिति में दफ्तर या संस्थान में काम कराना कितना कठिन हो जाता होगा। बरसों पहले महाराष्ट्र से प्रकाशित एक अखबार में न्यूज एडीटर के पद पर चुके एक सज्जन ने अपना अनुभव सुनाया था। उन्होंने बताया था कि उनके एक सब-एडीटर ने किसी गलती पर डॉंटे जाने पर न्यूज एडीटर के विरूद्ध एट्रॅासिटी एक्ट के तहत पुलिस में शिकायत कर दी थी। बड़ी मुश्किल से उसे समझा-बुझा कर मामला शांत कराया जा सका। यह बात नोटिस की जाने लगी थी कि शोषित वर्ग को संरक्षण देने के उद्देश्य से बनाए गए कानून के कुछ प्रावधानों ने ही इसके दुरुपयोग का रास्ता आसान
कर दिया। इकतरफा और बेहद सख्त प्रावधानों के कारण समाज में तनाव पैदा होने की आशंका बनी रहती है। यह प्रश्र स्वाभाविक है कि संसद में जब अनुसूचित जाति अनसूचित जनजाति(अत्याचार निवारण)अधिनियम 1989 को मंजूरी दी गई उस समय किसी भी सांसद ने एक्ट के इकतरफा सख्त बना दिए प्रावधानों पर आपत्ति क्यों नहीं की? क्या किसी भी तत्कालीन सांसद को प्रावधानों की दुरुपयोग की आशंका नहीं हुई थी या वोट बैंक की राजनीति के कारण उन्होंने इसके विरूद्ध मुंह खोलने का साहस नहीं दिखाया। संसद के किसी भी सदस्य ने इस बात पर विचार नहीं किया कि बेकसूर लोगों के हितों और सम्मान की रक्षा कैसे की जा सकेगी? एक वरिष्ठ विधिवेत्ता का मानना है ऐसे मनमाने प्रावधान विधेयक में पेश किए जाने के बाद भी संसद सदस्यों की ओर से आवाज सुनाई नहीं देने के पीछे कारण हमारी संसद में विशेषज्ञों का नहीं होना है। वह कहते हैं कि कितने सांसद हैं जो कानून, विदेश नीति, शिक्षा, स्वास्थ्य और रक्षा जैसे क्षेत्रों के बारे में आधारभूत जानकारियां
रखते हैं। अब संसद में हंगामा और शोर-शराबा ही होता है। तर्कपूर्ण और बौद्धिक चर्चाएं कहां सुनाई देतीं हैं। उपर्युक्त अधिनियम को मंजूरी देने वाले तत्कालीन सांसदों में से कितने लोग इस कानून के प्रावधानों को एक सांस में बता सकने में समर्थ होंगे? 1989 में संसद से पारित कानून के प्रावधानों की बानगी यहां पेश है। शोषित वर्ग के प्रति अत्याचार या कू्ररता रोकने के लिए जिन कृत्यों को अपराध माना गया उनमें से कुछ इस प्रकार हैं अजा या जजा समुदाय के किसी व्यक्ति को अखाद्य या हानिकारक वस्तु खाने या पीने के लिए विवश करना, अजा या जजा के किसी व्यक्ति को हानि पहुंचाने के इरादे से उसके परिसर या पड़ौस में मल, बेकार या हानिकारक वस्तु फेंकना, अजा या जजा समुदाय के किसी व्यक्ति को जबरन निर्वस्त्र करना या उसे निर्वस्त्र कर घुमाना या उसके चेहरे पर कालिख पोतना जैसे कृत्य जो मानवीय गरिमा को चोट पहुंचाते हों।






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