समाचार ब्यूरो
15/05/2018  :  19:31 HH:MM
शांति में ही मिलेगा ईश्वर, अल्लाह और वाहे गुरु
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पू जा, इबादत, नमाज कोई भी नाम दें। ईश्वर, अल्लाह या वाहे गुरु जिस नाम से हमारी आस्था हो हम पुकारें। लेकिन इस सच्चाई से भला कौन इंकार करेगा कि इस सृष्टि का नियंता एक है। सबका मालिक एक है। जहां विज्ञान की दृष्टि कमजोर पडऩे लगती है। हमारी धार्मिक आस्थाएं वहां भी अंधेरे से बाहर निकलने का रास्ता खोज लेती हैं।

धर्म कर्म की आजादी संविधान में है। किसी भी धर्म में यकीन करने वाले व्यक्ति को यह स्वतंत्रता है कि वह अपने धार्मिक क्रियाकलापों को सुविधा के मुताबिक अंजाम दे। लेकिन यह सुविधा किसी के लिए असुविधा बन जाए तो वहीं धर्म के नाम पर विवाद पैदा होते हैं। गुरुग्राम में नमाज अदा करने की जगह को लेकर विवाद सरकार ने शांतिपूर्ण तरीके से निपटा लिया। लेकिन खट्टर सरकार ने एक बहस भी शुरू कर दी कि पब्लिक आर्डर सर्वोपरि है या फिर हमारे धार्मिक ऐलान। कई बार इसमें टकराव होता है। कई राज्यों में इस तरह की स्थिति आई है।

पश्चिम बंगाल का उदाहरण ले लीजिए। बीत दिनों वहां कई ऐसे मौके आए जब मुहर्रम के जुलूस या दुर्गापूजा के उत्सव के समय और मान्यताओं को लेकर सरकारी तंत्र से टकराव की नौबत आई। मामला अमूमन सुलझ जाता है जब सरकार में बैठे लोग परिपक्वता दिखाते हैं। मेरा मानना है कि सरकार में बैठे व्यक्ति का एक ही धर्म होता है, राजधर्म। राजधर्म के निर्वाह का संकल्प सर्वोपरि है। राजसत्ता में बैठा व्यक्ति निष्पक्ष हो तो रास्ता निकल ही आता है। खट्टर सरकार ने राजधर्म का निर्वाह किया। उन्होंने तय किया कि नमाज विवादित स्थानों पर न हो। ऐसे स्थानों पर न हो जहां से कानून व्यवस्था का संकट हो। यह फिर गलत नीयत से स्थान कब्जाने के लिए धार्मिक क्रियाकलाप को अंजाम न दिया जाए। खट्टर सरकार ने विरोध, अवरोध और चुनौती के उठने वाले सुरों को आमंत्रित किया और अंतत: अपने तर्क से लोगों को संतुष्ट करके जता दिया कि उनके राज में धार्मिक आजादी सबको है लेकिन पब्लिक आर्डर भी सर्वोपरि है। यही सही तरीका है। लेकिन यहीं से असल इम्तहान भी शुरू होता है। क्योंकि पैमाना एकपक्षीय नहीं हो सकता। यह सबपर लागू होता है। चाहे किसी भी धर्म समुदाय के लोग हों उन्हें धर्म को प्रदर्शन, दबाव बनाने या फिर दूसरे समुदाय को चोट पहुंचाने का माध्यम बनाने या चिढ़ाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। नमाज अदा करनी हो, कीर्तन करना हो, सडक़ पर कांवड़ यात्रा निकालनी हो या शोभा यात्रा। इसका रूप कदापि ऐसा नहीं होना चाहिए कि कानून तंत्र को लगे कि कोई आंदोलनकारी सडक़ पर आ गए हैं। धर्म का तात्पर्य है जोडऩा। अगर इसकी आड़ में लोग एकत्र होकर इस तरह का रूप अख्तियार करेंगे कि विभिन्न समुदायों के बीच अफरातफरी हो जाए या फिर वहां संकट
महसूस होने लगे तो निश्चित रूप से राजसत्ता को दखल देना चाहिए और देना ही पड़ेगा।

दरअसल हम ऐसे समाज में रहते हैं जहां हमारी  संवेदनशीलता धर्म के नाम पर चरम पर होती है। थोड़ी सी गलतफहमी या कुछ अराजक तत्वों को मनमानी देने की इजाजत दी गई तो औरंगाबाद जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। कासगंज की घटना हो या पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों की घटना धर्म के नाम पर दो समुदायों के बीच टकराव शायद इसीलिए हुआ कि हम समय रहते नहीं चेते। यहां हमें यह मानकर चलना चाहिए कि किसी भी धर्म में बहुसंख्यक लोग शांति, अमन के साथ अपनी आस्थाओं और देश की व्यवस्था में तालमेल के साथ जीना चाहते हैं। धर्म के नाम पर फसाद ज्यादातर लोगों को पसंद नहीं। फिर भी दुर्भाग्य से मुठ्ठी भर लोगों की हरकतें बहुसंख्यक लोगों की इच्छा पर भारी पड़ती है। हमारे राजनीतिक दलों की भूमिका जिम्मेदारी भरी हो तो इस तरह की घटनाओं को टाला जा सकता है। धर्म को शांति समरसता और प्रेम का सेतु बनाने की कोशिश करते रहिए। क्योंकि धर्मोन्माद आपको पथभ्रष्ट कर सकता है और किसी भी पथभ्रष्ट व्यक्ति को ईश्वर नहीं मिल सकते। शांति और मर्यादा में ही आपका मालिक आपका ईश्वर,






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