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समाचार ब्यूरो
15/06/2019  :  10:01 HH:MM
बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे गिरीश कर्नाड
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लोकप्रिय कन्नड़ नाटककार, रंगकर्मी, एक्टर, निर्देशक और स्क्रीन राइटर गिरीश कर्नाड का हाल ही में 81 साल की उम्र में निधन हो गया है। 1960 के दशक में नाटकों के लेखन से गिरीश कर्नाड ने अपनी पहचान बनायी। कन्नड़ नाटक लेखन में गिरीश कर्नाड की वही भूमिका है जो बंगाली में बादल सरकार, मराठी में विजय तेंदुलकर और हिंदी में मोहन राकेश जैसे दिग्गज नाटककारों की है।

लगभग पांच दशक से ज्यादा समय तक कर्नाड नाटकों के लिए सक्रिय रहे। कर्नाड ने अंग्रेजी के भी कई प्रतिष्ठित नाटकों का अनुवाद किया। कर्नाड के भी नाटक कई भारतीय भाषाओं में अनुदित हुए। कर्नाड ने हिंदी और कन्नड़ सिनेमा में अभिनेता, निर्देशक और स्क्रीन
राइटर के तौर पर काम किया। उन्हें पद्मश्री और पद्म भूषण का सम्मान मिला। कर्नाड को चार फिल्म फेयर अवॉर्ड भी मिले। उन्हें 1978 में आई फिल्म भूमिका के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला था। उन्हें 1998 में साह‍ित्य के प्रत‍िष्ठ‍ित ज्ञानपीठ अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। ग‍िरीश कर्नाड ऐसे अभ‍िनेता हैं ज‍िन्होंने कमर्शियल स‍िनेमा के साथ समानांतर स‍िनेमा के ल‍िए भी सराहा गया है।

गिरीश ने कन्नड़ फिल्म संस्कार(1970) से अपना एक्टिंग और स्क्रीन राइटिंग डेब्यू किया था। इस फिल्म ने कन्नड़ सिनेमा का पहले प्रेजिडेंट गोल्डन लोटस अवार्ड जीता था। बॉलीवुड में उनकी पहली फिल्म 1974 में आयी जादू का शंख थी। गिरीश कर्नाड को सलमान खान की फिल्म एक था टाइगर और टाइगर जिंदा है के लिए जाना जाता है। इसके अलावा उन्होंने बॉलीवुड फिल्म निशांत (1975), शिवाय और चॉक एन डस्टर में भी काम किया था। गिरीश कर्नाड को आप रंग मंच के एक मझे हुए लेखक के तौर पर याद रख सकते हैं, जिसने 26 साल की उम्र में 1964 में तुगलक जैसे एतिहासिक किरदार पर नाटक लिखा। 1986 की बात है जब इसका मंचन हो रहा था नाटक में संवाद आया कि इस किले को कोई भेद नहीं सकता, जिसके जवाब में दूसरा किरदार कहता है कि अक्सर किले अंदर से ही भरभराकर टूटते हैं। कुछ लोग गिरीश कर्नाड को समाज के मुद्दों पर आवाज बुलंद करने वाले एक प्रहरी के रूप में याद रखते हैं। कुछ टीवी और सिनेमा के एक अदाकार और निर्देशक के रूप में। यानी एक गिरीश कर्नाड में कई गिरीश करनाड छिपे हुए थे। आज की पीढ़ी उन्हें टाइगर जिंदा में डॉक्टर शिनॉय के किरदार से शायद रखती होगी, लेकिन उनके काम कहीं व्यापक हैं। फ्लैशबैक में जाएँ तो याद आता है 1975 में आई फि़ल्म निशांत में उन्होंने गाँव के स्कूलमास्टर की भूमिका निभाई थी। 1976 में आई मंथन जहाँ किसानों के कॉपरेटिव मूवमेंट की कहानी थी जिसमें गिरीश कर्नाड गाँव में आए आदर्शवादी डॉक्टर बनते हैं और किसानो को उनका अधिकार दिलाने संघर्ष करते रहे हैं। अपनी भूमिकाओं में वह सामंतवाद, जातिवाद, पुरुषवाद पर प्रहार करते रहे हैं।






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