समाचार ब्यूरो
10/05/2018  :  15:53 HH:MM
वाक्या-ए-पत्थरगढ़ी : आदिवासियों की जागृति को सलाम....!
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दे श के आधा दर्जन आदिवासी बहुल राज्यों में अपने अधिकारों की रक्षा तथा राजनीतिक शोषण से मुक्ति के लिए आदिवासी वर्ग जागृत हो गया है, इन राज्यों में छत्तीसगढ़, झारखण्ड और राजस्थान के साथ हमारा अपना मध्यप्रदेश भी शामिल है, इन राज्यों में आदिवासियों ने अपने शोषण तथा संवैधानिक अधिकारों को लेकर आवाज बुलंद की है तथा कुछ जिलों में तो सरकारी पंचयतों के समानांतर अपनी पंचायतें गठित कर ली है

तथा अपने क्षेत्रों में प्रशासन व सरकार के अधिकारियों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी है, जो अधिकारी इस पाबंदी का उल्लंघन कर उनके क्षेत्र में गए उन्हें बंधक तक बना लिया गया है। ये आदिवासी भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची में दर्ज ‘‘पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम-1966 (पैसा) संविधान के अनुच्छेद 244(1) के तहत अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विस्तारित करता है’’। यह कानून देश के दस राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडि़सा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में प्रभावशील है। इस एक्ट को प्रभावशील किए डेढ़ दशक से ज्यादा का समय गुजर गया किंतु आज तक
राजस्थान को छोड़ किसी भी राज्य ने इस एक्ट के तहत कोई पहल नहीं की, राजस्थान ने भी एक्ट के तहत सिर्फ नियम बना दिए किंतु उन्हें लागू नहीं किया गया, यही स्थिति मध्यप्रदेश की है, आदिवासी प्रधान राज्यों छत्तीसगढ़ व झारखंड ने तो इस एक्ट को लाल बस्ते में बांधकर रख दिया।

आज से करीब तीन दशक पहले देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने छत्तीसगढ़ के आदिवासी प्रधान क्षेत्र बस्तर में यह कहा था कि ‘‘केन्द्र से जो आदिवासी कल्याण योजनाओं के लिए पैसा भेजा जाता है, उसका सिर्फ पन्द्रह प्रतिशत ही मूल कार्य पर खर्च होता है, बाकी पचासी प्रतिशत राशि या तो सरकारें किन्ही दूसरे कार्यों पर खर्च कर देती है या किसी की जेब में चली जाती है’’, किंतु पूर्व प्रधानमंत्री के इस सत्य कथन की आज तक किसी भी केन्द्र या राज्य सरकार ने चिंता नहीं की और देश का आदिवासी आज भी फटे हाल, लाचार और मजबूर है, और उसके नाम पर केन्द्र से आने वाले पैसे से सरकार या तो अपना घाटा पूरा कर रही है या नेताओं की जेबें भर रही है।

किंतु अब आदिवासी में जागृति पैदा हो गई है, और उसने कई जिलों में संविधान की पांचवीं अनुसूची के कानूनी प्रावधानों के तहत अपनी स्वायत्ती पंचयतें गठित कर उसके सीमा क्षेत्र में सीमा क्षेत्र के ‘पत्थर गाड़’ दिए है, जिसे पत्थरगढ़ी नाम दिया गया है, यद्यपि कई जिला प्रशासनों ने आदिवासियों की इस स्वायत्तता के कदम का विरोध कर सख्ती की किंतु आदिवासियों की एकता के सामने प्रशासन ने भी घुटने टेक दिए है। अब आज एक ओर जहां ‘दलित’ के नाम पर देश में सत्तारूढ़ दल राजनीति कर रहा है, वहीं दूसरी ओर पिछले सत्तर सालों से सत्तारूढ़ दल की कठपुतली बना आदिवासी ‘वोट बैंक’ जागरूक होकर अपने अधिकारों की मांग कर रहा है। जिन दस राज्यों में यह आदिवासी एक्ट लागू किया गया है, उनमें से सात राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें है, सिर्फ ओडिशा, आंध्र व तेलंगाना में भाजपा की सरकारें नहीं है, और भाजपाशासित सात राज्यों में ही यह आदिवासी चेतना जागृत हुई है और भाजपा की राज्य सरकारें इस चेतना से परेशान व हलाकान है, क्योंकि पार्टी पिछले डेढ़ दशक से इन राज्यों में सत्ता में है और वे प्रावधानों के बावजूद आदिवासियों के हित क अधिकारिक संदेश उन तक पहुंचा नहीं पाई है, या यौं कहे कि इस दिशा में कोई पहल ही नहीं की गई है।

और अब जबकि राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में विधान सभा चुनाव अत्यंत निकट है, ऐसी स्थिति में आदिवासियों के हित का यह संघर्ष किसे अपनी चपेट में लेगा, यह किसी से भी छुपा हुआ नहीं है। अब आदिवासियों के अधिकारों का संघर्ष कहा जाए या इसे ‘बगावत’ माना जाए, यह इस विषय पर चिंतन करने वाले
की सोच पर निर्भर है, क्योंकि आदिवासी तो अपने को आदिवासी कहलाना ही पसंद करता है, अनुसूचित जाति या जनजाति का अंग नहीं। कुल मिलाकर यदि केन्द्र व सम्बंधित राज्यों की राज्य सरकारों ने अभी भी इस मसले को गंभीरता से नहीं लिया तो इसका खामियाजा किसे भुगतना पड़ेगा? यह कहने की जरूरत ही नहीं है।






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