समाचार ब्यूरो
28/04/2018  :  10:05 HH:MM
गजल गायकी और क्लासिकल गीतों के लिए मशहूर रहीं इकबाल बानो
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गजल गायकी के लिए भारत और पाकिस्तान में समान रुप से मशहूर इकबाल बानो गजल और सेमी क्लासिकल गीतों के लिए जानी जाती थीं। बानो ने छोटी सी उम्र में ही संगीत से अपने आप को जोड़ लिया था।

बानो ने दिल्ली घराने से ताल्लुक रखने वाले उस्ताद चांद खान से संगीत की तालीम ली। 1950 का दशक आते-आते वो स्टार बन गईं। बानो ने सरफरोश, इंतेकाम, गुमनाम, इश्क-ए-लैला और नागिन जैसी फिल्मों में सुरमयी गीत गाए। बानो ने शायर फैज अहमद फैज की नज्मों और गजलों को अपनी आवाज दी। इन गानों ने उन्हें एक अलग पहचान बनाई और दर्शकों के बीच उनकी मांग बढ़ गई। साल 1952 में बानो पाकिस्तान चली गई थीं। पाकिस्तान में उन्होंने अपनी गायकी का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन पांच साल बाद लाहौर आर्ट काउंसिल में किया। बानो ने गुमनाम (1954), कातिल (1955), इंतकाम (1955), सरफरोश (1956), इश्क-ए-लैला
(1957) और नागिन (1959) जैसी पाकिस्तानी फिल्मों के लिए भी अपनी आवाज दी है। साल 1974 को इकबाल बानो को पाकिस्तानी सरकार ने प्राइड ऑफ पाकिस्तान अवॉर्ड से नवाजा। 21 अप्रैल 2009 को लाहौर में इस प्रख्यात गायिका ने अंतिम सांस ली। उनका जन्म 27 अगस्त, 1935 को दिल्ली में हुआ था। बचपन में उनकी आवाज की कशिश और संगीत के प्रति दीवानगी देखकर बानो के पिता ने उन्हें संगीत सीखने की पूरी आजादी दी। उन्होंने शास्त्रीय संगीत पर आधारित सुगम संगीत की विधा ठुमरी और दादरा में खासी महारत हासिल कर ली थी। जिसके बाद ऑल इंडिया रेडियो में गाना शुरू किया। फैज की नज़्म ‘लाजि़म है कि हम भी देखेंगे’ उनका ट्रेडमार्क बन गया था। जिया-उल-हक ने अपने शासन में कुछ पाबंदियां लगा दी थीं। इनमें औरतों का साड़ी पहनना और शायर फैज़ अहमद फैज़ के गाने गाना शामिल था। साल 1985 में लाहौर के अलहमरा ऑडिटोरियम में इकबाल बानो उस दिन सिल्क की साड़ी पहन कर आई थीं और पूरे करीब 50 हजार लोगों के सामने फैज की मशहूर नज़्म, ‘हम देखेंगे, लाजि़म है कि हम भी देखेंगे’। गाना शुरू कर दिया। पूरा ऑडिटोरियम खचाखच भरा हुआ था। तालियों की गूंज के साथ लोग उनके साथ इस गाने को गाने को गा रहे थे। वहीं आगे चल कर ये गाना उनका ट्रेडमार्क बन गया। इस गाने को सुनने के बाद देश के युवा
जिया-उल-हक के तानाशाही शासन के खिलाफ उठ खड़े हुए थे।






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