समाचार ब्यूरो
19/10/2018  :  11:50 HH:MM
सजा और सबक
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हिसार की विशेष अदालत ने हत्या और अन्य अपराधों में दोषी पाए गए स्वयंभू बाबा रामपाल और उसके बेटे सहित पंद्रह लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत का यह फैसला इस बात का साफ संदेश है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।

चार साल तक चली सुनवाई के बाद रामपाल और उसके छब्बीस अनुयायियों को गुरुवार को दोषी करार दिया था। तथाकथित संत रामपाल पिछले दो दशकों से हिसार के बरवाला कस्बे में आश्रम चला रहा था, जो गैरकानूनी और अनैतिक गतिविधियों का अड्डा बना हुआ था। संगीन अपराधों में लिप्त बाबा और उसके चेलों को सजा हो गई, यह तो ठीक है, लेकिन यह पूरा घटनाक्रम कई गंभीर सवाल खड़ा करता है। इससे पता चलता है कि कैसे लंबे समय तक पुलिस, स्थानीय प्रशासन और सरकार की नाक के नीचे एक आश्रम अपराध के गढ़ में
तब्दील होता गया और किसी को भनक तक नहीं लगी। रामपाल, राम रहीम और ऐसे ही अन्य छद्म साधु-संतों, बाबाओं के कारनामे हैरान करने वाले हैं। ऐसे बाबाओं का कारोबार अज्ञानी जनता के सहारे तो फलता-फूलता है ही, साथ ही बिना सरकारी मेहरबानी के भी यह सब संभव नहीं है। तमाम नेता ऐसे बाबाओं के साथ मंचों पर फोटो खिंचाते और और उनके आश्रमों में सिर झुकाते नजर आते हैं। यह ऐसे बाबाओं को खुला राजनीतिक संरक्षण प्रदान करना है और भक्तों की नजर में बाबा में हैसियत को बनाता है। सरकार की इससे ज्यादा और लापरवाही क्या हो सकती है कि उसके राज में अनैतिक कारोबार चलते रहें और वह सोती रहे। राज्य का पुलिस का खुफिया तंत्र एकदम बेखबर हो। जिस आश्रम में जाने वाले हजारों भक्त हों, वहां पुलिस का खुफिया तंत्र इस बात का पता भी नहीं लगा पाए कि आश्रम में हथियारों का जखीरा जमा है, अनैतिक काम हो रहे हैं, तो फिर यह पुलिस तंत्र सहित पूरी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करता है।






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