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समाचार ब्यूरो
28/09/2019  :  09:49 HH:MM
आजादी ही जिसकी दुल्हन थी
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सरदार भगत सिंह जैसा लाल पैदा करने के लिए कितनी ही माताएं दिन रात भगवान से प्रार्थनाएं करती हैं तब कहीं लाखों में से किसी एक विद्यावती को यह सौभाग्य प्राप्त होता है। शहीदे-आजम भगत सिंह भारत माता के एक ऐसे सपूत थे जिन्होंने बहुत छोटी आयु में ही देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। 28 सितम्बर 1907 को पंजाब प्रान्त के लायलपुर जिले के बंगा नामक गांव में भगत सिंह का जन्म हुआ।

उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का विद्यावती था। उनके चाचा सरदार अजीत सिंह भी अपने बड़े भाई की भान्ति प्रान्तिकारी थे और जल्दी से जल्दी गुलाम भारत को अंग्रेजों की दासता से मुक्त करवाने के लिए कटिबद्ध थे। सरदार किशन सिंह लोकमान्य
गंगाधर तिलक के स्वतंत्रता आन्दोलन के सप्रिय सहयोगी थे। उनके विचारों का बहुत अधिक प्रभाव सरदार भगत सिंह पड़ा और वे बचपन से ही भारत से अंग्रेजों को मार भगाने का सपना संजोने लगे। भगत सिंह को बचपन से ही संघर्ष एवं अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाने का संस्कार मिला था। भगत सिंह के घर का पूरा वातावरण ही ऐसा था कि जहां पर देशभक्ति के अतिरिक्त किसी अन्य बात पर कोई गंभीर चर्चा ही नहीं होती थी। पूरा घर प्रान्तिकारी विचारों से ओतप्रोत पुस्तकों और समाचार पत्रों से भरा हुआ था। खेतों में बन्दूकें उगाने की बात भगत सिंह बचपन से ही करने लगे थे। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग के भीषण हत्याकांड़ ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। जालियांवाले बाग की रक्त से सनी मिट्टी उनके भाल का चंदन बन गई। बारह वर्ष की आयु के थे भगत सिंह जब
अमृसर में जालियांवाला नृशंस कांड़ हुआ। भगत सिंह अकेले ही वहां पहुंच गए और वहां की मिट्टी से तिलक करने के बाद एक शीशी में भर कर घर भी ले आए। इस मिट्टी पर वह प्रतिदिन पुष्प अर्पित करके उसकी पूजा करते थे। वह देश की स्वतंत्रता के लिए इतने व्यग्र थे कि गुलाम भारत में विवाह तक करना नहीं चाहते थे। उनका कहना था कि गुलाम भारत में तो केवल मृत्यु ही उनकी दुल्हन हो सकती है। उनका सपना तो आजादी की दुल्हन को विवाह कर घर लाने का था। जब घर में उनके विवाह की चर्चा होने लगी तो वह घर छोड़ कर कानपुर चले गए। इस समय उन्होंने अपने पिता को लिखे पत्र में यह स्पष्ट कर दिया कि मेरे यज्ञोपवीत के समय ही मुझे देश के लिए समर्पित कर दिया गया था। मैं आपकी वही प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूं। इसके लिए आप मुझे माफ करें। भगत सिंह के विचार बहुत साफ और सुलझे हुए थे। उनको अपने लक्ष्य का पूरा पूरा ज्ञान था। वह अपनी बात जितने स्पष्ट तरीके से दूसरों के सामने रखते थे उतने ही साफ अपने विचार लिख कर भी व्यक्त करते थे। जब 20 अक्टूबर 1928 को साइमन कमीशन लाहौर पहुंचा तो उनकी नौजवान सभा ने लाला लालपतराय के नेतृत्व में कमीशन का जोरदार विरोध किया। इस अवसर पर हुए लाठी चार्ज से लाला जी घायल हो गए और बाद में वह दिवंगत हो गए। लाला जी के बलिदान से भगत सिंह का खून खौल उठा। उस समय लाहौर के पुलिस अधीक्षक जे.ए.स्कॉट थे।
