समाचार ब्यूरो
28/03/2018  :  15:19 HH:MM
नौकरी और कर्ज अवसर को सीमित करता है
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नौ करी और कर्ज अवसर को ना केवल सीमित करते हैं। बल्कि समाप्त भी कर लेते हैं। यह ध्रुव सत्य है। हमारे पूर्वज इस सत्य को स्वीकार कर चुके थे। जिसके कारण उनका जीवन सुखमय था। वह आनंद के साथ स्वस्थ्य रहते हुए अपने जीवन को जीते थे।

पूर्वजों की मान्यता थी, कि कर्ज के बोझ से दबा व्यक्ति अपने नजरें  उठाकर समाज के सामने नहीं जा पाता है। उसका व्यक्तित्व समाप्त हो जाता है। समाज उसे, शंका की नजरों से देखने लगती है। कर्ज के कारण उससे और उसके परिवार से कोई भी व्यक्ति अपना रिश्ता रखना नहीं चाहता। भारत में लोग मरने के पूर्व कर्ज से मुक्ति के लिए हरसंभव प्रयास करते थे। यदि वह कर्ज चुकाने में सक्षम नहीं होते थे। इस स्थिति में जिससे कर्ज लिया होता था उससे कर्ज से मुक्त करने की गुहार लगाते थे। वह उसका कर्ज भी माफ कर देते थे। इसी तरह नौकरी को सबसे खराब माना जाता था। नौकरी का मतलब गुलामी से था। मालिक जो कहे उसे करना, अच्छे नौकर की पहचान होती है। नौकरी के कारण उसकी सोच खत्म हो जाती है। वह कोई भी काम अपने मन से नहीं कर पाता। सीमित आय से ही वह अपना परिवार चलाने की आदत हो जाती है। पालतु पशु की तरह उनका व्यवहार हो जाता है। जिसके कारण लोग नौकरी करने के स्थान पर कृषि, रोजगार और मजदूरी करके अपन स्वतंत्र अस्तित्व बनाने में विश्वास रखते थे।

स्वतंत्रता के पश्चात लगभग 80 के दशक तक लोग सरकारी नौकरी करना भी पसंद नहीं करते थे। 1980 दशक के बाद सरकारी नौकरियों में भ्रष्टाचार और अधिकारों के दुरुपयोग से सरकारी नौकरी पाने की होड़ युवाओं में लगी। 2000 के बाद से डिग्री के साथ रोजगार में सरकारी नौकरी और कारपोरेट नौकरी का क्रेज युवाओं 
के बीच बड़ी तेजी के साथ बढ़ा। इसने भारतीय अर्थ व्यवस्था और सोच को बड़े स्तर पर बदल दिया। अब कोई भी युवा स्वयं की कृषि, रोजगार और सेवा क्षेत्र में जाना पसंद नहीं करता है। कृषि व्यापारिक संस्थान और सेवा क्षेत्र के सफल परिवारों के बच्चे भी पढ़ लिखकर अपने पारम्पारिक व्यवसाय से जुडऩे के स्थान पर नौकरी
करना चाहते हैं। उन्हें स्वतंत्र व्यवसाय और सेवा क्षेत्र में काम करने का साहस नहीं होता है। जिसके कारण स्थिति आज बहुत विस्फोटक हो गई है। वैश्विक व्यापार समझौते और कर्ज लेकर विकास करने की अवधारणा के कारण वर्ष 2000 से 2010 तक नौकरी के क्षेत्र में पढ़े लिखे, प्रशिक्षित युवाओं की जो मांग थी, वह अब पूर्ण हो गई। पिछले 15 वर्षों में जिस तरह से भारत में उच्च शिक्षा के हर प्रदेश में सैकड़ों संस्थान खुले। सरकार ने स्कालरशिप देकर उच्च शिक्षा में युवाओं को मौका दिया। इसमें शिक्षा की गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखा गया। मांग और आपूर्ति का ध्यान भी नहीं रखा गया। परिणाम स्वरूप लाखों की संख्या में इंजीनियर, एमबीए, फार्मासिस्ट, तकनीकी, प्रोफेसनल, स्नातक, परास्नातक, की डिग्री लेकर युवा नौकरी की मांग कर रहे है। उनकी जरूरत अब संस्थानों तथा शासकीय विभागों में नहीं है। करोड़ों डिग्री धारी युवा नौकरी की मांग कर रहे हैं। उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है। जिस क्षेत्र में रोजगार, कृषि, और सेवा क्षेत्र में युवाओं की आवश्यकता है। युवाओं में जीने का साहस नहीं है। सरकार और शिक्षा संस्थानों ने युवाओं को जो सपने दिखाये थे। उन्हें पूर्ण करना किसी के लिए संभव नहीं रहा। जिसके कारण युवा वर्ग हताश, और आंदोलित है। युवाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति बड़ी तेजी के साथ बढ़ रही है। युवाओं और उनके परिवार में हताशा देखने को मिल रही है। 2002 के बाद से भारतीय परिवारों में कर्ज लेने की प्रवृत्ति बड़ी तेजी के साथ बढ़ी है। विश्व बैंक द्वारा वैश्विक स्तर पर कर्ज उपलब्ध कराकर विकास की गति को तेज करने का जो मंत्र दिया था। 15 साल बाद उस मंत्र के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया होने से आम आदमी अपनी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहा है। किसान, व्यापारी, छात्र तथा समाज का प्रत्येक वर्ग कर्ज के बोझ से दबा हुआ है। केंद्र सरकार, राज्य सरकारों नगर निगम, नगर पालिकाओं, निगम मंडल, सभी ने पिछले 15 वर्षो में कर्ज लेकर कथरी ओढक़र खूब घी पिया है। अब कर्ज चुकाने और खर्च पूरा करने के लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, निगम मंडल एवं स्थानीय संस्थायें हर साल टैक्स और दरों को बढ़ा रही है। आम आदमी उन्हें चुकाने की स्थिति में नहीं है। जिसके कारण पूरा भारतीय समाज उद्धेलित है। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े युवाओं और नेतृत्व करने वालों को समग्र चिन्तन करना चाहिए।






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