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समाचार ब्यूरो
05/07/2019  :  09:14 HH:MM
छह लाख मीट्रिक टन की क्षमता वाले साइलोज का होगा निर्माण
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चंडीगढ़ हरियाणा सरकार ने खाद्यान्नों की पर्याप्त भंडारण सुविधा प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के भाण्डागार अवसंरचना कोष के तहत राज्य में छ लाख मीट्रिक टन की क्षमता वाले साइलोज का निर्माण करने का निर्णय लिया है।

इसके लिए 200 करोड़ रुपये की परियोजना को मंजूरी के लिए अगले 15 दिनों के भीतर नाबार्ड को भेजा जाएगा। इस आशय का निर्णय नाबार्ड की सहायता से राज्य में चलाई जा रही विभिन्न परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता
में हुई एक बैठक में लिया गया। बैठक में वित्त मंत्री कैह्रश्वटन अभिमन्यु और नाबार्ड के अध्यक्ष डॉ. हर्ष कुमार भनवाल भी उपस्थित थे।

मनोहर लाल ने कहा कि राज्य सरकार न े राज्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कई फसलों की खरीद की है। गेहूं और चावल के अलावा, बाजरा, सरसों और सूरजमुखी के एक-एक दाने की भी खरीद की गई और खरीद के बाद फसल के भण्डारण के लिए पर्याप्त भंडारण क्षमता की आवश्यकता है। उन्होंने निर्देश दिये कि आरंभ में जिन जिलों में तुलनात्मक रूप से कम भंडारण क्षमता है, उनमें साइलोज की स्थापना के लिए आवश्यक धनराशि जारी करने के लिए नाबार्ड को शीघ्रातिशीघ्र एक प्रस्ताव भेजा जाए। इससे पूर्व, यह भी सहमति हुई कि यदि किसी परियोजना के लिए नाबार्ड द्वारा जारी की गई धनराशि का किसी कारणवश राज्य सरकार द्वारा उपयोग नहीं किया जाता है तो उस निधि को किसी अन्य नाबार्ड परियोजना में समायोजित किया जाएगा। राज्य सरकार और नाबार्ड, दोनों के बीच राज्य में कार्यान्वित होने वाले विभिन्न विकास कार्यों को तेज करने के लिए त्रैमासिक बैठकें आयोजित करने पर भी सहमति बनी। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि नाबार्ड के तहत परियोजनाओं को तैयार करते समय उन परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जो पानी से संबंधित हैं, चाहे वे पेयजल से संबंधित हों या फिर जल संरक्षण अथवा सिंचाई से संबंधित हों। उन्होंने कहा कि पानी एक बहुत बड़ा मुद्दा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस पर चिंता व्यक्त करते हुए जल संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान राज्य सरकार ने हाल ही में ‘जल ही जीवन है’ योजना शुरू की है ताकि किसानों को धान जैसी पानी की अधिक खपत करने वाली फसलों के स्थान पर मक्का जैसी वैकल्पिक फसलों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके, जिनके लिए तुलनात्मक रूप से कम पानी की आवश्यकता होती है।






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