समाचार ब्यूरो
16/05/2018  :  16:53 HH:MM
खुदरा कारोबार को ध्वस्त कर देगा यह सौदा
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कठोपनिषद में मत्स्य न्याय का वर्णन है। मत्स्य न्याय का मतलब होता है, समुद्र में बड़ी मछली छोटी को निगल जाती है। मत्स्य न्याय केवल समुद्र में ही नहीं होता, आज की नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के दौर में बाजार में भी होता है। खुदरा कारोबार की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी वॉलमार्ट ने हमारे देश की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट को खरीद लिया।

16 अरब डालर यानी 1.07 लाख करोड़ में फ्लिपकार्ट की 77 फीसदी हिस्सेदारी का सौदा पक्का हो गया, इसीलिए हम यही मानकर चलें कि बड़ी मछली ने छोटी को निगल लिया है। इस सौदे के भंग होने की कोई गुंजाइश अब नहीं है। प्रसंगवश, फ्लिपकार्ट की स्थापना सचिन बंसल और बिन्नी बंसल ने वर्ष-2007 में की थी। यह कंपनी करीब साढ़े चार सौ रुपए से शुरू की गई थी। मगर अब भारत के ऑनलाइन बाजार में फ्लिपकार्ट की हिस्सेदारी 43 फीसदी है और उसका सकल मूल्य (वैल्यूएशन) है, 1.39 लाख करोड़ का। सवाल है कि जिस कंपनी ने 11 साल की छोटी अवधि में साढ़े चार सौ रुपए से 1.39 लाख करोड़ तक की यात्रा पूरी कर ली, जिस कंपनी का कारोबार भारत से बाहर सिंगापुर, फिलीपींस, मॉरीशस आदि एक दर्जन देशों में फैल गया हो और जिसके पास अमेरिका की माइक्रोसॉफ्ट, सिंगापुर की टेनसेंट होल्डिंगस जैसी कंपनियां निवेशक के तौर पर मौजूद हों, वह आखिर बिकी क्यों? यह सही है कि छह नवंबर-2016 को सरकार द्वारा सनककर लिए गए
नोटबंदी के निर्णय का खामियाजा तमाम कंपनियों की तरह फ्लिपकार्ट ने भी भुगता, बीते साल उसे 8870 करोड़ का घाटा हुआ था। लेकिन अगर हम इस घाटे को उसके बिकने की वजह मान लें तो यह सही नहीं होगा।

फ्लिपकार्ट इसलिए बिकी, क्योंकि वह अमेरिकी ई-कॉमर्स कंपनी अमेजॉन के साथ तगड़ी प्रतिस्पर्धा में फंस गई थी। मोदी सरकार ने तमाम क्षेत्रों में शत-प्रतिशत विदेशी निवेश (एफडीआई) का जो खतरनाक निर्णय लिया है, उसके बाद अमेजॉन का भारत के बाजार पर कब्जा बढ़ता चला गया है। इस समय दो ही देश दुनिया में बड़े बाजार हैं, भारत और चीन। चीन की कहानी यह है कि एक तरफ तो वह दुनियाभर के बाजारों पर कब्जा करता चला जा रहा है, तो दूसरी तरफ अपनी कंपनियों को संरक्षण देता है और अपने बाजार को भी दुनिया की कंपनियों के लिए आसानी से नहीं खोलता। लिहाजा अमेजॉन ने पूरी कोशिश की मगर वह चीन के बाजार में अपनी जगह नहीं बना पाई। चीन की सरकार ने अपने यहां की ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा को भरपूर संरक्षण दिया, करों में भारी रियायत दी, दूसरी तरफ अमेजॉन की टेक्स लायबिलिटी (दूसरे देशों में कारोबार करने वाली कंपनियों को वहां की सरकारों को अपने कारोबार का हिसाब देना पड़ता है और उस पर निर्धारित दर
से टेक्स भी, इसे ही टेक्स लायबिलिटी कहते हैं) पर सख्त निगरानी बैठा दी। अत: वहां इसकी दाल नहीं गली।

इधर, भारत में रामराज्य है। टेक्स लायबिलिटी के लिए तो कोई तंत्र ही नहीं है। लिहाजा, अमेजॉन का हमारे देश के ई-कॉमर्स पर तेजी से कब्जा हो रहा है। फ्लिपकार्ट 80 श्रेणियों के करीब आठ करोड़ उत्पादों की आपूर्ति करती है, जबकि अमेजॉन 140 करोड़ श्रेणियों के 10 करोड़ से अधिक उत्पादों की। बताया जाता है कि अमेजॉन से खरीदा गया सामान फ्लिपकार्ट के मुकाबले कुछ सस्ता भी पड़ता है। इस कारण फ्लिपकार्ट प्रतिस्पर्धा में पिछडऩे लगी। यहां एक तथ्य और गौरतलब है। फ्लिपकार्ट को खरीदने के लिए अमेजॉन ने भी कम पापड़ नहीं बेले। बीते साल दिसंबर में उसने फ्लिपकार्ट को 1.47 लाख करोड़ का प्रस्ताव दिया था। लेकिन यह रकम फ्लिपकार्ट के वैल्यूएशन 1.39 लाख करोड़ से ज्यादा थी। फिर, अमेरिका में वॉलमार्ट और अमेजॉन में गलाकाट प्रतिस्पर्धा भी चल रही है। इसीलिए अगर फ्लिपकार्ट को उसके वैल्यूएशन से ज्यादा में अमेजॉन खरीद लेती तो मामला विश्व व्यापार संगठन के प्रतिस्पर्धा आयोग में पहुंचता और सौदा हो नहीं पाता।

