समाचार ब्यूरो
10/04/2018  :  16:45 HH:MM
नेपाल के साथ कदम फूंक-फूंककर
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नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली की भारत-यात्रा ने दोनों देशों के संबंधों को नई ऊचं ाइयो ं पर ल े जान े का भरोसा पदै ा किया ह ै लेि कन उसस े कोर्इ एसे ा सकं े त नही ं मिलता जिससे यह आशा उत्पन्न हो कि ओली की चीनपरस्ती में कोई कमी आई है।
विदेश सचिव विजय गोखले ने साफ-साफ कहा है कि ओली से चीन के बारे म ें कोर्इ  बात नही ं हर्इु  ह ै जबकि ओली के भारत आन े के पहल े भारतीय अखबारो ं में यह खबर जमकर छपवाई गई कि भारत ओली से नाराज है, क्योंकि वे चीन की मदद से नेपाल में बड़े-बड़े बिजलीघर बनवा रहे हैं। भारत इन बिजलीघरों की बिजली बिल्कुल नहीं खरीदेगा। पता नहीं कि ओली से यह बात कहने की हिम्मत हमारी सरकार में रही या नहीं रही। यदि इसमें ही संदेह की गुंजाइश है तो हम यह आशा कैसे करें कि नेपाल से भारत चीनी महापथ (ओबोर) के बोर में खुलकर बात करेगा। हां, यहां भारत ने चीन की नकल जरुर की। चीन ने नेपाल और तिब्बत के बीच रेल लाइन डालने की घोषणा की तो अब भारत ने भी दिल्ली से काठमांडो तक रले बनान े का सकं ल्प जाहिर कर दिया। स्पष्ट ह ै कि चीनी रले हमारी रले स े पहले बनकर चलने लगेगी। हमारे अफसर बड़े चतुर-चालाक हैं। उन्होंने मोदी को अब एक नया जुमला सिखा दिया है। मोदी ने कहा कि नेपाल अब भूवेष्टित (जमीन से घिरा हुआ) नहीं, जमीन से जुड़ा हुआ राष्ट्र बन जाएगा। यही बात हमारी सरकार अफगानिस्तान पर लागू क्यों नहीं करती ? अटलजी के जमाने में वहां जरंजदिलाराम सडक़ तो बन गई लेकिन उस देश में रेल अभी तक नहीं चलती। नेपाल और भारत के बीच गैस पाइप लाइन, सडक़ें और बांध आदि बनाने पर अब भारत काफी खर्च  करन े को तयै ार हो गया ह,ै यह अच्छी बात ह ै लेि कन ओली न े गलती स े भी यह नहीं कहा कि भारत के साथ नेपाल के अति विशिष्ट संबंध हैं। उनके बयान काफी सध े हएु रह।े व े भारत और चीन को एक ही तराज ू पर तोलत े रह े बल्कि व े यह कहना भी नहीं भूले कि भारत ने 2015-16 नेपाल की जो घेराबंदी की थी, वह अवांछित थी। यह ठीक है कि ओली पहले चीन नहीं गए, भारत आए लेकिन यदि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ओली के जीतते ही काठमांडो नहीं जातीं और उन्हें नहीं पटातीं तो क्या वे पहले भारत आते ? वे पहले भारत आए तो सही लेकिन उनकी इस यात्रा का संदेश यही है कि अब भारत को नेपाल के साथ बहुत सोच-समझकर व्यवहार करना होगा।






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