समाचार ब्यूरो
06/10/2019  :  10:32 HH:MM
नेतृत्व की कमजोरी, सबकी सीनाजोरी!
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हुड्डा अब पार्टी छोड़ेंगे कि तब! चुनाव की घोषणा के पहले तक ये चर्चा आम थी। उन्होंने आंख दिखाई नेतृत्व को। खुलेआम रैली करके चुनौती दी। पार्टी के मौजूदा नेतृत्व को इशारों में कोसते हुए कहा कि अब वो कांग्रेस नही रह गई। अंतत: पार्टी को हुड्डा की ताकत का एहसास हुआ वो जो चाहते थे उससे कहीं ज्यादा पार्टी ने उनको दे दिया।
लिहाजा वे फिर से पूरे समर्पित योद्धा की तरह कांग्रेस का झंडा लेकर मैदान में उतर गए। हुड्डा रह गए और जिसके जाने के बारे में कोई चर्चा दूर-दूर तक नही हो रही थी। चुनाव के ठीक पहले तक पार्टी अध्यक्ष रहे अशोक तंवर प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देकर चले गए। किसको फायदा होगा और किसको नुकसान इसका आकलन शायद चुनाव परिणाम के बाद ज्यादा अच्छे तरीके से होगा। लेकिन एक बात अभी कही जा सकती है कि हरियाणा के मामले में कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व विफल रहा है। हुड्डा हरियाणा में पार्टी के कद्दावर नेता रहे हैं। गांधी परिवार के प्रति उनकी आस्था भी कभी संदिग्ध नहीं रही। फिर ऐसा क्यों हुआ कि वे पार्टी नेतृत्व को आंख दिखाने को मजबूर हुए। आखिर उनको भरोसे में लेकर फैसले क्यों नहीं किये गए। अगर पार्टी को लग रहा था कि नया नेतृत्व तैयार करना है तो उनको कोई अन्य अहम जिम्मेदारी के लिए क्यों नहीं मनाया गया। राहुल गांधी ने अशोक तंवर को अध्यक्ष बनाया लेकिन तंवर न खुद स्थापित हो पाए और न ही नेतृत्व उनको स्थापित कर पाया। उनकी पिटाई हुई जांच कमेटी बनी। सबको पता था कि क्या हो रहा है। अध्यक्ष रहते हुए उनकी मान प्रतिष्ठा का चीरहरण हुआ। और अध्यक्ष पद से हटे तो उन्होंने हुड्डा के ही अंदाज में पार्टी को आंख दिखाने की कोशिश की लेकिन सफल नही हो पाए। दरअसल राजनीति में व्यक्तिगत ताकत जरूरी होती है और अगर आप उसमे कमजोर हैं तो नेतृत्व इतना मजबूत होना चाहिए कि उसके कमजोर फैसले भी मजबूत बन जाएं। हरियाणा में मनोहर लाल आये। उनको कौन नेता मानता था। लेकिन मोदी और शाह के फैसलों को चुनौती देने की स्थिति में आज पार्टी में कोई भी नही है। लिहाजा वे न सिर्फ स्थापित हुए बल्कि पार्टी को हरियाणा में उन्होंने नई ताकत दे दी। आज मनोहर लाल निर्विवाद रूप से पार्टी के बड़े नेता हैं। भाजपा के मामले में कई राज्यों के उदाहरण हैं जहाँ पार्टी नेतृत्व ने जो भी फैसला किया वही सबको सर माथे लेना पड़ा। जिसने भी विरोध सांकेतिक रूप से भी किया उसका हश्र शत्रुघ्न सिन्हा और यशवंत सिन्हा जैसा हुआ। कांग्रेस भी कभी इसी तरह से फैसले लेती थी। जिसपर नेतृत्व ने हाथ रखा उसको स्वीकार करना सबकी मजबूरी होती थी। ऐसा नही है कि लोगों ने बगावत नही की। खूब हुआ सबकुछ हुआ लेकिन स्थिति पर नेतृत्व ने अपने कौशल से न केवल नियंत्रण किया बल्कि यह भी साबित किया कि हाईकमान क्या होता है। सोनिया गांधी के कार्यकाल तक ये स्थिति बनी रही। लेकिन दुर्भाग्य से राहुल गांधी न राजनीति ठीक से कर पाए और न ही वे इसका मर्म समझ पाए। यही वजह है कि वे खुद भी बड़ी लकीर खींचने में सफल नही हुए और उन्होंने जिसपर हाथ रखा आज उनकी ये गति तो होनी ही थी। ये स्वीकार करना होगा कि हुड्डा का कद हरियाणा में काफी बड़ा है। आज जो भी नेता हैं उनमें अकेले वही हैं जिनका पूरा प्रदेश में आधार है। तंवर दलित नेता हैं युवा हैं। काफी संभावनाएं हैं। लेकिन हुड्डा अगर फिर से कांग्रेस की कमान ले पाए तो ये तंवर को सोचना होगा कि उनमें कहाँ कमी रह गई। राजनीति वास्तविकताओं पर चलती है भावनाओं पर नहीं। आगे हो होगा सबको नजर आएगा। -जय हिंद






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