समाचार ब्यूरो
18/08/2018  :  17:06 HH:MM
आंखों से बोलते थे अटल जी
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प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात ने कहा था कि "जिस देश का राजा कवि होगा उस देश में कोई दुखी न होगा" – अटल जी के प्रधानमंत्रित्व काल में यह बात चरितार्थ हो रही थी.

स्वातंत्र्योत्तर भारत के नेताओं में कुछ ही ऐसे नेता हुए हैं जो विपक्षियों से भी सम्मान पातें हों. और ऐसे जननेता तो एक-दो ही हुए हैं जो विपक्षियों से न केवल सम्मान पातें हैं बल्कि दिग्गज से दिग्गज विपक्षी नेता भी उनकें विषय में चर्चा करते हुए न केवल आदर अपितु श्रद्धा भाव से ही बात करता है. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी निस्संदेह आज एकमात्र ऐसे जननेता हैं जो जननायकों की श्रेणी में सम्मिलित होकर सम्पूर्ण भारत वर्ष का आदर और दुलार पा रहें हैं. जननायक की बातकरें तो दूसरा नाम जयप्रकाश नारायण जी का नाम आता है, राममनोहर लोहिया जी का नाम आता है इन्हें भी सम्पूर्ण भारत वर्ष श्रद्धा से स्मरण करता है. स्वातंत्र्योत्तर भारत में यद्दपि इंदिराजी भी स्मरणीय जननेता रहीं है किन्तु आपातकाल का ग्रहण व उनके शासन काल में हुआ लोकतान्त्रिक परम्पराओं का ह्रास, उनकी स्मृतियों को कटुक बना देता है. लोकतंत्र में जहां निर्वाचित होना एक उपलब्धि समझा जाता है वही जनमानस में बसी स्मृतियाँ ही नेता को जननेता बनाती है! इस दृष्टि से देखें तो हमें यह स्पष्ट ही आभाषित होता है कि अटल बिहारी वाजपेयी उस श्रेणी के प्रथम  स्वातंत्रयोत्तर जननेता हैं जो उसके भी आगे जननायक बननें की राह पर हैं और भारत वर्ष की स्मृतियों में अपनें जीवन काल में ही अमर हो गएँ हैं. क्या अटल जी के दल के और क्या उनसे विलग दल के, क्या उनकें विचारों के और उनसे अलग विचारों के सभी राजनीतिज्ञ
कही किसी नेता के सामनें मौन और श्रद्धावनत रहतें हैं तो वे अटलजी ही हैं. जनता ने उन्हें बड़े ही दुलार और सम्मान से एक उपनाम दिया "अटल जी". अटल जी जब चौक-चोराहों से लेकर लोकसभा-राज्यसभा तक में बोल रहे होते थे तब जैसे घड़ी की सुईयां भी मौन होकर ठहरनें को उत्सुक होनें लगती थी. पिछले कुछ वर्षों से जबकि अटलजी स्वयं अपनी ही चेतना-संज्ञा-प्रज्ञा से विस्मृत होकर अपनें कक्ष में सिमट गए थे तब भी उनका वैचारिक विस्तार प्रत्येक भारतीय के ह्रदय तक और विश्व भर में फैले उनकें करोड़ो प्रशसंकों के मानस तक है.
अटलबिहारी वाजपेयी जी ने मात्र एक राजनीतिज्ञ और सत्ता पुरुष का जीवन नहीं जिया, सत्ता में तो वे अल्पकाल को ही रहे. उनका सम्पूर्ण जीवन संघर्ष और श्रम की भेंट चढ़ गया तब जाकर कहीं वे अपनें विचारों को सत्ता सदन में स्थापित करा पाए थे. 16 मई से 1 जून 1996 तथा फिर 19 मार्च 1998 से 22 मई 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे अटल जी भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य रहे और 1968 से 1973 तक उसके अध्यक्ष भी रहे. आजीवन राजनीति में सक्रिय रहे अटल जी वैचारिक अधिष्ठानों से घनिष्टता बनाए रहे। 

