समाचार ब्यूरो
08/04/2018  :  12:15 HH:MM
अब आंबेडकर को दुहा जाए
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द लित रक्षा-कानून में संशोधन करके सर्वोच्च न्यायालय ने सत्तारुढ़ मोदीपार्टी को सांसत में डाल दिया है। यों तो अदालत के इस फैसले से मोदी-पार्टी और सरकार का कुछ लेना-देना नहीं है लेकिन फिर भी उन पर दलित-विरोधी होने का ठह्रश्वपा लगाने की कोशिश जारी है। इस बेजा कोशिश का मुकाबला कैसे किया जा रहा है ?
एक तो सरकार ने अदालत में याचिका लगा दी है और दूसरा, मोदी ने बहुत जमकर एक बयान झाड़ दिया है। इस बयान में कहा गया है कि उनकी सरकार ने डॉ. भीमराव आंबेडकर के लिए जो कुछ किया है, वह किसी सरकार ने नहीं किया। उन्होंने कई काम गिनाए और कई वे भूल गए। जैसे एक दलित को राष्ट्रपति बनाया, जिस घर में आंबेडकर का निधन हुआ, उसका स्मारक बनाया जा रहा है, एक आंबेडकर तीर्थ-यात्रा योजना बनाई, आंबेडकरजी के पुतले जगह-जगह खड़े किए आदि-आदि। अब शायद आंबेडकरजी के ग्रंथों को सरकार फिर से छपाएगी। हो सकता है कि आंबेडकरजी के नाम से वह भारत ही नहीं, एशिया का सबसे ऊंचा पुरस्कार कायम कर दे। उन्हें भारत का संविधान-निर्माता तो अब नेता लोग कहने ही लगे हैं। यह असंभव नहीं कि यदि दलित वोट खिसकने लगें तो हमारे सर्वज्ञजी आंबेडकर को महात्मा गांधी से भी ऊंचा दर्जा दिलाने की होशयारी करने लगें लेकिन वे अगर थोड़ा पढऩे-लिखने का कष्ट करें तो उन्हें मालूम पड़ेगा कि डॉ.  आंबेडकर ने ‘जाति का उन्मूलन’ पुस्तक लिखी थी और वे जातिवाद को जड़मूल से उखाडऩा चाहते थे। वे जातीय आरक्षण को भी अनंत काल तक चलाए रखने के विरुद्ध थे। आंबेडकर के नाम की माला जपकर आप क्या कर रहे हैं ? आंबेडकर के विचारों की हत्या कर रहे हैं। जातिवाद को हवा दे रहे हैं। आंबेडकर को आपने जातिवाद का पर्याय बना दिया है। यदि डॉ. आंबेडकर का आपको सही अर्थों में सम्मान करना है तो ऐसी नीति बनाएं कि देश में दलित नाम का एक नागरिक ढूंढने पर भी न मिले। सभी नागरिक अदलित हों, सम्मानीय हों, आपस में रोटी-बेटी व्यवहार करें, कोई छूत-अछूत न हो, कोई ऊंचा-नीचा न हो। अगर ऐसा हो जाए तो हमारे नेताओं की दुकानें कैसे चलेंगी ? मवेशियों की तरह उन्हें अंधा थोक वोट कैसे मिलेगा ?






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