समाचार ब्यूरो
20/08/2019  :  09:49 HH:MM
राजीव गांधी : विश्व राजनीति पर गहरी छाप
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इसे विधि की विडम्बना ही कहा जा सकता है कि राजीव गांधी जिस तेजी से भारत की राजनीति के क्षितिज पर उदित हुए थे लगभग उसी तीव्रता से विलुप्त भी हो गए। भरपूर यौवन में विधि के व्रूर हाथों ने उन्हें हम से छिन लिया। अपने नाना पंडित जवाहर लाल नेहरू और माता इन्दिरा गांधी की विरासत के सहारे उनकी राजनीति पर एक मजबूत पकड़ बन रही थी।

देश को 21वीं शताब्दी में ले जाने के लिए वे निरन्तर प्रयत्नशील थे। वह भारत को ऐसी स्थिति में जल्दी से जल्दी पहुंचा देना चाहते थे जहां वह विश्व के अन्य विकसित देशों के साथ सिर उठा कर खड़ा हो सके। राजीव गांधी का संतुलित स्वभाव उन्हें सहज ही अतंमुर्खी बना देता था परन्तू विमान चालक होने के कारण शायद उन्हें तीव्र गति बहुत पसंदं थी और वह हर काम बहुत जल्दी जल्दी समाप्त कर लेना चाहते थे। भारत को 21वीं शताब्दी में ले जाने के लिए उन्होंने जिस आर्थिक उदारवाद की नींव रखी वह पंडित नेहरू और इन्दिरा गांधी की नीतियों से अलग दिखाई देती है जबकि वास्तविकता यह है कि वह नेहरू की उन नीतियों की परिणिति कही जा सकती है जो उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरन्त बाद प्रतिपादित की और इन्दिरा गांधी ने ने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करने के बाद उन्हें व्यवहार में लाने का प्रयास किया। यह दूसरी बात है कि नेहरू और इन्दिरा दोनों ही अपनी नीतियों को समाजवाद के आस पास रख कर गरीबों के मसीहा के रूप में अपने आपको स्थापित किए रहे जबकि राजीव गांधी ने खुले दिल से आयातित तकनीक की वकालत की। जल्दी से जल्दी देश में आर्थिक प्रान्ति लाने की उनकी तड़प को उनके भाषणों में सहज ही अनुभव किया जा सकता है। नेहरू एक ऐसे समय में देश की आर्थिक उन्नति का मानचित्र बना रहे थे जब कांग्रेस स्वंतत्रता आन्दोलन की लड़ाई लड़ते हुए थक चुकी थी। कांग्रेस महात्मा गांधी के उन आदर्शों को समेटने में लगी थी जिनके सहारे आर्थिक समस्यायें सुलझाना कोई सुगम कार्य नहीं था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सांस्कृ तिक पुनर्जागरण के सहारे देश को उन्नति के मार्ग पर ले जाने की बात कर रहा था। समाजवादी अपने अपने ढंग से अमीरी गरीबी के मध्य खाई पाटने के कार्यप्रम बना रहे थे। कम्युनिस्ट भारत को सोवियत संघ के ढांचे में ढालने का प्रयास कर रहे थे। पं. नेहरू को सबसे बड़ी चिन्ता लोकतंत्र को बचाने की थी। नेहरू प्रजातांत्रिक प्रणाली को आहत किए बिना भारत की सामाजिक सच्चाईयों का सामना करते हुए आर्थिक विकास का दर्शन रच रहे थे। इन्दिरा गांधी ने पूरी सूझ बूझ के साथ देश की राजनीति का संचालन नेहरू के बनाए हुए ढांचे के आस पास करना प्रारम्भ कर दिया । आज भले ही कुछ लोग नेहरू की नीतियों के विरोध में कुछ बोल दें परन्तु उस समय भारत की जनता ने उनकी नीतियों को भरपूर सम्मान दिया। बाद में लोगों ने इन्दिरा गांधी को उनकी पुत्री मान कर विरासत सौंपने में कोई आनाकानी नहीं की तो राजीव गांधी को भी उन्हीं का वारिस स्वीकार करते हुए अपने दिल और दिमाग में बिठाया।

इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि नेहरू के दर्शन ने ही इस देश को एक मजबूत सुदृढ़ आर्थिक आधार प्रदान किया किया। इन्दिरा गांधी ने उस समय की अनिश्चय की राजनीति में स्वयं को स्थापित करने के लिए कई प्रकार की लोकप्रिय घोषणाओं का सहारा
लिया। उन्होंने गरीबी हटाओ का नारा दे कर जनता का विश्वास अर्जित करने में सफलता प्राप्त की। राजीव गांधी ने सत्ता के दलालों को बाहर का रास्ता दिखाने की बात करके अपनी एक साफ सुथरी छवि देश के सामने प्रस्तुत की। उन्होंने लोगों को यह आश्वासन दिया कि प्रशासन से वह भ्रष्टाचार को उखाड़ फेकेंगें। बाद में घटनाप्रम इतनी तेजी से बदला कि सब कु छ छिन्न भिन्न हो गया और भारतीय अर्थतंत्र उसी पुराने ढर्रे पर चलता रहा। नेहरू-इन्दिरा और राजीव तीनों का सम्मोहन जनता को अपनी ओर आकर्षित करता रहा। तीनों ही अपने अपने समय में सबसे अधिक वोट प्राप्त करने वाले सिद्ध हुए। इस क्षेत्र में तो राजीव गांधी अपने दोनों पूर्वजों से कहीं आगे बढ़ गए। 1984 में जब उन्होंने पार्टी की बागडोर संभाली तो कांग्रेस पार्टी ने उन शिखरों को छुआ जहां तक वह पहले कभी पहुंचने में सफल नहीं हुई थी। अपने नाना की भान्ति राजीव गांधी में सैंस ऑफ हयूमर भी थी जिसे इन्दिरा जी ने सदैव अपनी दृढ़ता के पीछे छिपाए रखा। राजीव नेहरू और इन्दिरा जी की भान्ति जल्दी गुस्से में नहीं आते थे। उनका सौम्य व्यक्तित्व उन्हें लोकप्रिय बनाने में काफी सहायक हुआ। वह एक विशाल हृदय वाले इंसान थे। उन्हें जीवन की गहरी समझ थी। जीवन से निरन्तर कुछ न कुछ सीखते रहने की उन्हें आदत थी। उन्होंने बहुत कम समय में अपने आप को राजनीति में स्थापित कर लिया था। जन्म से राजनीति के आंगन में पले बढ़े राजीव तब तक राजनीति से अलिप्त रहे जब तक उन्हें विवश करके इसमें उतारा नहीं गया। राजीव गांधी जीवन की सुहावनी वस्तुओं में गहरी रूचि रखते थे। फोटोग्राफी और ड्राइविंग में उनकी बहुत रूचि थी। वास्तव में वह एक सुखी और सहज पारिवारिक जीवन व्यतीत करना चाहते थे। राजनीति तो उन पर थोप दी गई थी। यदि उनका वश चलता तो संभवत: वह राजनीतिक सत्ता को ठुकरा देते। 20 अगस्त 1944 को जन्में राजीव राजनीति में 1981 में उस समय आये जब उनके छोटे भाई संजय गांधी एक विमान हादसे के शिकार हो गए। अपनी मां का हाथ बंटाने के लिए ही उन्होंने अमेठी से संसद का चुनाव लड़ा और बाद में पार्टी के महासचिव बने। अपनी विरासत के कारण ही उन्हें राजनीति में सहज रूप से स्वीकार कर लिया गया।






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