समाचार ब्यूरो
23/06/2018  :  18:34 HH:MM
भारत माता के महान और समर्पित सपूत
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दे श के उच्च कोटि के शिक्षा शास्त्री, देश की एकता और अखण्डता के संरक्षक, विभाजन के दंश से त्रस्त देशवासियों के तारणहार, राष्ट्रवादी विचारधारा से ओत-प्रोत, ’जनसंघ नामक‘ राजनीतिक पार्टी के संस्थापक, देश के सांस्कृतिक, यथार्थवादी और भविष्यदृष्टा चिंतक, राजनीतिज्ञ, जम्मू-काश्मीर को भारत से पूरी तरह एकाकार करने के प्रयास में अपने प्राणों की आहुति देने वाले डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को नि:सन्देह बिना किसी झिझक के भारतमाता का महान और समर्पित सपूत कहा जा सकता है।

1940 में ही गांधीजी ने उनसे कहा था-’सृष्टि और उसके प्राणियों की रक्षा के लिए समुद्र मंथन से निकला विष पीकर जो कार्य भगवान शिव ने किया था, उसी प्रकार भारतीय राजनीति का विष पीने के लिए भी किसी की आवश्यकता थी, तुम वहीं काम करोगे।‘ भारतमाता के ऐसे महान सपूत का जन्म 07 जुलाई 1901 को भवानीपुर, उत्तर कोलकाता में हुआ था। इनके पिता का नाम सर आसुतोष मुखर्जी और माता का नाम योगमाया देवी था। बंगाल का यह मुखर्जी परिवार डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पितामह श्री गंगा प्रसाद मुखर्जी के समय से ही कोलकाता के सर्वाधिक प्रतिष्ठित परिवारों में गिना जाता था। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पिता सर आसुतोष मुखर्जी ने तो अपने विद्वता, प्रतिष्ठा, निष्ठा और देश भक्ति के माध्यम से अपने कुल की प्रतिष्ठा को असीम ऊंचाईयो तक पहुंचाया था। गणित, संस्कृति, विधि और भौतिक विज्ञान सहित अनेक विषयों में विशिष्ट योग्यता रखने वाले सर आसुतोष मुखर्जी ने अपने छात्र जीवन में ही विश्वव्यापी प्रसिद्धि प्राप्त कर ली थी। उन्होंने ज्यामितीय गणित के कुछ अत्यन्त जटिल प्रश्नों का समाधान इस प्रकार खोजा कि उनकी इस खोज को मुखर्जी थ्योरम के नाम से जाना गया और उन्हें लंदन की मैथमेटिकल सोसाइटी का सदस्य मनोनीत किया गया। 1904 में इन्हे कोलकाता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद के साथ ही कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर भी नियुक्त किया गया । 1923 में डॉ. श्यामा प्रसाद ने एम.ए. की परीक्षा विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान पर रहते हुए उत्तीर्ण की। इसके अगले ही वर्ष 1924 में उन्होंने बेचलर ऑफ लॉ की परीक्षा भी विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान पर रहते हुए उत्तीर्ण की। कोलकाता हाईकोर्ट में वकालत के साथ-साथ कोलकाता विश्वविद्यालय के कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य करने के अतिरिक्त वह पत्रकारिता से भी जुड चुके थे। 

उन्होंने बंगबाणी नाम बंगला भाषा की पत्रिका भी निकाली। 1934 में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को कलकत्ता विश्वविद्यालय के उस सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित किया गया, जिस पर कभी उनके पिता सर आसुतोष मुखर्जी आसीन रहे थे। कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहते हुए डॉ. मुखर्जी ने जो सबसे पहला और प्रमुख कार्य किया-वह शिक्षा प्रणाली में अंग्रेजी भाषा की प्रधानता को समाप्त करते हुए बंगला व अन्य भाषाओं को प्रमुख स्थान देना। उन्होंने बंगला भाषा की पाठ्य पुस्तकें तैयार कराने के साथ बंगला भाषा की समृद्धि के लिए भी महत्वूपर्ण कदम उठाए। विश्वविद्यालय में अपने चार वर्ष के कार्यकाल उन्होने पूरी तरह ध्यान रखा कि ऐसे शिक्षित युवा वर्ग तैयार हो जो राष्ट्र के निर्माण और अपनी सभ्यता, संस्कृति को बचाए रखने में अपनी भूमिका सहज रूप से समझे और पूर्णत: समर्पित होकर अपने दायित्वों का निर्वहन करें। 1938 के पश्चात् डॉ. मुखर्जी ने यह तय किया कि देश को दमनकारी और अलगाववादी शक्तियों से बचाने के लिए उन्हें देश की सक्रिय राजनीति में जाना ही होगा। 1940 में ही तात्कालीन अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर के अस्वस्थ हो जाने के कारण बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को हिन्दू महासभा का कार्यवाहक अध्यक्ष नियुक्ति किया गया।

