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01/10/2019  :  10:08 HH:MM
64 प्रतिशत लोगों को दिल के स्‍वास्‍थ्‍य का खतरा
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अंबाला इस विश्व हृदय दिवस पर, सफोलालाइफ ने अपने प्रमुख अध्ययन के माध्यम से आमतौर पर नजरअंदाज की जाने वाली जीवनशैली से संबंधित आदतों के बारे में बताया है। इसमें बताया गया है कि कैसे इन लाइफस्‍टाइल आदतों का उच्‍च संबंध हृदय स्‍वास्‍थ्‍य जोखिम से है।

सबसे ज्‍यादा चौंकाने वाली बात है हृदय के स्‍वास्‍थ्‍य पर इन आदतों से पडऩे वाले प्रभाव को लेकर जागरुकता का अभाव। हृदय के लिये स्वास्थ्यकर जीवनशैली अपनाने के विषय में पोषण विशेषज्ञ नीति देसाई ने कहा, ‘‘हमारे शरीर के संपूर्ण स्वास्थ्य पर जीवनशैली की
भूमिका अहम है, लेकिन अधिकांश लोग यह नहीं जानते हैं। सफोलालाइफ अध्ययन आपकी जीवनशैली और आपके हृदय के स्वास्थ्य के बीच का स बंध बताता है। प्रत्येक व्यक्ति इन छोटी आदतों पर ध्यान देकर और अपनी जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव लाकर
बेहतरी की ओर बढ़ सकता है। इसके लिये सही भोजन लें, नियमित व्यायाम करें, पर्याप्त नींद लें और तनाव कम करें।’’ आज के दौर में, काम करने के व्‍यस्‍त शेड्यूल और सुस्‍त जीवनशैली से भारतीयों के हृदय का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। हृदय के जोखिम को बढ़ाने वाले कई कारक हैं, लेकिन इन छोटे कारकों को जानना जरूरी है और हृदय के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिये जीवनशैली में बदलाव चाहिये। इसलिये, इस वर्ष विश्व हृदय दिवस के अवसर पर, सफोलालाइफ अध्ययन का मकसद हमार हृदय के स्‍वास्‍थ्‍य पर उन छोटी आदतों के प्रभाव पर जागरूकता फैलाना है, जिन्‍हें पहचानने में हम नाकाम रहते हैं। इस अध्ययन में सामने आई एक प्रमुख बात यह है कि भारत के प्रमुख शहरों में रहने वाले 64 प्रतिशत लोगों में हृदय का जोखिम अधिक है जोकि नींद की कमी, तनाव, सुस्‍त जीवनशैली, समय पर भोजन न करना और बेली फैट (पेट के पास जमा चर्बी) जैसे एक या अधिक आदत को प्रदर्शित करते हैं। भारत स्वास्थ्य के प्रति सचेत हो रहा है, लेकिन हृदय के स्वास्थ्य पर जागरूकता अब भी कम है। हमारे जीवन की छोटी-छोटी आदतें, जिन पर हम ध्यान नहीं देते हैं, चुपचाप हमारे हृदय के लिये जोखिम बढ़ाती रहती हैं। हालांकि, हमें उच्‍च कोलेस्ट्रॉल, उच्च रक्तचाप, मधुमेह आदि जैसे मार्कर्स के बारे में जानकारी है लेकिन हम अक्‍सर छोटी-छोटी दिखने वाले लाइफस्‍टाइल आदतों से पडऩे वाले असर को लेकर जागरुक नहीं हैं जोकि हमारे नियंत्रण में होती हैं। इन आदतों के प्रभाव को समझकर हम हृदय के स्वास्थ्य पर जागरूकता एवं देखभाल को बेहतर बना सकते हैं।






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