समाचार ब्यूरो
21/10/2018  :  11:27 HH:MM
स्वेच्छा से आरक्षण का लाभ छोडऩे की भी पहल हो!
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देश में आज जाति आधारित आरक्षण एक ज्वलन्त मुद्दा है। समाज के कुछ जाति वर्गों को सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए आरक्षण दिया गया है। राजनीतिक दल वोटों के गणित में इस आरक्षण व्यवस्था को बनाए रखना चाहते है।
मगर मुद्दा यह है कि दलित आरक्षण किसको और कब तक? दलित कौन है, दलित को यदि वंचित का पर्याय माना जाये तो ये गौर करना पड़ेगा। वंचित कौन रह गया है। आज भी कई जगह दलितों के साथ वाकई घोर अत्याचार हो रहा है। कहीं दलित वर्ग के दूल्हे को घोड़ी पर नहीं चढऩे दिया जाता तो कहीं घर के पानी की निकासी अगड़ी जातिवालों के घर के सामने से नहीं गुजरने दी जाती है। धार्मिक स्थलों पर भेदभाव किया जाता है। ऐसे सभी मामलों में कानून अपना काम नहीं कर पाता या राजनीतिक दल कानूनी कार्रवाई होने नहीं देते। मैला ढोने की प्रथा पर रोक लगी है, मगर अभी इन्सान को गंदे गटर में उतार दिया जाता है। गटर खोलने के दौरान कई लोगों की तो मौत भी होती रही है। सफाई कर्मचारी आज भी सबसे कम पगार पर शायद सब से कठिन काम करता है, सर्दियों में सफाई के दौरान उनका भीग जाना, इसी तरह पूरा दिन काम करना, शौचालयों में सही हवा निकास न होने के कारण उनका बीमार हो जाना जैसी बातें आम है। मैने एक दफा राष्ट्ीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष केजी बालाकृष्णन को लिखा भी था कि सफाई कारीगर को एक तकनीकी पद माना जाना जाये। जो लोग दुनिया की गंदगी को साफ करते हों उन्हें साधारण श्रमिक नहीं माना जाना चाहिये। इन लोगों को हर किस्म का आरक्षण मिलना चाहिये! मगर अब आरक्षण समस्या बन गया है तो उसका हल क्या है? अब तो रातों रात आरक्षण के नाम पर नेता पैदा हो जाते हैं। कोई पाटीदारों का कोई जाटों का कोई किसी वर्ग का कोई तो किसी का,अब तो कुछ नेता अगड़ों को भी आरक्षण की बात करने लगे हैं। आज के युग में जब देश का ये हाल है तो उस समय क्या रहा होगा जब डॉक्टर अंबेडकर ने ये कानून बनाया होगा ? उनके मन में शायद पीड़ा उठी होगी तो उन्होंने प्रण लिया होगा कि दलित को दलित नहीं रहने देना या कह सकते हैं कि दलित को फलित यानी समृद्ध बनाना उनका विचार रहा होगा। राजनीतिक दल आज जातपात को जिस मुकाम पर ले आयें हैं ऐसा डॉक्टर अंबेडकर ने शायद कभी नहीं सोचा होगा! राजनीतिक दल ही सबसे ज्यादा जातपात फैलाते हैं समाज को बांटते हैं! आज इस समस्या के हल के लिए भी राजनीति के ही कुछ साफ सुथरे लोगों को आगे आना होगा ! जरूरतमन्द को आरक्षण मिले इसकी पहल दलित समाज को ही करना होगी। दलित समाज के जो लोग फलित यानि समृद्ध हैं को डॉ अंबेडकर को साक्षी मान प्रतिज्ञा करनी होगी कि बाबा साहब मैं आपकी कृपा से दलित नहीं रहा, मैं अब फलित समृद्ध तो हंू। मुझे अब किसी आरक्षण की जरूरत नहीं। अब मैं अपने दलित भाइयों के लिए संघर्ष करूंगा। मुझे सामान्य वर्ग में शामिल किया जाए। अब मैं कई दलितों को फलित बनाने में सहयोग करूंगा! जिनकी सालाना आय 10 लाख से ज्यादा है वे सब कहें कि हम अब आरक्षण वर्ग में नहीं सामान्य में आते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपील की तो लोगों ने एलपीजी की सब्सिडी छोड़ दी। अब भी मोदी आरक्षण छोडने के लिए अपील करें। अपनी जाति के आगे गर्व से अनुसूचित नहीं सामान्य लिखवाएं! बेहतर होगा कि समाज में औसत, मध्य औसत व औसत से कम के वर्ग बनाकर सरकार उनके उत्थान का काम करें। सरकार को मध्य औसत और औसत से कम को औसत श्रेणी में ले जाने का काम करना चाहिए।






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