समाचार ब्यूरो
04/08/2019  :  11:01 HH:MM
हर दिल अजीज अमर गायक... किशोर कुमार
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महान गायक एवं हरफनमौला कलाकार स्व. किशोर कुमार एक गायक या अभिनेता ही नही थे बल्कि वे एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे।अपने समय में वे युवा दिलों की धडकन बन ही चुके थे, मरने के बाद वे हरदिल अजीज अमर गायम बनकर रह गये। आज वे हमारे बीच भले ही नही हो लेकिन उनके गाये हजारों गीत आज भी हमारा स्वस्थ्य मनोरंजन कर रहे है। उनके गीतों में एक ओर खिल्लड़पन छलकता है तो वहीं दूसरी ओर दर्द भरे नगमे उनकी संवेदनाओं को भी प्रकट कर देते है। आज चार अगस्त को किशोरदा का जन्म दिवस उत्साह के साथ मनाया जाएगा।

ऐसे महान कलाकार का जन्म खंडवा में लेना किसी ऐतिहासिक घटना से कम नहीं है। इसे खंडवा की साहित्यिक, संस्कृति, विभूतियों का पुण्य ही कहा जा सकता है। बहरहाल किशोर दा का जन्म 4 अगस्त,1929 को खंडवा के बाम्बे बाजार मार्ग निवासी कुंजलाल गंगोली के घर हुआ। उनकी माता का नाम गौरीदेवी, बड़े भाई का नाम अशोक कुमार एवं अनूप कुमार था, इन तीनों में से किशोर बचपन से ही मसखरेपन के लिए माता-पिता की डांट का सामना किया करते थे। गीत संगीत में रुचि के कारण अशोक कुमार जल्द ही फिल्म इंस्ट्रीज में 
प्रवेश पा गये। जबकि किशोर कुमार को काफी संघर्ष करना पड। यहां तक की उन्हें निर्माता निर्देशक ने तो शुरु में नकार ही दिया था, फिर भी मां सरस्वती की कृपा से किशोर दा का सन् 1946 में बनी फिल्म शिकारी में अभियन का मौका मिला जिसमें उन्होंने अपनी अभिनय कला का लोहा मनवाया। इसके बाद सन् 1948 में उन्होंने गायन के क्षेत्र मे भी कदम रखा या यूं कहे कि गीत निर्देशकों ने उन्हें पहली बार मौका दिया और संगीतकार खेमचंद प्रकाश के संगीत निर्देशन में उन्होंने - मरने की दुआएं क्यो मांगू जीने की तमन्ना कौन करे...गाया। यह गीत फिल्म गिद्दी में रजत पथ पर प्रदर्शित हुआ, जिसे उस समय के श्रोता एवं दर्शकों ने काफी पसंद किया। आकाशवाणी से भी इस गीत की गूंज सुनाई दी। इसके बाद उत्तोतर किशोर कुमार ने पीछे मुडक़र नहीं देखा और 19 हजार से भी ज्यादा गीत गाकर, नब्बे फिल्मों मे अभिनय कर अपना एवं अपने शहर खंडवा का नाम रोशन किया। आराधना फिल्म में राजेश खन्ना पर फिल्माया गया गीत... मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू...को गाकर किशोर दा लाखों करोड़ो श्रोताओं के दिलों पर छा गये। यह वक्त फिल्म इंस्ट्रीज में 
वो वक्त था जब फिल्म में ह्रश्वयार मोहब्बत की कहानियां केन्द्र में थी। इसे किशोर कुमार ने तोडा था तथा गायन एवं अभिनय में उन्होंने हास्य एवं शरारतीपन को शामिल किया। फिल्म बाप रे बाप, साधु और शैतान, दिठ्ठस्रठ्ठी का ठग, चलती का नाम गाडी, आशा, हाफ टिकट और पडोसन जैसी फिल्मे उनके शरारतीपन को काफी हद तक प्रकट करती है। गायन में योडलिंग शैली इजाद करने का श्रेय भी किशोर दा को ही जाता है, उनके गीतों की यही एक महत्वपूर्ण विशेषता भी रही की योडलिंग शैली के उनके गाये गीत केवल वहीं गा सकते थे, उनकी नकल आज तक कोई भी नहीं कर पाया। वे पुरुषों की आवाज तो निकालते थे ही गायन में भी कभी-कभी महिला गायिका की आवाज भी खुद ही निकाल लिया करते थे। वे सुगम संगीत के गायक तो थे ही क्लासिकल (शास्त्रीय) संगीत पर आधारित गीत गाने में
भी सफल रहे थे। फिल्म मेहबूब में गाया उनका गीत...मेरे नैना सावन भादों फिर भी मेरा मन ह्रश्वयासा। ऐसा ही एक गीत था जो उन्होंने शिवरंजनी राग पर गाकर शास्त्राह्म्य गायन के क्षेत्र में भी अपना होला मनवा दिया था। इस एक गीत ने शास्त्राह्म्य गायकों
की उस धारणा को भी झुठला दिया था कि किशोर दा शास्त्राह्म्य गायन गा नही सकते, लेकिन उन्होंने गाया। किशोर दा की निजी जिन्दगी पर जरा गौर करे तो पता चलता है कि वे ह्रश्वयार एवं समर्पण के लिए जीवनभर संघर्ष करते रहे यही कारण रहा कि उन्होंने अपने जीवन में चार शादियां की। उन्हें कई मेडल और फिल्म फेयर अवॉर्ड मिले लेकिन उनके चेहरे पर जरा भी दर्प (घमण्ड) नहीं आया और वे पहले की तरह हंसते गाते अपने गीत गाते रहे। 4 मई 1986 को उन्हे मध्यप्रदेश सरकार ने सम्मान दिया और देर से ही सही राष्ट्रीय लता मंगेशकर पुरस्कार से उन्हें नवाजा और इस प्रकार वे आवाजा की दुनिया के बेताज बादशाह बन गये, किशोर कुमार गीत को सीधा तो गाते ही थे कभी-कभी उसे उलटा गाकर लोगों को आश्चर्य में डाल देते थे। गीत तो गीत खुद का अपना नाम भी उलटा पडने में उन्हें आनंद आता था। वे मतलब परस्तों को खूब पहचानते और बगैर पैसा लिये काम करने में कोई दिलचस्पी नहीं लेते थे, शायद यहीं कारण रहा कि लोग उन्हें खुदगर्जी एवं केल्क्यूलेटिव कहा करते थे, लेकिन किशोर तो किशोर ही थे पैसा नही मिलने पर अक्सर स्टुडियों छोडक़र भाग खडे होते थे। किशोर कुमार की अपनी जन्मभूमि खंडवा से बेहद लगाव था। यहीं कारण है कि वे अक्सर स्टेज शो के दौरान अपना परिचय ही खंडवा वाले किशोर कुमार के रूप में दिया करते थे। 30 सितम्बर 198 6 में वे लीना, भाई अनूप एवं चि.सुमित के साथ खंडवा आये थे। इस अवसर पर उन्हें खंडवा की सडक़ों पर पैदल घुमने का भूत सवार हुआ व भाई अनूप को लेकर वे सचमुच ही पैदल ही सडक़ें नापने लगे, इस दौरान उनकी मित्र मंडली भी उनके साथ चल रही थी। लेकिन किशोर के हाव-भाव एवं चाल ढाल से कही कोई घमण्ड नहीं दिख रहा था।






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