उनकी राजनैतिक अवधारणा, कल्पना और योजना दीर्घकालीन दृष्टि से सधी होती थी। तात्कालिक दृष्टि और तात्कालिक परिणाम की चिंता तो जैसे उन्हें छूती भी नहीं थी, यही कारण था कि जो उनकें संपर्क में आता था वह धीर-गंभीर और शांत चित्त राजनीतिज्ञ बन जाता था। अटल जी नें अपनें जीवन काल में हजारों राजनीतिज्ञों को गढ़ा और फिर उन्हें राष्ट्रवाद के यज्ञ में समिघा डालनें योग्य बनाकर यज्ञ पीठ पर बैठाया किन्तु कभी श्रेय लेनें और नियामक होनें की राजनीति नहीं की. वे सदैव नेतृत्व करते किन्तु साथियों को स्वयं के अनुगामी रहनें का विनम्र आभास कराते दिखते थे। मुझे उनके साथ वर्ष 1985 में एक लंबी रेल यात्रा करने का सौभाग्य मिल चुका है. हुआ यह था कि वे जीटी ट्रेन से ग्वालियर से नागपुर जा रहे थे. मैं उस समय मेरे गृह ग्राम आमला में रहा करता था जहां वायुसेना केंद्र होने के कारण जीटी रूका करती थी. हमें जैसे ही पता चला कि अटलजी  यहां से निकल रहें हैं हम भोजन अल्पाहार आदि लेकर स्टेशन पहुंच गए. जीटी आमला स्टेशन पर बड़ी मुश्किल से एक मिनिट ही रूका करती थी और इतनें में कोई बात संभव थी नहीं अत: मैंने यह योजना बना ली की नागपुर तक जाऊंगा और उनसे दस पांच मिनिट बात करने का प्रयास करूंगा.  आमला स्टेशन से जब गाड़ी निकली और मैंने फर्स्ट क्लास के उनके कैबिन में झांका और अंदर आने की अनुमति मांगी, उन्होंने सहर्ष अन्दर बुला लिया और जब उन्हें पता चला कि मैं केवल उनसे दस पांच मिनिट चर्चा के मोह में नागपुर तक जा रहा हूं तो वे बड़े प्रसन्न भी हुए और मेरी अल्पायु को देखते हुए तनिक आश्चर्यचकित भी हुए. उन्होंने साथ बैठाकर मुझे भोजन भी कराया और आमला से नागपुर तक लगभग साढ़े तीन घंटे तक विभिन्न विषयों पर चर्चा करते रहे. मैंने बड़े समीप से उन्हें देखा कि कब किस बात पर उनकी त्यौरियां चढ़ती उतरती हैं और कब उनकी आँखे अलग अलग विषयों पर अलग अलग प्रकार से फैलती, सिकुड़ती व अलग अलग आकार लेती हैं. मैंने उन्हें उन साढ़े तीन घंटो में इतना गहराई से पढ़ा था कि आज मैं कह सकता हूँ कि अटलजी की आंखो की भाषा को पूर्ण तो नहीं किंतु थोड़ा बहुत तो मैं समझ ही सकता हूं. अटल जी का चमकदार संसदीय जीवन बेदाग ही नहीं अपितु बेहद चमकदार रहा. उनके संसदीय भाषण, आक्षेप, टिह्रश्वपणियां, चर्चाएँ, कवितायें सभी कुछ जैसे एक शोध ग्रन्थ है. अटल जी का संसदीय इतिहास भारत ही नहीं अपितु विश्व के सभी लोकतन्त्रों में एक सन्दर्भ के रूप में आकलित होता है तो इसके पीछे अटलजी की मेघा-प्रज्ञा के साथ साथ उनकी संवेदना-प्रज्ञा प्रमुख कारण है. उनकें समकालीन बताते हैं कि जब वे संसद में आँखें बंद करके बोलना प्रारम्भ करते थे तो लगता था अटल जी जागते हुए नहीं बल्कि सोते हुए बोल रहें हैं किन्तु जो शब्द वे बोलते थे वे शब्द संवेदना, व्यथा, पीड़ा और अनुभव की शाब्दिक पराकाष्ठा को पार कर महसूसनें के धरातल पर उतर आते थे. जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी तक की उनकी गौरव और गरिमामय राजनैतिक यात्रा तो उनकी वैचारिक यात्रा का एक अंश मात्र है. वस्तुत: वे दार्शनिक राजनीतिज्ञ थे जिस कारण वे कई बार व्यवहारिक राजनीति में अनफिट होनें का आभास देते थे. किन्तु आनंद तब आता था जब वे जिस क्षण अनफिट होनें का आभास देते उसके दुसरे ही क्षण वे अपनें कृतित्व और वाक् चातुर्य से विरोधियों को पटखनी दे देते और उन्हें चारो खानें चित्त कर, वापिस अपनी बाहों में लेकर, अपनें विचारों से साम्य बैठा लेनें का दुलार पूर्ण
अवसर भी देते दिखते. यही वह कला या विधा थी जो उन्हें अटलजी बना गई। कविताओं और संवेदनाओं की परिधि में आजीवन खड़े इस जननायक ने जब 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में जब पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके राष्ट्रवाद के भाव को क्षितिज पर पहुंचाया तब सम्पूर्ण विश्व झंकृत हो गया था. उन्होंने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया और वैश्विक समुदाय को भारत की शक्ति का निर्विवाद परिचय दिया तब सभी आश्चर्य में डूब गए थे।






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