समाचार ब्यूरो
30/03/2018  :  12:18 HH:MM
स्वतंत्रता सेनानी श्याम जी कृष्ण वर्मा : व्यक्तित्व एवं कृतित्व
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श्याम जी कृष्ण वर्मा एक क्रांतिकारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वह एक साथ अधिवक्ता एवं पत्रकार थे। उन्होने लंदन में इण्डिया हाउस की स्थापना की, जो कि भारत से जाकर इग्लैण्ड में पढऩे वाले छात्रों के परस्पर मिलन एवं विचार-विमर्श की प्रमुख केन्द्र था। वह क्रांतिकारियों के प्रेरणास्त्रोत ही नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई को गतिशील करने वाले व्यक्तित्व थे।
वह ऐसे पहले भारतीय थे, जिन्हे आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से एम0ए0. और बार.एट.लॉ. की उपाधियां मिली थी। पुणे में दिए गए उनके संस्कृत के भाषण से प्रभावित होकर मोनियर विलियम्स ने उन्हें आक्सफोर्ड में संस्कृत का सहायक प्राध्यापक बना दिया था। वह संस्कृत के जाने-माने विद्वान थे। श्याम जी कृष्ण वर्मा का जन्म 04 अक्टूबर 1857 को गुजरात प्रांत के माण्डवी कस्बे में श्री कृष्ण वर्मा के यहां हुआ था। यह कस्बा अब माण्डवी लोकसभा बतौर विकसित हो चुका है। 1888 में अजमेर में श्याम जी ने वकालत शुरू की और स्वराज के लिए भी काम करना शुरू किया। प्रदेश के रतलाम और गुजरात के जूनागढ़ में दीवान रहकर उन्होने जनहित में काम किए। मात्र बीस वर्ष की अवस्था में ही वह क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे थे। लोकमान्य तिलक और स्वामी दयांनद उनके प्रेरणा-स्त्रोत थे। 1918 के बर्लिन और इग्लैण्ड में हुए विद्या सम्मेलनों में उन्होने भारत का प्रतिनिधित्व किया था। उनके पिता का देहांत 11 वर्ष की उम्र हो गया था। भुज में माध्यमिक शिक्षा प्राप्त कर वह आगे के शिक्षा के लिए मुम्बई चले गए। मुम्बई में ही उन्होने संस्कृत सीखी। 1857 में उनका विवाह हुआ। शीघ्र ही वह स्वामी दयानन्द के शिष्य बनकर वैदिक धर्म एवं दर्शन पर व्याख्यान देने लगे। वह पहले ऐसे व्यक्ति थे जो गैर-ब्राम्हण होते हुए भी 1877 में काशी के पण्डितों से पण्डित की सम्मानित उपाधि प्राप्त की। आक्सफोर्ड में अध्यापन करते हुए 1883 में रायल एसीसियेटिक सोसाइटी के समक्ष में ’द ओरजिन ऑफ राइटिंग इन इण्डिया‘ निबंध प्रस्तुत किया। जिसके चलते वह उक्त सोसाइटी के नान-रेजीडेन्ट सदस्य बनाए गए। 1897 में वह जूनागढ़ राज्य के दीवान पद से इस्तीफा दे-दिया, क्योकि उन्हे ब्रिटिश ऐजेन्ट द्वारा एक तीखा अनुभव हुआ और ब्रिटिश शासन के प्रति उनका विश्वास हिल गया। इस बीच मैड़म कामा, वीर सावरकर, लाला हरदयाल और मदन लाल धीगरा जैसे कई क्रांतिकारी उनके संपर्क में आए। कांग्रेस पार्टी का उस दौर की नीतियों यथा अंग्रेजी शासन के सामने अर्जी देना, प्रार्थना करना, सहयोग देने से उनका विश्वास उठ गया। उन्होने चाफकेर बंधुओं द्वारा पूना में ह्रश्वलेग कमिश्नर की हत्या का समर्थन किया। 1897 में वह पुन: लंदन चले गए, जहां पर उनका घर भारत के सभी राजनीतिक नेताओं का केन्द्र बन गया। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपतराय, गोपाल कृष्ण गोखले, गांधी सभी भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में सलाह-मशविरे के लिए उनके पास पहुंचते थे। वह प्रख्यात दार्शनिक हर्बट स्पेंशर से बेहत प्रभावित थे। उन्होने स्पेंशर की मृत्यु पर फेलोशिप की शुरूआत की, साथ ही स्वामी दयानन्द सरस्वती पर भी फेलोशिप की शुरूआत की। आगे चलकर चार फेलोशिप की उन्होने और भी शुरूआत की। 1909 में वह लार्ड कर्जन की ज्यादतियों के विरूद्ध संघर्षरत रहे।






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