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गुड फ्रायडे : त्याग और बलिदान का दिन
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पुण्य शुक्रवार यानी गुड फ्र ायडे ईसाई धर्म का पालन करने वालों के लिए एक पवित्र एवं त्याग का दिन होता हैं। इस दिन ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया था। इस दिन ईसाई समाज के लोग ईसा मसीह की कुर्बानी, त्याग, बलिदान को याद करते हैं। इसके लिए ईसाई समाज के लोग 40 दिन के उपवास परहेज एवं प्रार्थना के साथ तैयारी करते हैं।
40 दिन का उपवास ही बहुत महत्वपूर्ण है। परम्परा के अनुसार प्रभु येसु ने अपने सार्वजनिक कार्य को प्रारंभ करने से पहले 40 दिन एवं रात उपवास एवं प्रार्थना में बिताए थे। ईसाई समाज पुण्य शुक्रवार के पहले 40 दिन उपवास एवं प्रार्थना करते है और ईसा मसीह की कुर्बानियों को जो उन्होंने मानव जगत के लिए दिया उसे याद करते हैं। पवित्र बाईबल में अनेक कुर्बानियों का वर्णन है परन्तु प्रभु यीशू मसीह की कुर्बानी को ही सर्वश्रेष्ठ स्थान दिया गया है क्योंकि उनका संसार में मानवीय रूप में जन्म लेना, एक साधारण मनुष्य के समान जीवन व्यापन करना और क्रूस की यातना सहते हुए अपना जीवन देना फिर तीसरे दिन पुन: जीवित होना। यह सर्वश्रेष्ठ इस लिए भी है क्योकि यह सब परमेश्वर की योजना के अनुसार उन्होने पूरा किया। प्रभु यीशू मसीह के संबंध में परमेश्वर ने अपने नबियों द्वारा हजारों वर्ष पहले भविष्यवाणियां की थीं जो पवित्र बाईबल के उस पुराने नियम में यीशू मसीह के जन्म से हजारों वर्ष पहले नबियों ने परमेश्वर के नेतृत्व में लिखा था। पवित्र शुक्रवार को ईसाई समाज प्रभु येसु के दुखभोग एवं मृत्यु की पीड़ा का स्मरण करने के लिए विभिन्न  गिरजाघरों में एकत्रित होते हैं। प्रभु येसु ख्रीस्त का दुखभोग एवं मृत्यु का स्मरण करने के साथ-साथ प्रभु येसु ख्रीस्त ने अपने प्राण देकर जो नई उमीद की राह बताई है उस मार्ग पर चलने का संकल्प खुद ही करते है। प्रभु येसु ने हमें यह सिद्ध कर दिया है कि जीवन बचाने का अर्थ है कि उसे दूसरों की सेवा में अर्पित कर देना है। जब हम अपना जीवन दूसरों के हित के लिए व्यतीत करते है तब हमें वास्तव में अव्यक्त खुशी महसुस होती है। क्रूस पर आकाश और पृथ्वी के बीच प्रभु ने कहा सब कुछ पूरा हो चुका है यह कहकर उन्होंने सर झूकाकर अपने प्राण त्याग दिए यह अंतिम शब्द हमारे विचारों की शुरुआत होने चाहिए। प्रभु को दोषी ठहराया जाना और क्रूस पर मृत्यु सहन करना, उनके जीवन के समर्पण की निशानी थी। उन्होंने स्वयं अपने आप को मानव जाति की रक्षा के लिए अर्पित किया। ईश्वर चाहता था कि येसु लोगों को पिता का ह्रश्वयार एवं दया को प्रकट करे। ईश्वर चाहता था कि येसु लोगों को सिखाये कि ईश्वर पिता है, और हम सब विभिन्न भाषा बोलने वाले, विभिन्न जाति को मानने वाले, विभिन्न देशों में रहने वाले, विभिन्न विचारधाराओं को मानने वाले हैं, फिर भी हम सब एक ही ईश्वर की संतान है। इसलिए हमें भाई-बहनों के जैसे एक-दूसरे की रक्षा करते हुए प्रेम और सहन के मार्ग पर चलना है। पवित्र बाईबल में योहना अध्याय 3 पद संख्या 16 में लिखा हैं कि परेमश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना इकलौता पुत्र दे दिया ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह मरे नहीं बल्कि हमेशा के लिए जीवन पाए। प्रभु यीशू मसीह का संसार में आने का केवल एक ही मकसद था पापियों को उनके पापों से मुक्त करना। उन्होंने अपने पाप रहित शरीर की पापियों के लिए कुर्बानी दे दी ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो बल्कि अनंत जीवन पाए। प्रभु यीशू मसीह ने अपने जीवन के तीस वर्ष अपने माता-पिता की सेवा में गुजारे और अंतिम साढ़े तीन वर्ष जहां मनुष्य को प्रेम शांति व आपसी भाईचारे तथा पापों से तौबा करने का संदेश दिया वहां ऊंच-नीच का भेदभाव समाप्त करते हुए अनेक रोगियों को स्वस्थ किया और यहां तक कि रूहानी शक्ति के साथ मुर्दा को भी जिंदा किया।






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