समाचार ब्यूरो
21/10/2018  :  11:27 HH:MM
चौथे स्तंभ की ‘अकबर’ शैली
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वामपंथियों द्वारा छेड़े गए मी टू अभियान का शिकार बने विदेश राज्य मंत्री मुबाशर जावेद अकबर जिन्हें भारतीय पत्रकारिता जगत में एम जे अकबर के नाम से जाना जाता है, ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया है। उनपर लगभग 20 महिलाओं द्वारा जिनमें अधिकांश पत्रकारिता जगत से जुड़ी महिलाएं हैं, ने यौन शोषण का आरोप लगाया है।

बड़े आश्चर्य की बात है कि जिस व्यक्ति पर शिक्षित व समाज एवं पत्रकारिता जगत में आदर व सम्मान रखने वाली एक दो नहीं बल्कि लगभग 20 महिलाओं ने अपने साथ होने वाले यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाया हो वह व्यक्ति स्वयं को बेगुनाह बताने की कोशिश करता देखा गया। परंतु आरोपों के लगने के बाद लगभग एक पखवाड़े तक की गई आनाकानी के बाद पिछले दिनों नरेंद्र मोदी सरकार के इस ‘अय्याश’ मंत्री को आखिरकार इस्तीफा देना ही पड़ा। मज़े की बात तो यह है कि इतनी महिलाओं द्वारा एक साथ आरोप लगाने के बावजूद यह मंत्री स्वयं को बेगुनाह बताने की कोशिश कर रहा है। और अपनी इसी कोशिश के तहत अकबर ने इनमें से एक भुक्तभोगी महिला पत्रकार प्रिया रमानी के विरुद्ध अपराधिक मानहानि का मुकद्दमा भी दायर कर दिया है। अकबर ने केवल अपने देश की उदीयमान युवा महिला पत्रकारों पर ही हाथ साफ करने की कोशिश नहीं की बल्कि विदेशी महिला पत्रकारों ने भी अकबर पर यौन दुव्र्यहार का आरोप लगाया। गोया एम जे अकबर पत्रकारिता जगत का एक अंतर्राष्ट्रीय अय्याश व व्याभिचारी व्यक्ति है जिसने अपने चेहरे पर बौद्धिकता का नकाब डाल कर पत्रकारिता जैसे पवित्र व जि़म्मेदाराना पेशे को कलंकित करने का काम किया है।

