समाचार ब्यूरो
10/05/2018  :  15:55 HH:MM
धार्मिक विरासत की अवहेलना
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रणथंभौर के सबसे पुराने गणेश मंदिर की चौखट तक आने में आम गणेश भक्त आज भी दसवीं सदी की ही तकलीफें झेल पुराने रीति-रिवाज निभाने में अघाते नहीं दिखते हैं। क्योंकि गजानन भी इससे अनजान नहीं कि अपने इष्ट का दरस पाने में भक्त अपने धीरज की कोई भी परीक्षा देने को तैयार रहता है।
श्रद्धा और समर्पण में डूबे इन श्रद्धालुओं का सरोकार अपने गणपति बह्रश्वपा के मंदिर का दर्जा ‘वर्ल्ड हेरिटेड’ में शुमार होकर बढ़ जाने से रत्तीभर नहीं है। सच कहें, तो ‘विश्व धरोहर’ बने इस मंदिर में पहुंचते थके-मांदे दर्शनार्थियों का गला सूख आने पर भी पानी का बूँद तक नहीं मिलने, महिलाओं तक को शौच के लिए इधर-उधर किसी आड़ की तलाश करने और बिजली का नामोनिशान न होने सरीखे बदतर हालात में कोई तब्दीली नहीं आने की जवाबदेही किसकी बनती है! चमत्कारी मंदिर की आस्था संजोये भक्तों की ओर से सालाना चढ़ता बेहिसाब चढ़ावा किसकी झोली में जाता है? इस भारी रकम से ही बेहद आसानी से श्रद्धालुओं की बुनियादी सहूलियतों का इंतजाम हो सकता है। यूनेस्को से मिली इस मंदिर को ‘विश्व धरोहर’ की मर्यादा गणेश भक्तों के किस काम आयेगी? वहीं यह प्रासंगिक सवाल भी उठ खड़ा होता है कि वर्ल्ड हेरिटेज और भारतीय पुरातत्व विभाग के अधिकार क्षेत्र में मंदिर का संरक्षण आने के बावजूद यात्री सुविधाओं को किस बिना पर अनदेखा किया जा रहा है? जबकि रणथंभौर किले के 700 किमी परिसर में ही सुप्रसिद्ध अभयारण्य पर्यटकों की तमाम सुविधाओं से लैस है। इस दोहरे मानदण्ड का सटीक उत्तर मंदिर देखभाल के विशेषज्ञों के पास भी शायद नहीं होगा! इस किले को घुमा कर दिखानेवाले गाइड भी इस सवाल पर चुह्रश्वपी साधे होते हैं। जरा अंदाजा लगाइये, राजस्थान के सवाईमाधोपुर जिले के रणथंभौर में अरावली-विंध्याचल की 1579 फीट पहाड़ी ऊँचाई पर इस विश्वप्रसिद्ध स्वयंसृष्ट त्रिनेत्र गणेश मंदिर, जिसे रणतभँवर मंदिर भी कहा जाता है, की ड्यौढ़ी तक खस्ताहाल रास्ते से गुजरते हुए पहुंचने में यात्रियों को कितनी मेहनत-मशक्कत करनी पड़ती है! यह भक्ति की शक्ति ही है कि दर्शनार्थी सारी बाधाओं से अपने भक्तों को दूर रखनेवाले गणेशजी का दर्शन पाकर ही राहत की साँस ले पाते हैं। रही बात बड़े-बूढ़ों की, तो उन्हें खटोले पर लाद कहारों के मजबूत कंधे मंदिर की दहलीज पर पहुंचाने-उतारने में मददगार साबित होते हैं। हाल ही में इस गणेश मंदिर की यात्रा के दौरान परेशानजदा यात्रियों की जद्दोजहद का जायजा लेते हुए इस सुख्यातभ्रमण-वृत्तांत लेखक ने अपनी आपबीती को सामने लाना बेहद जरूरी समझा। 1000 साल पहले मंदिर बनने से अब तक गणपति दर्शनार्थियों की मुश्किलें जस की तस बनी हुई हैं। इसीलिए इस मुद्दे पर 21वीं सदी में आकर गुहार मचाना वक्त का तकाजा बन गया है।






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