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समाचार ब्यूरो
02/10/2019  :  11:22 HH:MM
सत्य और अहिंसा का दूसरा नाम था महात्मा गांधी
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र के 74वें सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि महात्मा गांधी का सत्य एवं अहिंसा का संदेश शांति, विकास एवं प्रगति के लिए आज भी प्रासंगिक है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भी 15 अगस्त 1947 की आधी रात को कभी न भुलाए जाने वाले भाषण ‘नियति से मुलाकात’ में कहा था कि महात्मा ‘देश की मूल भावनाओं के प्रतीक हैं’, जिनकी बातों को ‘आने वाली पीढिय़ां’ याद रखेंगी।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि गांधी जी का सत्य एवं अहिंसा का संदेश सम्पूर्ण विश्व के लिये सदी के सबसे महान संदेशों में सर्वोच्च है। महात्मा गांधी ने अपने जीवन दर्शन को इन शब्दों ‘मेरा जीवन ही मेरा संदेश है’ से व्यक्त किया है। उनका विविध और सक्रिय व्यक्तित्व सत्य और सिर्फ सत्य पर ही आधारित था। अहिंसा इनके जीवन का दूसरा सबसे बड़ा सिद्धांत था। ‘सादा जीवन, उच्च विचार’, ‘अहिंसा परमोधर्म’ का संदेश देने वाले हमारे महान राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी ने सत्य के रास्ते पर चलते हुए देश को आजादी के मुकाम तक पहुंचाया और अपने लक्ष्य को पाया। महात्मा गांधी आजीवन सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चले। दो अक्तूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती है। देश और दुनिया में सत्य और अहिंसा की नयी राह दिखानेवाले मोहनदास करमचंद गांधी सिर्फ नाम नहीं बल्कि विचार हैं। बापू कहते थे कि, ‘मेरा धर्म सत्य और अहिंसा पर आधारित है। सत्य मेरा भगवान है, अहिंसा उसे पाने का साधन।’ गांधीजी ने सत्य की राह पर चल कर सत्याग्रह की नींव रखी। कठिन मोड़ आने पर भी उन्होंने सत्य का साथ कभी नहीं छोड़ा। भारत छोड़ो आंदोलन की पूर्व संध्या पर 8 अगस्त 1942 को बम्बई में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में महात्मा गांधी ने घोषणा की थी कि मैं अपने जीवन की पूरी अवधि को जीना चाहता हूं और मेरे अनुसार पूरी अवधि 125 वर्षों की है। उस समय तक न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया मुक्त (आजाद) हो जायेगा। मैं नहीं मानता कि आज अंग्रेज स्वतंत्र हैं, मैं ये भी नहीं मानता कि आज अमेरिकन स्वतंत्र हैं। वे क्या करने के लिए स्वतंत्र हैं ? मानवता के दूसरे पहलू को बंधक बनाने के लिए ? क्या वे अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे हैं ? मैं अहंकारी नहीं हूं। मैं घमंडी नहीं हूं। मैं गर्व, अहंकार, धृष्टता और इन सबके बीच अंतर को भली भांति समझता हूं। लेकिन मैं यह कहता हूं कि मुझे भगवान में विश्वास है। यह एक ऐसा आधारभूत सत्य है जो मैं आपको कह रहा हूं।गांधी जी न तो एक दार्शनिक थे और न ही एक राजनीतिज्ञ। वे सत्य के सबसे बड़े साधक थे। सत्य सबको जोड़ता है क्योंकि यह केवल एक और एक ही हो सकता है। आप किसी व्यक्ति का सर काट सकते हैं पर उसके विचारों को नहीं काट सकते। अहिंसा सत्य का ही दूसरा पहलू है। अहिंसा प्रेम है जो जीवन का सार भी है। अहिंसा के इसी सिद्धांत को अपनाते हुए गांधी जी ने बुराई और असत्य के खिलाफ प्रतिरोध शुरू किया।उनका सत्याग्रह अपार प्रेम और करूणा से प्रेरित है।

