समाचार ब्यूरो
28/04/2018  :  10:07 HH:MM
बांग्ला सिनेमा की पहली स्टार थीं कानन देवी
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भारतीय सिनेमा में कानन देवी एक ऐसा नाम है जिन्होंने अपने अभिनय से कामयाबी के शिखर को छुआ और वह बांग्ला सिनेमा की पहली कलाकार हैं जिन्हें स्टार का दर्जा हासिल हुआ। कानन देवी का जन्म पश्चिम बंगाल के हावड़ा में 22 अप्रैल 1916 में एक मध्यमवर्गीय बंगाली परिवार में हुआ था। उन्हें भारतीय सिनेमा में एक ऐसी कलाकार के तौर पर याद किया जाता है जिन्होंने न केवल फिल्म निर्माण बल्कि अभिनय और गायिकी से भी दर्शकों के दिलों में खास पहचान बनाई थी।

बाल कलाकार के तौर पर हुई शुरुआत

परिवार की आर्थिक तंगी के चलते उन्हें 10 साल की उम्र से ही काम करना पड़ा। एक पारिवारिक मित्र की मदद से उन्हें 'ज्योति स्टूडियो' की फिल्म ‘जयदेव’ में काम करने का मौका मिला। इसके बाद कानन देवी ने ज्योतिस बनर्जी के निर्देशन में राधा फिल्म्स के बैनर तले बनी कई फिल्मों में बतौर बाल कलाकार काम
किया। कानन देवी की मुलाकात उसी दौरान रायचंद बोराल से हुई, जिन्होंने उनके सामने हिन्दी फिल्मों में काम करने का प्रस्ताव रखा, तभी कानन देवी ने संगीत की शिक्षा लेनी शुरू की। उन्होंने उस्ताद अल्लारक्खा और भीष्मदेव चटर्जी से संगीत की ट्रेनिंग ली। 1937 में फिल्म ‘मुक्ति’ सुपरहिट हुई, पी.सी.बरुआ के निर्देशन में बनी इस फिल्म से कानन देवी न्यू थियेटर की शीर्ष अभिनेत्री में शामिल हो गयीं। कानन ने 1941 में न्यू थियेटर छोड़ दिया और स्वतंत्र रूप से काम करने लगीं। 1942 में आयी ‘जवाब’ कानन देवी के हिंदी फिल्मों के करियर में सबसे हिट फिल्म साबित हुई। इसी फिल्म में उन पर फिल्माया गया गीत- ‘दुनिया है तूफान मेल’ उन दिनों का लोकप्रिय गीत बना। 1948 में आई ‘चंद्रशेखर’ कानन देवी की अभिनेत्री के तौर पर आखिरी हिंदी फिल्म थी।इस फिल्म में उनके सामने अशोक कुमार थे।

निजी जिंदगी रही दर्द भरी

फिल्मों में कानन ने भले ही अपनी एक अलग पहचान बनाई लेकिन निजी जिंदगी में उन्हें काफी मुश्किलों और दर्द का सामना करना पड़ा। 1940 में कानन देवी ने ब्रह्म समाज के मशहूर शिक्षाविद् हरम्बा चंद्र मैत्रा के बेटे अशोक मैत्रा से शादी की लेकिन पूरा समाज इस शादी के खिलाफ था क्योंकि उस दौर में महिलाओं का फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। मशहूर कवि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कानन और अशोक की शादी पर उपहार और आर्शिवाद दिया तो ब्रह्म समाज ने उनकी भी बहुत आलोचना की। आखिरकार यह शादी टूट गई। कानन इससे बहुत दुखी हुई और तलाक के बावजूद उनके अपने ससुरालवालों से मधुर संबंध
बने रहे। 1949 में कानन ने एक नौसैनिक अधिकारी हरिदास भट्टाचार्य से दूसरी शादी कर ली। 17 जुलाई 1992 को कानन देवी इस दुनिया को अलविदा कह गईं। सिनेमा जगत में कानन के योगदान को देखते हुए 1976 में ‘दादा साहेब फाल्के पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था। 1968 में सरकार ने उन्हें पदमश्री से भी
सम्मानित किया था।






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