बहरहाल, फ्लिपकार्ट इसलिए बिकी कि वह अमेजॉन के सामने टिक नहीं पाई और उसे वॉलमार्ट ने इसलिए खरीदा कि उसकी गिद्धदृष्टि भारत के खुदरा कारोबार पर है। हमारी सरकार को व्यापारियों के दबाव में खुदरा कारोबार में एफडीआई के निर्णय को वापस लेना पड़ा था। लिहाजा, वॉलमार्ट ने भारत के खुदरा व्यापार पर कब्जा करने का दूसरा तरीका खोजा और फ्लिपकार्ट को खरीद लिया। मोटा अनुमान यह है कि हमारे देश में दो करोड़ से ज्यादा खुदरा कारोबारी हैं, जो हर साल 33 लाख करोड़ का कारोबार करते हैं। संसद में पेश 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में ई-कॉमर्स का कारोबार अभी 2.2 लाख करोड़ का है, जबकि इसमें साढ़े 19 फीसदी की सालाना वृद्धि हो रही है। अगले 10 साल में यह कारोबार 13 लाख करोड़ तक जा पहुंचेगा और तब तक खुदरा कारोबार 110 लाख करोड़ से भी ऊपर निकल जाएगा। वॉलमार्ट की तैयारी इन्हीं दोनों पर कब्जा करने की है। वैसे भी वेस्ट प्राइज के नाम से देश के तमाम शहरों में उसके स्टोर खुल ही रहे हैं। आठ राज्यों के 19 शहरों में इसके 22 स्टोर खुल चुके हैं, जबकि इस साल के अंत तक 50 स्टोर और खोले जाने हैं। लेकिन यह स्टोर्स खुला खेल फर्रुखाबादी नहीं कर पा रहे हैं।

दरअसल, वेस्ट प्राइज वॉलमार्ट की तीसरी फ्रेन्चाइजी है। पहली तो वॉलमार्ट ही है। दूसरी भारत-सिंगापुर की कंपनी टाइगर गलोबल है, जिसे वॉलमार्ट ने 2016 में खरीदा था। टाइगर गलोबल ने वेस्ट प्राइज को खरीदा है। यानी वेस्ट प्राइज माया तो वॉलमार्ट की ही है, लेकिन राक्षस और उसकी माया में फर्क होता है। इसीलिए वेस्ट 
प्राइज के स्टोर धड़ाधड़ खुल रहे हैं, फिर भी ये खुदरा कारोबारियों की कमर तोडऩे लायक सस्ता सामान नहीं बेच पा रहे हैं। फिर वेस्ट प्राइज के स्टोर बड़े शहरों में हैं और जगह-जगह खुले नहीं हैं, लिहाजा इनसे दूर रहने वाले लोग इनमें खरीदारी के लिए जाते नहीं हैं, क्योंकि जितने की बचत होती है, उतने से ज्यादा स्टोर तक पहुंचने का किराया लग जाता है या पेट्रोल फुंक जाता है। इसीलिए गनीमत है। लेकिन फ्लिपकार्ट का मालिकाना हक वॉलमार्ट के पास पहुंचने के बाद यह गनीमत नहीं रहेगी। देश में 45 करोड़ इंटरनेट यूजर हैं। अभी केवल 14 करोड़ नेट यूजर ऑनलाइन खरीदारी करते हैं। मगर आगे जाकर न केवल इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ेगी, बल्कि ऑनलाइन खरीदारी करने वालों की भी बढ़ेगी, क्योंकि सरकार भी तो डिजिटलीकरण पर उतारू है। तब देश के खुदरा कारोबार की कमर टूट जाएगी। अभी जिस आमदनी से खुदरा कारोबारियों के घर चल रहे हैं, वह वॉलमार्ट के बटुए में जाएगी। वॉलमार्ट वह कंपनी है, जिसने 26 देशों में खुदरा व्यापार को ध्वस्त कर दिया है। यह कंपनी तभी तक सस्ता सामान बेचती है, जब तक दुकानदारों की कमर नहीं टूटती, उसके बाद वह ग्राहकों को लूटती है। कारण यही है कि खुद अमेरिका के तीन राज्यों लुईसियाना, पेन्सिलवेनिया और न्यूजर्सी में इसे व्यापार की इजाजत नहीं है। अत: वह वक्त आ गया है, जब देशभर के व्यापारी लामबंद होकर सरकार पर फ्लिपकार्ट की बिक्री रोकने का दबाव बनाएं।






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