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समाचार ब्यूरो
11/10/2019  :  10:36 HH:MM
स्तन कैंसर से बचने के लिए जागरूक और सावधान रहना जरूरी
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पंचकूला भारत में बीते एक दशक में स्तन कैंसर के मामले कई गुना बढ़ गए हैं। स्तन कैंसर पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीय महिलाओं को कम उम्र में भी शिकार बना रहा है। भारतीय औरतों में स्तन कैंसर होने की औसत उम्र लगभग 47 साल है, जो कि पश्चिमी देशों के मुकाबले 10 साल कम है। सही जानकारी, जागरुकता, थोड़ी सी सावधानी और समय पर इसके लक्षणों की पहचान और इलाज से इस समस्या को हराया जा सकता है।

पारस अस्पताल पंचकूला के ऑनकोलॉजी विभाग के डायरेक्टर डॉ. बिग्रे. राजेश्वर सिंह, सर्जीकल ऑनकोलॉजी के सीनियर कंस्लटेंट डॉ. राजन साहू तथा रेडियोथैरेपी के कंस्लटेंट डॉ. परनीत सिंह ने पत्रकारों के साथ बातचीत की। डॉ. राजेश्वर सिंह ने इस अवसर पर संबोधन करते हुए गत चार दशकों से भारत में गर्भाश्य कैंसर सबसे अधिक जानलेवा माना जाता था, पर अब ब्रेस्ट कैंसर इससे भी अधिक जानलेवा साबित हो रहा है। ब्रेस्ट कैंसर हर साल 21 लाख महिलाओं को अपनी गिरफ्त में ले रहा है, जबकि भारत में हर वर्ष ब्रेस्ट कैंसर के 1.5 लाख नए केस सामने आ रहे हैं। कुछ दशक पहले ब्रेस्ट कैंसर की समस्याएं महिलाओं में 50 साल की उम्र के बाद देखने में आती थी तथा इस बीमारी से प्रभावित जवान महिलाओं की गिनती बहुत कम थी। 65 से 70 प्रतिशत महिलाएं 50 साल से अधिक उम्र की होती थी तथा 30 से 35 प्रतिशत महिलाएं 50 वर्ष से कम उम्र की होती थी, जिनको ब्रेस्ट कैंसर की समस्या थी। पर अब जवान उम्र में ब्रेस्ट कैं सर की समस्या आम हो गई है। करीब 50 प्रतिशत महिलाएं 25 से 60 वर्ष की उम्र के मध्य हैं, जो कैंसर से पीडि़त है। डॉ. राजन साहू ने कहा कि उत्तरी भारत में ब्रेस्ट कैंसर के 50 प्रतिशत केस 25 से 60 साल की उम्र में सामने आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि भारत में कैंसर की मरीज महिलाओं में 27 प्रतिशत ब्रेस्ट कैंसर से पीडि़त हैं। उन्होंने कहा कि यदि हम इस प्रति जागरूक न हुए तो इसकी
जांच नहीं करवाते तो स्थिति और भी खराब हो जाएगी। उन्होंने बताया कि ब्रेस्ट कैंसर की स्वयं जांच तथा मैमोग्राफी इसका पता लगाने के लिए साधारण तकनीक हैं, पर यह देखने में आया है कि भारत में 75 प्रतिशत महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर की जांच से शर्माती है। डॉ. परनीत सिंह ने कहा कि आगामी दो दशकों में भारत में कैंसर के केसों की गिनती में 70 प्रतिशत इजाफा होने का अंदेशा है। उन्होंने कहा कि भारत में कैंसर अभी भी एक बुराई समझी जा रही हैं तथा ब्रेस्ट कैंसर से पीडि़त महिलाएं अपने परिवार में इस के बारे खुलकर बात नहीं करती। उन्होंने कहा कि कैंसर के लिए हमें समाज के रवैये के कारण कैंसर के मरीज अपनी बीमारी के बारे खुलकर बात नहीं करते तथा डर का यह चक्कर ही प्राथमिक पड़ाव तथा कैंसर की जांच में अड़चन बना हुआ है। यही कारण है कि भारत में इस बीमारी की जांच में देरी हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में 60 प्रतिशत केसों में जांच तब होती है, जब कैंसर तीसरी या चौथी स्टेज पर पहुंच चुका होता है।






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