समाचार ब्यूरो
27/03/2018  :  11:12 HH:MM
अन्ना का फीका आंदोलन
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सात साल बाद समाजसेवी अन्ना हजारे फिर दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे हैं। वो लोकपाल और किसानों के मुद्दों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। अन्ना ने पहले ही दिन यह साफ कर दिया कि आम आदमी पार्टी समेत किसी भी राजनीतिक दल के नेता, सदस्य, कार्यकर्ता या समर्थक उनके आंदोलन के मंच पर नहीं आ सकते।
इस सत्याग्रह के आयोजन के लिए बनाई गई 26 सदस्यों कोर कमेटी के हर सदस्य से 100 रुपए के स्टांप पेपर पर यह लिखकर साइन करवाया गया है कि वे किसी भी राजनीतिक स्वार्थ के चलते इस आंदोलन से नहीं जुड़ रहे हैं। साथ ही वे लोग आजीवन न तो खुद कोई पार्टी बनाएंगे और न ही किसी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता ग्रहण करेंगे। अलग-अलग राज्यों में बनाई गई कमेटियों के भी साढ़े 6 हजार से ज्यादा सदस्यों ने इसी तरह का हलफनामा अन्ना को भेजा है। आंदोलन में शामिल हो रहे किसानों के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं है। मंच के बैकग्राउंड में जो बैनर लगाया गया है, उस पर सिर्फ गांधी जी तस्वीर है। इस आंदोलन को अन्ना ने ‘जन आंदोलन सत्याग्रह’ नाम दिया है। बैनर पर सक्षम किसान, सशक्त लोकपाल और चुनाव सुधार जैसी तीन प्रमुख मांगें भी लिखी हुई हैं। भारतीय किसान यूनियन समेत देश के कई दूसरे किसान संगठनों ने अन्ना के इस आंदोलन को समर्थन दिया है। मगर ये बात सबका ध्यान खींच रही है कि रामलीला मैदान में माहौल जन लोकपाल आंदोलन के समय जैसा नहीं है। ना ही मीडिया की इसमें ज्यादा दिलचस्पी है। आंदोलन के समर्थन में पिछली बार की तरह जगह-जगह कार्यक्रम होने की कोई खबर भी नहीं मिली है। यानी अन्ना ने अगर ये सोचा हो कि वे 2011 जैसा माहौल बना देंगे, तो उन्हे निराशा हाथ लग रही होगी। दरअसल, उन्हें समझने की ज़रूरत है कि 2011 में भी जो जादू दिखा वो उनका नहीं था। बल्कि तब वे यूपीए सरकार के खिलाफ कॉरपोरेट सेक्टर, उससे संचालित मीडिया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की साझा मुहिम का मुखौटा बने थे। इस बारे ऐसी कोई ताकत उन्हें मुखौटा नहीं बना रही है। तो आंदोलन भी चर्चा में नहीं है। अन्ना हजारे ने कहा है कि पिछले हफ्ते वे कृषि मंत्री उनसे मिले थे। उन्होंने कृषि मंत्री से कहा है कि उन्हें आश्वासन नहीं, ठोस कार्रवाई चाहिए। उन्होंने कहा है- जब तक हमारी मांगें पूरी नहीं होगी, तब तक हम डटे रहेंगे। मगर इससे सचमुच कोई फर्क पड़ेगा, फिलहाल ऐसा नहीं लगता।






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