विदेशों में हर जगह राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करते हुए लोग गांधीजी को याद करते हैं और सत्य, शांति और अहिंसा का रास्ता अख्तियार करने की प्रण लेते हैं। अमेरिका में नस्लवाद के खात्मे के लिए लड़ रहे मार्टिन लुथर किंग रहे हों, दक्षिण अफ्र ीका में नेल्सन मंडेला या पूर्वी जर्मनी में साम्यवादी शासन के खिलाफ हर सोमवार को लाइपजिग में प्रदर्शन कर रहे नागरिक अधिकार के लिए संघर्ष करते लोग। आंदोलन को हिंसक न होने देना उनके लक्ष्यों में शामिल था। उन प्रदर्शनों का अंत जर्मन एकीकरण और शीतयुद्ध की समाप्ति के रूप में सामने आया। अमेरिका में सिविल राइट्स लीडर मार्टिन लूथर किंग जूनियर गांधीजी पर एक लेक्चर में शामिल हुए। उन्होंने महात्मा पर लिखी गई आधा दर्जन किताबें खरीदीं और सत्याग्रह को अपनाया। भारत से बाहर उन्होंने अहिंसा का
सबसे कारगर इस्तेमाल किया। किंग ने कहा था, ‘नफ रत से नफरत पैदा होती है। हिंसा से हिंसा।’ उन्होंने कहा था कि हमें नफरत की ताकत का मुकाबला आत्मबल से करना चाहिए। किंग ने यह भी कहा था, ‘अहिंसक प्रतिरोध का गांधीवादी तरीका हमारे आंदोलन की मशाल बना। आज भी जब विदेशों में कोई भारतप्रेमी भारत के बारे में बात करता है तो सत्य और शांति के रामराज्य की कल्पना में होता है, लेकिन साथ ही ये सवाल पूछता है कि गांधी के भारत को क्या हो गया है? अंग्रेजों से आजादी के लिए दुनिया के पहले सफ ल
अहिंसक आंदोलन के महात्मा असामान्य नेता थे। वह दार्शनिक भी थे, जो अपने आदर्शों पर चलने की कोशिश करते थे। इन आदर्शों में आत्मसुधार से लेकर सामाजिक बदलाव जैसी बातें शामिल थीं। उनकी आत्मकथा का नाम भी ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग की कहानी’ है। अहिंसा के जरिये गांधीजी को नैतिक बढ़त मिली। अहिंसक तरीके से कानून तोडक़र उन्होंने दिखाया कि वे कानून गलत थे। उनके जरिये अन्याय हो रहा था। अंग्रेजों की दी गई सजा को स्वीकार करके उन्होंने विरोधियों को उनकी बर्बरता का अहसास कराया। भूख हड़ताल से उन्होंने साबित किया कि सच की खातिर वह किस हद तक पीड़ा बर्दाश्त करने को तैयार हैं। आखिर में उन्होंने अंग्रेजों का देश में टिके रहना मुश्किल कर दिया। गांधी जी से प्रभावित होकर प्रसिद्ध वैज्ञानिक आईन सरोन को यह कहना पड़ा था कि, ‘पीढिय़ां आएंगी और उन्हें यह विश्वास नहीं होगा कि गांधी जी जैसे सादे व्यक्ति ने खून की एक बूंद गिराए बिना ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें हिला दीं।’

गांधी जी कहा करते थे, "मैं हिंसा का इसलिए विरोध करता हूं कि जब हिंसा से कुछ अच्छा हासिल होता है तो वह क्षणिक होता है, लेकिन इससे जो बुराई पैदा होती है वह स्थाई होती है।" आज बेशक गांधीजी हमारे बीच नहीं हैं लेकिन आज भी उनकी शिक्षाएं हमारे जीवन में खास महत्व रखती हैं। विश्ववन्द्य बापू सत्य के प्रतीक थे। वह देश में राम राज्य की स्थापना करना चाहते थे लेकिन उनका यह सपना पूरा न हो सका। आज हमें यह सवाल करना चाहिए कि गांधी जिस भावना के प्रतीक थे, वह देश में कितनी बची है। गांधीजी अहिंसा और सत्य के सिद्धांतों से काफ ी प्रभावित थे। उन्होंने इनका इस्तेमाल देश को आजादी दिलवाने में किया। 1982 में ऑस्कर से अवॉर्ड जीतने वाली फि ल्म गांधी के पोस्टर पर लिखा था, ‘गांधी की जीत ने दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया।’ं गांधीजी के सत्य और अहिंसा के विचार न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए व्यापक महत्व रखते हैं। जब कर्म, जाति, भाषा और राष्ट्रीयता इत्यादि के नाम पर घृणा का माहौल बन गया हो, ऐसे में इससे उबरने के लिए मानवता के सामने गांधी ही एकमात्र विकल्प हैं इसलिए हमारा प्रयास ऐसा होना चाहिए कि सामाजिक, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति और सौहार्द की स्थापना की जा सके। भारत की प्राचीन महानता पर आज के संदर्भ में लोग तभी भरोसा कर पाएंगे जब भारत आज भी सत्य, शांति और अहिंसा का परिचय दे, सत्य का संघर्ष अहिंसात्मक तरीकों से करे। सही मायनों में गांधी जी विचार हमेशा प्रासंगिक रहेंगे।






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