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समाचार ब्यूरो
16/10/2019  :  11:02 HH:MM
स्वेच्छा से ही घटेगा ह्रश्वलास्टिक का उपयोग
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केन्द्र सरकार द्वारा प्रदूषण पर रोकथाम तथा स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए अभी ‘सिंगल यूज ह्रश्वलास्टिक’ (एकल उपयोग वाली ह्रश्वलास्टिक) पर पूर्ण प्रतिबंध न लगाते हुए ह्रश्वलास्टिक के खिलाफ जन-जागरूकता अभियान छेडऩे का आव्हान किया गया है ताकि लोग स्वेच्छा से इससे दूरी बनाएं। फिलहाल सरकार पॉलीथीन बैग के उत्पादन, भण्डारण तथा उपयोग के नियमों को लागू करने के लिए राज्य सरकारों को निर्देश देगी और तीन वर्ष बाद एकल उपयोग वाली ह्रश्वलास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर सख्ती शुरू की जाएगी।

हालांकि कुछ समय से माना जा रहा था कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के अवसर पर सरकार इस प्रकार के ह्रश्वलास्टिक के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर इसे आम व्यवहार से पूरी तरह दूर करने के कड़े कदम उठाएगी लेकिन दो अक्तूबर को केन्द्र
सरकार द्वारा देश की जनता से ‘सिंगल यूज ह्रश्वलास्टिक’ की आदतों पर नियंत्रण का आव्हान किया गया और सिंगल यूज ह्रश्वलास्टिक के खिलाफ अभियान को जन जागरूकता तक ही सीमित रखते हुए इस पर पूर्ण रोक नहीं लगाने का निर्णय लिया गया। इसका एक कारण यही रहा कि एकाएक इस तरह का प्रतिबंध देश में लागू कर देने से खासकर अर्थ जगत में चहुं ओर अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो जाता और पहले ही मंदी के दौर से गुजर रही देश की अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा झटका लगता। अचानक उठाए जाने वाले ऐसे कदम
से लाखों लोगों की नौकरी भी खतरे में पड़ जाती। दरअसल देश में ह्रश्वलास्टिक उत्पादों का प्रतिवर्ष करीब चार लाख करोड़ रुपये का कारोबार होता है, जिसमें से 30-40 हजार करोड़ का कारोबार सीधे ह्रश्वलास्टिक उद्योग से ही होता है। ह्रश्वलास्टिक उद्योग से देशभर में 11 लाख प्रत्यक्ष और करीब 50 लाख अप्रत्यक्ष रोजगार जुड़े हुए हैं।

हालांकि एकल उपयोग वाली ह्रश्वलास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध के उद्देश्य में एक अच्छी सोच निहित थी किन्तु चूंकि एकाएक लगाए जाने वाले ऐसे प्रतिबंध से उपजने वाली परेशानियों से निपटने के लिए सरकार द्वारा पूरी तैयारियां नहीं की गई थी, इसीलिए यह प्रतिबंध व्यावहारिक भी नहीं होता। बेहतर है कि सरकार द्वारा फिलहाल ह्रश्वलास्टिक के उपयोग को हतोत्साहित करने के लिए प्रतिबंध के बजाय जन-जागरूकता अभियान पर चलाए जाने का ही निर्णय लिया गया है। सरकार द्वारा अब 2022 तक एकल उपयोग वाली ह्रश्वलास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध की तैयारी की जा रही है और ये तीन साल जनता को जागरूक करने तथा ह्रश्वलास्टिक का बेहतरीन पर्यावरणीय विकल्प खोजने के लिए पर्याप्त होंगे। इस दौरान ह्रश्वलास्टिक कप, बोतल, स्ट्रा इत्यादि के इस्तेमाल पर धीरे-धीरे रोक लगाई जाएगी और ह्रश्वलास्टिक की रिसाइकलिंग के लिए स्टार्टअप को प्रोत्साहन दिया जाएगा। हालांकि भारत में प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति ह्रश्वलास्टिक की खपत अमेरिका तथा चीन के मुकाबले काफी कम है लेकिन संकट बहुत बड़ा है। अमेरिका में यह सालाना खपत प्रति व्यक्ति 106 किलाग्राम और चीन में 38 किलोग्राम है जबकि भारत में यह 11 किलोग्राम है। देश में प्रतिवर्ष 1.4 करोड़ टन ह्रश्वलास्टिक का इस्तेमाल होता है, जिसमें से 40 फीसदी रिसाइकल नहीं हो पाता।

