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समाचार ब्यूरो
23/09/2018  :  09:57 HH:MM
जादूई कोशिकाओं का मिलान- जीनबंधु द्वारा जीवन का एक उपहार
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किसी ने सही कहा है कि जरूरत में जो साथ दे, वास्तव में वही सच्चा मित्र होता है। मेरे लिए जीनबंधु और जोरावर जी बिल्कुल वैसे ही हैं। यह कहना है 18 वर्षीय तेजवीर का। हिसार के रहने वाले तेजवीर को चार साल पहले एक्यूट लिंफोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (एएलएल) बीमारी से ग्रस्त होने की बात पता चली। इस घातक बीमारी से लडऩे और उसका जीवन बचाने का एकमात्र समाधान बोन मैरो ट्रांसह्रश्वलांट था। वास्तव में भारत अप्रयुक्त जेनेटिक ज्ञान का कूप स्रोत है जहां इस अवधारणा के बारे में जागरूकता की कमी है।
मज्जा (बोन मैरो) के ट्रांसह्रश्वलांट के लिए मानव ल्यूकोकाइट एंटिजेन (एचएलए) खोजना कोई चमत्कार से कम नहीं है जहां भारतीय जेनोटाइप के बहुत कम डेटा और मुीभर भारतीय रजिस्ट्रीज हैं। जीनबंधु नाम के एनजीओ ने इस विशेष क्षेत्र में विश्वसनीय डेटा को सफलतापूर्वक बनाए रखा है और पिछले कई वर्षों में स्वेच्छा से दान करने वालों की भर्ती कर एक स्टेम सेल रजिस्ट्री तैयार की है। तेजवीर सिंह की महत्वाकांक्षा थी कि वह ओलंपिक में एक पहलवान के तौर पर भारत का प्रतिनिधित्व करे। दुर्भाग्य से उसके शरीर में इस घातक बीमारी का पता चला जो तब होता है जब मज्जा की एक कोशिका अपने डीएनए में गड़बडिय़ां पैदा कर लेती है। उसके सपने, उसकी आंखों के सामने ही धूमिल होने लगे। परिवार के लोगों ने तेजवीर के लिए उसके मैच का मज्जा तलाशना शुरू किया, लेकिन उसके परिवार में किसी से उसका मज्जा मेल नहीं खाया। इस तरह से इस घातक बीमारी से बचने का एकमात्र उपाय गैर रिश्तेदार डोनर से मज्जा का ट्रांसह्रश्वलांट था। परेशानी की इस घड़ी में डाक्टरों ने उसे आशा की एक किरण दिखाई। उन्हें जीनबंधु की रजिस्ट्री से मेल खाता मज्जा मिला और दान करने वाला भारतीय था। अपने व्यापक डेटाबेस के साथ जीनबंधु ने जोरावर सिंह को चिन्हित किया जोकि एक दिहाड़ी बढ़ई और तेजवीर का जेनेटिक मित्र था।मज्जा की हार्वेस्टिंग से स्टेम सेल्स निकालना सुगम होता है जोकि ऐसे रक्त और जेनेटिक गड़बडिय़ों के लिए उपचारात्मक बीज हैं। यह कोई दर्दनाक प्रक्रिया नहीं है जैसा कि एक दशक पहले होता थी, लेकिन इसको लेकर जागरूकता केवल उन्हीं परिवारों तक सीमित है जो स्वयं इस दर्दनाक कटु अनुभव से गुजर रहे हैं। भारत में ट्रांसह्रश्वलांट टेक्नोलाजी अत्यधिक विशेषीकृत और उन्नत है, लेकिन पंजीकृत दानकर्ता की कमी, सहयोग एवं कार्रवाई के अभाव के चलते हजारों लोग इस बीमारी से हार मान लेते हैं। जीनबंधु विभिन्न समुदायों और क्षेत्रों से लोगों का डेटाबेस बनाए रखते हुए इस खाई को पाटने की दिशा में अनवरत कार्य कर रहा है।






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