01/09/2019  :  10:27 HH:MM
हरियाणा में लड़ाई एकतरफा है?
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हरियाणा में चुनावी बिगुल तिथियों के आधिकारिक ऐलान के पहले ही बज चुका है। खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं ने जिस अंदाज में अभी से अपनी ताकत सूबे में झोंक दी है उससे साफ लगता है कि वे केवल जीत के प्रति आश्वस्त नहीं रहना चाहते बल्कि उनका लक्ष्य केंद्र की तर्ज पर बहुमत का पुराना रिकॉर्ड तोडऩा है।

भाजपा ने सूबे में 75 ह्रश्वलस का लक्ष्य दिया है। इसे आप कुल सीटों की संख्या के लिहाज से अतिशयोक्ति मानने का जोखिम ले सकते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि जिस अंदाज से भाजपा का विस्तार हो रहा है। जिस तरह से उन्होंने राजनीतिक चिंतन की धारा को अपने पक्ष में मोडऩे का प्रयास किया है उससे कोई भी बड़ा लक्ष्य उनके लिए ऐसा नहीं जिसे असंभव माना जाए। सच तो यही है कि आज की तारीख में प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य कुछ ऐसा है जिसमें चुनावी लड़ाई का रुझान एकतरफा नजर आ रहा है। यहां मैं यह आगाह जरूर कर दूं कि अभी बात केवल लड़ाई की हो रही हे। परिणामों के लिहाज से समीक्षा बाद में ही करना उचित होगा। तब तक हम और आप यह उम्मीद करते रहेंगे कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिहाज से विपक्ष को भी थोड़ा टॉनिक मिल जाए और चुनाव घोषित होते-होते कम से कम चुनाव लड़ते जरूर नजर आएं।

हरियाणा में भाजपा को छोडक़र कोई भी दल अभी तक चुनाव लड़ता नहीं नजर आ रहा है। मुख्य प्रतिपक्ष कांग्रेस की हालत कोमा में जाने जैसी है। उनके पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश के सबसे प्रमुख कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा अपनी पार्टी को आंखे तरेर रहे हैं। वे किस चुनाव निशान के साथ मैदान में होंगे यह परिस्थितियां बताएंगी। लेकिन इतना स्पष्ट है कि उन्होंने एक बड़ी रैली करके भाजपा से ज्यादा कांग्रेस को जिस तरह से कठघरे में खड़ा किया उससे हुए नुकसान की भरपाई आसान नहीं है। भाजपा चुनाव प्रचार में जुट गई है। वहीं कांग्रेस
में नेतृत्व का झगड़ा चल रहा है। पार्टी का अध्यक्ष कौन हो इस पर बहस हो रही है। हुड्डा को मनाया जा सकता है या नहीं यह संभावनाएं टटोली जा रही हैं। कोई भी निष्पक्ष समीक्षक यह मानेगा कि यह कांग्रेस के बेहतर स्वास्थ्य का संकेत नहीं है। ऐसे माहौल में जब एक मुख्यमंत्री के रूप में मनोहर लाल की स्वीकार्यता बढ़ी है और उन्होंने खुद को एक लोकप्रिय व कामकाजी मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित कर लिया है। नेतृत्व तलाश रही पार्टियों का उनसे मुकाबला कर पाना आसान नहीं होगा। अनुच्छेद 370 के बाद माहौल पहले की तुलना में
कहीं ज्यादा मजबूती से भाजपा के पक्ष में है। मंदी की मार अभी जनता के मन में घर नहीं कर पाई है। अगर कहीं मुद्दा भी है तो विकल्प के रूप में कोई इस मुद्दे को लेकर सामने खड़ा होता नहीं नजर आ रहा है। सूबे के दूसरे प्रमुख दल चौटाला वंश के विभाजित धड़ों की इतनी ताकत भी नजर नहीं आ रही है कि वे अकेले दम पर चुनाव लड़ पाएं। वहां भी गुणाभाग की उलझन ज्यादा नजर आ रही है। कुल मिलाकर प्रदेश में आज की तस्वीर एकदम स्पष्ट है। यहां भाजपा का मुकाबला फिलहाल भाजपा से है। चुनावी संघर्ष दोतरफा या  बहुकोणीय हो इसके लिए विपक्ष को कई चमत्कार एक साथ घटित होने का इंतजार करना चाहिए। फिलहाल तो विपक्ष समझौता कर चुके पराजित मानसिकता के विरोधी जैसा लगता है। जिसे अपने पर भरोसा नहीं रहा। जनता का भरोसा तो बाद की चीज है। -जय हिंद






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