1940 में जो चुनाव हुए उसमें बंगाल में मुस्लिम लीग को विजय मिली। अपनी योजना के तहत मुस्लिम लीग ने बंगाल में भीषण दंगे कराए, विशेषकर ढाका में तो ये साम्प्रदायिक दंगे असंख्य हिन्दुओं के काल बनकर आए थे। चूकि इन दंगों का केन्द्र ढाका था, इसीलिए हिन्दुओं के व्यापक जनसंहार की खबरों ने डॉ. मुखर्जी को विचलित कर दिया और बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार तथा ब्रिटिश सरकार के लाख रोकने के बावजूद अपने प्राणों की परवाह किए बगैर इन दंगों में प्रमुख भूमिका निभाने वाले ढाका के नवाब के महल में वह अकेले ही जा पहुंचे। वहां से लौटकर उन्होंने पूरे देश को लीग की घातक योजना से अवगत कराया। जिसके फलस्वरूप सरकार को विवश होकर इन दंगो को रूकवाना पडा और लीग की योजना धरी-की-धरी रह गई। पर बड़ी बात यह कि डॉ. मुखर्जी एक यथार्थवादी राजनेता थे, उन्होंने कृषक प्रजा पार्टी को जो मुस्लिम लीग की सहयोगी थी, उसे अपनी सूझबूझ से अलग कर लिया और फजहुलहक के नेतृत्व में नई सरकार बनवाई।
डॉ. मुखर्जी स्वयं इस सरकार में वित्त मंत्री बने।

देश-विभाजन की विभीषिका के पश्चात् 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत में जब प्रथम सरकार का गठन हुआ तो कांग्रेस पार्टी द्वारा उन्हें देश के प्रथम मंत्रिमण्डल में शामिल होने के लिए निमंत्रण दिया गया। सच्चाई यह है कि कांग्रेस में सरदार पटेल जैसे नेता उन्हें बहुत आदर और सम्मान देते थे और इस पहल में उनका महती योगदान था। राष्ट्र के नव निर्माण की दिशा में राष्ट्र सेवा के अवसर को न चूकने देने के लिए डॉ. मुखर्जी ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और उन्हें उद्योग मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने अत्यन्त सफलतापूर्वक अपने दायित्व का निर्वहन किया। अंत में अप्रैल 1950 को डा मुखर्जी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। पर 1947 में जब पाकिस्तान ने कबाइलियों के माध्यम से जम्मू-काश्मीर पर हमला कर करीब उसके एक तिहाई हिस्से पर कब्जा कर लिया, तभी से देश के राजनीतिक हालात बड़ी तेजी से बिगडऩे लगें। पण्डित नेहरू जिस प्रकार पाकिस्तान के प्रति दुर्बलता का परिचय दे रहे थे, उसने डॉ. मुखर्जी को किसी भावी खतरे के प्रति आशंकित
ही नहीं, चिंतित भी कर दिया था। पाकिस्तान ने काश्मीर के हिन्दुओं के साथ पूर्वी बंगाल के डेढ़ करोड हिन्दुओं को भी त्रस्त करना शुरू कर दिया था। डॉ. मुखर्जी ने ऐसी स्थिति में तुरंत नेहरू सरकार पर दबाव डालते हुए स्मरण कराया कि बंगाल विभाजन के समय वे पूर्वी बंगाल के हिन्दुओं के प्रति प्रत्येक प्रकार से रक्षा का आश्वासन व वचन दे चुके थे, अत: अब वचन निभाने का समय आ गया है। इसके पश्चात् डॉ. मुखर्जी ने देश की तात्कालीन राजनीतिक परिस्थितियो का ऑँकलन करने के पश्चात् यह निश्चय किया कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ही वह संगठन है जो एक नए राजनीतिक दल का आधार बन सकता है। इसी भित्ति पर जनवरी 1951 में दिल्ली में भारतीय जनसंघ के नाम से एक नए राजनीतिक दल का गठन हुआ, जिसके डॉ. मुखर्जी प्रथम अध्यक्ष बनें।






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