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समाचार ब्यूरो
10/01/2019  :  08:54 HH:MM
एक ऐसे वैज्ञानिक जिनके कार्य को भारतवासियों ने कम और दुनियाभर ने ज्यादा सराहा
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हरगोविंद खुराना जिनकी खोज को भारत से ज्यादा दुनिया ने सराहा. जीवों के रंग-रूप और संरचना को निर्धारित करने में जेनेटिक कोड की भूमिका अहम होती है. इसकी जानकारी मिल जाए तो बीमारियों से लडऩा आसान हो जाता है.

जेनेटिक कोड की भाषा समझने और उसकी प्रोटीन संश्लेषण में भूमिका का प्रतिपादन भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ हरगोविंद खुराना ने किया था.डॉ खुराना को एक ऐसे वैज्ञानिक के तौर पर जाना जाता है, जिन्होंने डीएनए और जेनेटिक्स में अपने उम्दा काम से बायो केमिस्ट्री के क्षेत्र में क्रांति ला दी. वर्ष 1968 में प्रोटीन संश्लेषण में न्यूक्लिटाइड की भूमिका का प्रदर्शन करने के लिए उन्हें चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार दिया गया. उन्हें यह पुरस्कार दो अन्य अमेरिकी वैज्ञानिकों डॉ. राबर्ट होले और डॉ. मार्शल निरेनबर्ग के साथ
साझा तौर पर दिया गया था.पेड़ के नीचे पढ़ाई करने वाले एक छोटे से गांव के लडक़े से नोबेल विजेता बनने तक हरगोविंद खुराना का सफर संघर्ष और जिजीविषा की दास्तान है. उनका नाम उन चुनिंदा वैज्ञानिकों में शामिल है जिन्होंने बायोटेक्नॉलॉजी की बुनियाद रखने में अहम भूमिका निभाई थी.हरगोविंद खुराना का जन्म 09 जनवरी सन 1922 को रायपुर नाम के गांव में हुआ था जो अब पाकिस्तान के मुल्तान जिले का हिस्सा है. एक बहन और चार भाइयों में हरगोविंद सबसे छोटे थे. सन् 1943 में उन्होंने लाहौर की पंजाब यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया और सन् 1945 में यहीं से पोस्टग्रेजुएशन. सन् 1948 में उन्होंने पीएचडी पूरी की. इसके बाद उन्हें भारत सरकार ने स्कॉलरशिप दी और वे आगे की पढ़ाई के लिए ब्रिटेन स्थित लिवरपूल यूनिवर्सिटी चले गए.सन् 1952 में नौकरी की एक पेशकश उन्हें कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया ले गई. यहीं हरगोविंद खुराना ने जीव विज्ञान में वह काम शुरू किया जिसके लिए बाद में उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला. यहां वे सन् 1959 तक रहे और बताया जाता है कि उन्हें अपना काम करने के लिए पूरी आजादी मिली. सन् 1960 में हरगोविंद खुराना अमेरिका आ गए. यहां वे विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी के साथ जुड़े. सन् 1966 में उन्हें अमेरिकी नागरिकता मिल गई. इसके दो ही साल बाद रॉबर्ट डब्ल्यू हॉली और मार्शल डब्ल्यू नीरेनबर्ग के साथ उन्हें संयुक्त रूप से चिकित्सा का नोबेल दिया गया. यह पुरस्कार उन्हें जेनेटिक कोड और प्रोटीन संश्लेषण में इसकी भूमिका की व्याख्या के लिए दिया गया.डॉ. हरगोविंद खुराना की एक और अहम खोज थी पहले कृ त्रिम जीन का निर्माण. यह उपलब्धि उन्होंने सन् 1972 में हासिल की. चार साल बाद ही उन्होंने ऐलान किया कि
उन्होंने इस कृ त्रिम जीन को एक कोशिका के भीतर रखने में कामयाबी हासिल की है. इस तरह देखें तो हरगोविंद खुराना की बायोटेक्नॉलॉजी की बुनियाद रखने में भी अहम भूमिका रही.नोबेल पुरस्कार के बाद अमेरिका ने उन्हें नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस की सदस्यता प्रदान की. यह सम्मान केवल विशिष्ट अमेरिकी वैज्ञानिकों को ही दिया जाता है. डॉ. खुराना ने अमेरिका में अध्ययन, अध्यापन और शोध कार्य जारी रखा. देश-विदेश के तमान छात्रों ने उनके सानिध्य में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की. नौ नवंबर सन् 2011 को इस महान वैज्ञानिक ने अमेरिका के मैसाचूसेट्स में आखिरी सांस ली. सन् 1960 के दशक में खुराना ने निरेनबर्ग की इस खोज की पुष्टि की कि डीएनए मॉलिक्यूल के घुमावदार ‘एक्सल’ पर चार अलग-अलग के न्यूक्लियोटाइड के लगे होने का तरीका नई कोशिका का केमिकल स्ट्रक्चर और काम तय करता है।






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