लाला जी की मौत का बदला लेने के लिए स्कॉट की हत्या करने की योजना बनी परन्तु इस अभियान में उनके स्थान पर एक अन्य पुलिस अधिकारी साण्डर्स मारा गया। अब पुलिस शिकारी कुत्तों की तरह भगत सिंह की खोज करने लगी। इससे पहले काकोरी कांड़ में भी उनका नाम आने के कारण पुलिस उनकी तलाश कर ही रही थी परन्तु वह हमेशा पुलिस को चकमा देने में सफल हो जाते थे। भारत की जनता पर अंग्रेजों के अत्याचार निरन्तर बढ़ते जा रहे थे। गांधी जी के नेतृत्व में लड़ी जाने वाली अहिंसक लड़ाई से कुछ अच्छे परिणाम निकलेगें इसकी आशा भगत सिंह और उनके साथियों को नहीं थी। इस पर भी भगत सिंह गांधी से बहुत प्रभावित थे। जब उन्हें लगा कि अंग्रेज कानों से पूरी तरह से बहरे हो चुके हैं तो उन्होंने एक ऐसी योजना बनाई जिस से पूरी दुनियां के सामने अंग्रेजों की पोल खुल जायेगी। इसी बात को ध्यान में रखते हुए भगत सिंह ने एक ऐसा धमाका करने की योजना बनाई जिसकी आवाज भारत ही नहीं पूरी दुनिया में सुनी जा सके। जब असेम्बली में पब्लिक सेफ्टी बिल पास करवाने का प्रयास किया जा रहा था उस समय भगत सिंह ने अपने साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिल कर असेम्बली में बम विस्फोट कर दिया। क्योंकि उनका मुख्य उद्श्ये जन-जन तक अपनी बात पहुंचा कर उनको जागरूक बनाना था इसलिए उन्होंने हवा में दो फायर किए और वहां से भागने का कोई प्रयास नहीं किया। भगत सिंह चाहते तो बहुत आसानी से वहां से भाग जाते। वहीं पर खड़े हो कर उन्होंने इंकलाब जिन्दाबाद का वह नारा बुलन्द किया जो बाद में स्वाधीनता आन्दोलन का प्रमुख और अभिन्न नारा बन गया। आज भी किसी प्रकार के शोषण और अत्याचार का प्रतिरोध करने के लिए इस नारे का सर्वाधिक प्रयोग होता है। भगत सिंह की योजना के अनुसार ही पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार करके 4 जून 1929 को दिल्ली के सेशन जज मिडलटन की अदालत में पेश किया। जहां उन्हें आजीवन कारावास का दंड़ दिया गया। अंग्रेजों ने उनके मुकदमें को ट्रिब्यूनल को सौंप दिया। लहौर में मुकदमें की सुनवाई का नाटक किया गया। इस बीच चन्द्र शेखर आजाद ने अपने तरीके से उन्हें छुड़ाने की योजना बनाई परन्तु भगवती चरण बोहरा की बम परीक्षण के दौरान मृत्यु हो जाने के कारण यह योजना अमल में नहीं लाई जा सकी। 29 अगस्त 1930 को अदालत ने भगत सिंह को भारतीय दंड़ संहिता की धारा 129 और 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 तथा 6 एफ तथा भारतीय दंड़ संहिता की धारा 120 के अन्तर्गत अपराधी करार दे दिया। 7 अक्टूबर 1930 को 68 पृष्ठों के फैसले में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। इसके विरोध में प्रिवी परिषद में याचिका दायर की गई जिसे रद्द कर दिया गया। इस अवसर पर सरकारी वकील ने भगत सिंह को क्षमा याचना करने के लिए कहा। इसके उत्तर में भगत सिंह ने कहा, इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। दुश्मन की भीख पर जीने की अपेक्षा बहादुरी से मर जाना अच्छा है। मेरे लिए जीवन का इतना महत्व नहीं है कि इसे सिद्धांतों की अमूल्य निधि का बलिदान करके बचाया जाए। इसे एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ही कहा जा सकता है कि आजसदी के इन परवानों के योगदान को महात्मागांधी एक सिरे से ही नकार दिया और ऐसे सभी हिसांत्मक प्रियाकलापों को अनदेखा कर दिया बल्कि उन्हें स्वतंत्रता प्राप्ति के आन्दोलन का हिस्सा तक स्वीकार नहीं किया।देश की जनता के व्यापक विरोध के कारण अंग्रेज प्रशासन घबरा गया और 24 मार्च 1931 के बजाय तीनों वीर सपूतों भगत सिंह, राजगुरुऔर सुखदेव को एक दिन पहले ही फांसी पर लटका दिया गया।






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