समाचार ब्यूरो
10/04/2018  :  16:47 HH:MM
मोरारजी देसाई : जिनकी निष्ठा और निर्भीकता पर कभी नहीं लगा कोई प्रश्न चिन्ह
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भा रत के चौथे प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई एक मात्र ऐसे भारतीय राजनेता हैं जिनकी निष्ठा, स्पष्टवादिता और निर्भीकता पर कभी कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया गया। भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों ने उन्हें अपने अपने सर्वोच्च सम्मानों - क्रमश भारत रत्न और निशान-ए-पाकिस्तान, से सम्मानित किया।

मोरार जी देसाई देश के जाने माने स्वतंत्रता सेनानी,गांधवादी विचारक,राजनीतिज्ञ और प्रशासक थे। वह एक सरल,स्वाभिमानी और आत्मविश्वासी इंसान थे। उन्होंने किसी भी कीमत पर अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया। प्रधानमंत्री हो कर भी उनका रहन सहन और खान पान बहुत साधारण और नियमित था। वह प्राकृतिक चिकित्सा में विश्वास करते थे। अपनी लंबी आयु में वह कभी भी किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित नहीं हुए। मोरार जी देसाई का जन्म 29 फरवरी 1896 को तत्कालीन बम्बई राज्य के बलसाड जिले के भादेली गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम रणछोडज़ी देसाई और माता का नाम वजियाबेन था। उनके पिता एक स्कूल में अध्यापक थे। वह अपने माता-पिता की सबसे ज्येष्ठ संतान थे। बचपन में ही उन्हें अपने पिता के साये से वंचित होना पड़ा था। जब वह केवल पन्दह वर्ष के थे तब उनका विवाह ग्यारह वर्षीया गजराबेन के साथ कर दिया गया। अभी उनके विवाह को तीन दिन ही हुए थे कि उनके पिता ने आत्म हत्या कर ली। दृढ़ प्रतिज्ञ मोरार जी ने इस आघात को सह कर अपनी पढ़ाई जारी रखी। वह सडक़ की लैंप के नीचे बैठ कर अपनी पढ़ाई किया करते थे। अपनी प्रारंभिक शिक्षा बॅसर हाई स्कूल से करने के पश्चात उन्होंने 1916 में विल्सन कॉलेज बम्बई से बी.एससी. फिजिक्स की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उर्त्तीण की। भाव नगर के महाराज से स्कालरशिप मिलने के कारण ही वह विल्सन कॉलेज बम्बई में शिक्षा ग्रहण कर पाए थे। बी एसी, करने के पश्चात वह प्रान्तीय सिविल सर्विस की परीक्षा में बैठे और पहली बार में उसमें उर्त्तीण हुए। यह परीक्षा पास करके उन्होंने 1918 में अहमदाबाद के डिह्रश्वटी क्लेकटर का पद भार संभाला। वह 12 वर्ष तक प्रशासक के रूप में कार्य करते रहे। उनकी गणना उस समय के कुशन और ईमानदार प्रशासकों में की जाती थी। इस समय देश अंग्रेजों के विरूद्ध स्वतंत्रता की अन्तिम चरण की लडाई लड़ रहा था। ऐसे कठिन समय में उन्होंने अंग्रेजों की नौकरी करना उचित नहीं माना और 1930 में महात्मा गांधी के अह्वान पर सरकारी नौकरी छोड़ कर स्वतंत्रता के संग्राम में योगदान देने के लिए सामने आये।

उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के कई आन्दोलनों में भाग लिया और कई बार जेल यात्राएं कीं। उन्होंने लगभग सात वर्ष अंग्रेजों की जेलों में कष्ट सहते हुए काटे। वह 1937 में कांग्रेस के टिकट पर बम्बई विधान सभा के लिए निर्वाचित हुए। पहली बार वह खेर मंत्रीमंड़ल में राजस्व और कृषि मंत्री बनाए गए। 1939 में कांग्रेस के इस मंत्री मंड़ल ने त्याग पत्र दे दिया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें नजरबंद कर दिया गया। इस अवधि में उन्होंने महात्मागांधी के विचारों का गहन अध्ययन किया। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात 1946 में पुन चुनाव हुए तब कांग्रेस द्वारा गठित मंत्रीमंड़ल में उन्हें गृह मंत्री का पद दिया गया। 1952 के राज्य विधान सभा के चुनावों में वह पराजित हुए परन्तु उन्हें पुन अहमदाबाद से चुनाव लडऩे का अवसर मिला जिसमें वह विजयी रहे। इस बीच श्री खेर ने सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया और मोरार जी देसाई महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री बन गए। वह 1956 तक राज्य के मुख्य मंत्री रहे। गृहमंत्री और मुख्य मंत्री के रूप में मोरारजी भाई ने पुलिसतंत्र का
अविस्मरणीय काया कल्प किया। उन्होंने भूमि सुधार और जेलों की दशा संवारने के लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाये। देश में भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग जोर पकड़ रही थी। 1956 में बंबई राज्य को महाराष्ट्र और गुजरात के रूप में विभाजित करने के लिए आंदोलन किया जा रहा था। मोरारजी भाई इसका प्रारम्भ से ही विरोध कर रहे थे। क्योंकि वह अपने सिद्धांतों के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं करते थे इसलिए उन्होंने इस आंदोलन को सख्ती के साथ कुचलने का निर्णय किया। इसमें कई लोगों को अपने प्राण गंवाने पड़े। अंत में मराठी और गुजराती क्षेत्रों को मिला कर विशाल बंबई राज्य बना परन्तु मोरारजी देसाई ने इसका मुख्यमंत्री बनने से इंकार कर दिया। इस आशय की घोषणा वह पहले ही कर चुके थे और अपनी बात से मुकर जाना उनके स्वभाव में नहीं था। मोरार जी देसाई को केन्द की राजनीति में लाया गया। केन्दीय मंत्रीमंड़ल में उन्हें वाणिज्य और भारी उद्योग मंत्री के दायित्व दिए गए।






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