‘मी टू’ अभियान को लेकर तरह-तरह की बातें की जा रही हैं। कुछ लोग इस मुहिम को सही बता रहे हैं तो कुछ का यह भी कहना है कि यौन शोषण का आरोप लगाने वाली महिलाएं आखिर इतने लंबे अंतराल के बाद ही अपना-अपना मुंह क्यों खोल रही हैं? यदि किसी महिला की किसी पुरुष के साथ कोई सहमति नहीं बनती तो वह महिला पहली बार छेड़छाड़ करते समय ही उसका विरोध क्यों नहीं करती? यह भी कहा जा रहा है कि अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए महिलाएं स्वयं परिस्थितियों से समझौता करते हुए रज़ामंदी के साथ यौन शोषण का शिकार हो जाती हैं। और परिस्थितियां व समय देखकर अपनी सुविधा के अनुसार किसी पुरुष पर आरोप मढ़ देती हैं। एक सवाल यह भी है कि क्या पत्रकारिता जगत में ‘अकबर महान’ ही सबसे बड़ा अय्याश व्यक्ति था? या फिर पत्रकारिता से जुड़ी और भी सैकड़ों महिलाएं अपने- अपने ‘अकबरों’ के जाल में फंसी हुई हैं? मिसाल के तौर पर कुछ वर्ष पूर्व देश के एक जाने-माने सत्ता समर्थक टीवी चैनल में काम करने वाली एक महिला पत्रकार ने न केवल अपने ऊपर यौन उत्पीडऩ किए जाने का आरोप टी वी चैनल के स्वामी पर लगाया था बल्कि यह तक कहा था कि उसे सत्ता से संबंधित अन्य विशिष्ट व्यक्तियों को ‘खुश’ करने के लिए भी दबाव डाला जाता था। उस महिला पत्रकार ने उस समय अपनी आवाज़ बुलंद करने की कोशिश भी की परंतु उसे अपनी नौकरी भी गंवानी पड़ी और उसका साथ देने व उसे न्याय दिलाने के लिए कोई उसके साथ खड़ा नहीं हुआ। उधर पत्रकारिता जगत की एक और सनसनी समझी जाने वाली शख्सयत तरूण तेजपाल अपने ऐसे ही कर्मों की सज़ा भुगत रहा है। एक ओर साफ-सुथरी छवि रखने वाले ईमानदार पत्रकार विनोद दुआ का नाम भी ऐसे ही ‘रसिया पत्रकारों’ की सूची में आ गया है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या देश के लोकतंत्र की रक्षा करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का दावा करने वाला स्वयंभू चौथा स्तंभ इन चंद नामों के उजागर या बदनाम होने के बाद अब साफ-सुथरा हो जाएगा? इस क्षेत्र में और भी न जाने कितने ‘अकबर’ तो अभी भी भरे पड़े हैं परंतु क्या यौन उत्पीडऩ का शिकार सभी महिलाएं प्रिया रमानी, गज़ाला वहाब, सबा नकवी या माजली कैंप जैसी हिम्मत दिखाने का साहस कर सकेंगी? या फिर ‘मी टू’ जैसा अभियान प्रत्येक वर्ष दो वर्ष बाद छेड़े जाने की ज़रूरत है? इस अभियान में जिस प्रकार के गंभीर व बौद्धिकता का आवरण डाले लोगों के असली चेहरे सामने आ रहे हैं उससे यह भी स्पष्ट हो गया है कि पत्रकारिता जगत में भी ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ वाली स्थिति पैदा हो चुकी है। टीवी चैनल्स में तो खासतौर पर महिला प्रस्तोताओं का चयन ही उनकी सुंदरता, उनकी वार्ता शैली, आवाज़ व अंदाज़ को देखकर ही किया जाता है। हकीकत तो यह है कि आज भी सैकड़ों महिला पत्रकार अपने उज्जवल भविष्य को ध्यान में रखते हुए अपने चैनल के स्वामियों या उच्चाधिकारियों के जाल में फंसी हुई हैं। समय के साथ-साथ पत्रकारिता जगत में भी ऐसी बदनामीपूर्ण स्थिति का पैदा होना भी स्वाभाविक प्रतीत होता है। क्योंकि बदलते समय के साथ लगभग सभी क्षेत्रों में नैतिकता व चरित्र का ज़बरदस्त ह्रास होता देखा जा रहा है। खासतौर पर हमारे देश में तो ऐसी- ऐसी सनसनीखेज़ घटनाएं सुनने को मिलती हैं जिनकी कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती। मिसाल के तौर पर जि़म्मेदार राजनीतिज्ञों व राजनैतिक दलों की प्रथम जि़म्मेदारी यही है कि वह देश को साफ-सुथरा, मज़बूत व पारदर्शी शासन दें, जनता का चहुंमुखी विकास व कल्याण हो तथा देश की एकता व अखंडता मज़बूती से बनी रहे। परंतु हकीकत में राजनीति छल-कपट, झूठ-मक्कारी, बेईमानी, सांप्रदायिकता व जातिवाद के सीने पर सवार होकर सत्ता हथियाने का माध्यम मात्र बनकर रह गर्इ  ह।ै इसी पक्र ार धर्म  क्षत्र्े ा म ें स्वय ं को भगवान के रूप म ें पुजवाने की लालसा रखने वाले आसाराम, राम रहीम, रामपाल और न जाने कितने सफेदपोश कलंकी साधुवेश धारी जेल की सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं। यह लोग अब जेल में रहकर दूसरे लोगों को चरित्र निर्माण व नैतिकता का पाठ पढ़ाएंगे। इस प्रकार के उदाहरण यही प्रमाणित करते हैं कि इस समय किसी भी क्षेत्र में चरित्र व नैतिकता की बात नहीं की जा सकती। क्योंकि जब मार्गदर्शक, गुरू तथा सरकार की आलोचना की जि़म्मेदारी उठाने वाला मीडिया व इसके जि़म्मेदार लोग ही स्वयं महिलाओं के यौन शोषण जैसे घृणित आरोपों का शिकार हो रहे हैं ऐसे में आखिर इस समाज को क्या अधिकार है कि वह दूसरों का मार्गदर्शन् करने की कोशिश करे? 67 वर्षीय एम जे अकबर के त्यागपत्र तथा ‘मी टू’ अभियान से प्रोत्साहित होकर अपनी आपबीती सुनाने वाली महिला पत्रकारों ने निश्चित रूप से राहत की सांस तो ज़रूर ली है। परंतु यह सिलसिला एम जे अकबर के त्यागपत्र तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। बल्कि इस अभियान से जुडक़र उन सभी महिला पत्रकारों को अपने उन अय्याश व व्याभिचारी आकाओं के चेहरे से भी अय्याशी का नकाब हटा देना चाहिए। और यदि कोई भी महिला पत्रकार अपने उज्जवल भविष्य के बारे में सोचकर या पैसे अथवा शोहरत की लालच में अथवा किसी दूसरे दबाव के तहत स्वयं को समर्पित कर देती है और चंद वर्षों के बाद फिर किसी ‘मी टू’ जैसे अभियान की प्रतीक्षा करती है तो ऐसा करना भी मुनासिब हरगिज़ नहीं है। अत: चौथे स्तंभ के जितने भी ‘अकबर’ शैली के पत्रकार हों उन सभी के नाम एक के बाद एक इसी मीडिया के माध्यम से उजागर किए जाने चाहिए। अन्यथा चौथे स्तंभ को अपनी निगरानी या आलोचना किए बिना दूसरों पर नजऱ रखने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।






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