समाचार ब्यूरो
11/05/2018  :  09:53 HH:MM
विकासशील देशों पर भी होगा ट्रंप के फैसले का विपरीत असर
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी कार्यशैली के लिए दुनिया में एक अलग पहचान बना चुके हैं। प्रारंभ से विवादों में रहने के शौकीन ट्रंप को जो भाता है वो वही करते हैं, साथ ही वो ऐसे निर्णय भी लेते हैं जो उनसे पहले की सरकारों के फैसलों को पलटता हो। ऐसे मसौदे जिन्हें पहले कभी अमेरिका की पूर्व सरकारों ने देश और दुनिया के हित के मद्देनजर लागू किया, उन फैसलों को भी पलटने से वो गुरेज नहीं कर रहे हैं।

यही वजह है कि पहले पेरिस जलवायु समझौते से ट्रंप हटे और अब उन्होंने 2015 में ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से अलग होने की घोषणा कर दी है। गौरतलब है कि करीब 200 देशों ने पेरिस जलवायु समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिससे हटते हुए ट्रंप ने दो टूक कहा था कि फिलहाल अमेरिका गैर बाध्यकारी पेरिस समझौते और इस समझौते की वजह से हम पर लादे गए क्रूर वित्तीय और आर्थिक बोझ को लागू करने के सारे कदमों पर रोक लगा रहा है। इसी के साथ ट्रंप ने ग्रीन क्लाइमेट फंड को खत्म करने का भी एलान कर दिया था। यह अलग बात है कि तब शोधकर्ताओं ने अपने एक अध्ययन से खुलासा किया था कि संयुक्त राज्य अमेरिका में वायु प्रदूषण के कारण हर साल करीब दो लाख मौतें होती हैं। शोधकर्ताओं का दावा था कि जो लोग इस प्रदूषण के कारण मरते हैं वे अपनी सामान्य उम्र से 10 साल पहले मर जाते हैं। बहरहाल इन सब का असर ट्रंप पर नहीं होना था सो नहीं हुआ, वो अपने फैसले पर अडिग आगे बढ़ते चले गए और अब यहां आ पहुंचे कि उन्होंने देश और दुनिया की भलाई को दरकिनार करते हुए ईरान परमाणु समझौते से भी खुद को अलग कर लिया। इस मामले में ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी का कहना है कि उनका देश अमेरिका के बिना भी इस परमाणु समझौते का हिस्सा बना रह सकता है। अमेरिका के फैसले की कड़े शब्दों में निंदा कर रहे रुहानी ने तो यहां तक कह दिया है कि वो इस संबंध में यूरोप, रुस और चीन से बात करेंगे। मानों रुहानी ट्रंप के फैसले से उत्तेजित कम और उत्साहित ज्यादा हैं इसलिए वो दावा करते हैं कि उनका देश अगले सप्ताह से पहले से कहीं ज्यादा मात्रा में यूरेनियम का संवर्धन करेगा। इस प्रकार देखा जाए तो ट्रंप का और रुहानी का यह रुख एक चुनौतीभरा कदम है, जो कि परमाणु क्षेत्र में खलबली मचा देगा। इसे समझते हुए ही ट्रंप के फैसले से दुखी फ्रांस के राष्ट्रपति एमानुएल मैक्रों कहते हैं कि उनकी ही तरह रूस, जर्मनी और ब्रिटेन भी अमेरिका के फैसले से निराश हैं। यहां बात किसी और देश की क्या की जाए खुद अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी ट्रंप के फैसले को बड़ी भूल करार दिया है। उनका कहना है कि ट्रंप का यह फैसला दिशाहीन और नासमझी भरा है। यह सभी जान रहे हैं कि ट्रंप के इस फैसले का असर विकासशील देशों पर सबसे ज्यादा होगा, यहां तक कि पेट्रोलियम पदार्थों के दाम यदि आसमान छूने लगें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

बहरहाल अपनी जिद पर अड़े ट्रंप का कहना है कि ईरान समझौता मूल रूप से दोषपूर्ण है, इसलिए उन्होंने ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका के हटने की घोषणा की है। यह कहते हुए उन्होंने ईरान के खिलाफ ताजा प्रतिबंधों वाले दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करके सारी संभावनाओं को मानों हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर दिया। यही नहीं ट्रंप ने ईरान के मददगारों को चेतावनी देते हुए यह भी कहा है कि जो भी ईरान की मदद करेगा उन्हें भी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। इस प्रकार अपने निर्णय को मनवाने के लिए ट्रंप धमकी भी दे रहे हैं और हदों को पार करते हुए कह रहे हैं कि इस फैसले से दुनिया में यह संदेश जाएगा कि अमेरिका
सिर्फ धमकी ही नहीं देता, बल्कि वह जो बोलता है उसे पूरा करके भी दिखाता है। अब यदि इसी बात पर विचार कर लिया जाए तो मालूम चलता है कि अमेरिका की पूर्व सरकारों ने दुनिया की भलाई का वास्ता देते हुए जो समझौते किए और अन्य देशों को समझौते के लिए मजबूर किया, अब आगे से दुनिया का भरोसा अमेरिकी
सरकार से उठ जाएगा। इससे यह भी साबित होता है कि ट्रंप की नजरों में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपतियों और उनकी सरकारों के अच्छे कार्यों की एहमियत नहीं है।

एक जिद्दी की तरह उन्हें जो सही दिख रहा है उसे वो कर रहे हैं। इसलिए आगे भी वो पूर्ववर्ती सरकारों के फैसले यदि पलटते हैं तो आश्चर्य  नही ं होगा, फिर भल े ही वो यह कह रह े हो ं कि इर्र ान परमाण ु समझौते का गलत इस्तेमाल कर रहा है। ईरान उसे मिल रही परमाणु सामग्री का इस्तेमाल हथियार बनाने में कर रहा है। ट्रंप भले कह रहे हों कि ईरान परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल का निर्माण कर रहा है, लेकिन दुनिया देख रही है कि सीरिया में अमेरिका को जो नाकामी मिली है उससे वह बौखलाया हुआ है। इसलिए उसने ऐसे फैसले लेने शुरु कर दिए हैं, जिससे सभी का ध्यान उसकी नाकामी से हट जाए। अंतत: ट्रंप के फैसले से हिन्दुस्तान जैसे विकासशील देशों को पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों के मोर्चे पर मुंह की खानी पड़ सकती है। पेट्रोलियम पदार्थों के दाम यदि विश्वस्तर पर बढ़ते हैं तो उसका सीधा असर भारत पर भी पड़ेगा। इस महंगाई के दौर में लोगों पर और मार पड़ सकती है। अब यह कौन नहीं जानता कि अमेरिका के फैसले में यूरोपीय देशों की भी हामी होगी ही होगी, तब कच्चे तेल की कीमतों का बढऩा तय है, जिसके दूरगामी परिणाम भी देखने को मिलेंगे। इसलिए ट्रंप के इस फैसले की निंदा हो रही है और कहना पड़ रहा है कि यह विश्वशांति और सह अस्तित्व के लिए सही नहीं है।






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