एकल उपयोग वाली ह्रश्वलास्टिक को ही प्रतिबंध के दायरे में लाए जाने का सबसे बड़ा कारण यही है कि देश में कुल ह्रश्वलास्टिक कचरे का करीब पचास फीसदी यही ह्रश्वलास्टिक होता है। आंकड़े देखें तो समुद्रों में ही दस करोड़ टन ह्रश्वलास्टिक कचरा फेंक दिया गया और इसी ह्रश्वलास्टिक कचरे से समुद्री जीवों पर भी गंभीर संकट मंडरा रहा है। कई शोधों से यह भी पता चल चुका है कि मनुष्यों से लेकर व्हेल सहित अनेक समुद्री जीवों की आंतों में भी सूक्ष्म ह्रश्वलास्टिक के कण मिले हैं। आश्चर्य एवं चिंता की बात यह है कि ह्रश्वलास्टिक के तमाम खतरों को जानते-बूझते हुए भी न आमजन की ओर से इसके उपयोग से बचने के प्रयास होते दिखते हैं और न ही सरकारों द्वारा इससे मुक्ति के लिए इससे पहले कोई ठोस कार्ययोजना अमल में लाई जाती दिखी है। ह्रश्वलास्टिक का उपयोग भले ही सुविधाजनक होता है किन्तु इस तथ्य को नजरअंदाज करना समूची प्रकृति के लिए खतरनाक है कि ह्रश्वलास्टिक जल, वायु और जमीन सहित हर प्रकार से पर्यावरण को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचाता है। ह्रश्वलास्टिक में इतने घातक रसायन होते हैं, जो इंसानों के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी बहुत बड़ा खतरा बनकर सामने आ रहे हैं, जिसके खतरनाक प्रभावों से जलचर प्राणियों के अलावा पशु-पक्षी भी अछूते नहीं रहे हैं और मनुष्यों में कैंसर जैसी बीमारियां जन्म ले रही हैं। दरअसल ह्रश्वलास्टिक खेतों की मिट्टी के अलावा तालाबों, नदियों से होते हुए समुद्रों को भी बुरी तरह प्रदूषित कर चुका है। इन्हीं खतरनाक प्रभावों के मद्देनजर सरकार द्वारा एकल उपयोग वाली ह्रश्वलास्टिक के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश सहित देशभर के डेढ़ दर्जन राज्यों में पहले से ही ह्रश्वलास्टिक की ह्रश्वलेट, चम्मच, कप, स्ट्रा इत्यादि सिंगल यूज ह्रश्वलास्टिक पर प्रतिबंध है लेकिन उस पर अमल होता कम ही दिखा है। दरअसल बगैर जन-आन्दोलन के इस तरह के खतरनाक ह्रश्वलास्टिक से पूर्णत: मुक्ति पाना असंभव ही है और यही कारण है कि पिछले कुछ समय से मांग की जा रही है कि इस तरह के ह्रश्वलास्टिक पर पाबंदी लगाने से पहले सरकार उसका सस्ता और पर्यावरण हितैषी विकल्प देश की जनता को दे ताकि वे स्वयं पर्यावरण हितैषी सस्ते विकल्प की ओर आकर्षित हों और स्वेच्छा से सिंगल यूज ह्रश्वलास्टिक से दूरी बनाना शुरू कर दें। कपड़े की थैलियां, दोबारा उपयोग किए जा सकने वाले मोटी ह्रश्वलास्टिक के डिब्बे, मोटे कागज के लिफाफे, मिट्टी के बर्तन बहुत महंगे विकल्प साबित हो रहे हैं और इस प्रकार की वस्तुओं के लिए ग्राहकों से अतिरिक्त कीमत भी नहीं वसूली जा सकती, इसलिए बेहद जरूरी है कि सिंगल यूज ह्रश्वलास्टिक के सस्ते और पर्यावरण हितैषी विकल्प जल्द से जल्द खोजे जाएं। ह्रश्वलास्टिक की थैलियां, ह्रश्वलेट, गिलास, चम्मच, बोतलें, स्ट्रा, थर्मोकोल इत्यादि सिंगल यूज ह्रश्वलास्टिक के ऐसे रूप हैं, जिनका उपयोग प्राय: एक ही बार किया जाता
है और इस्तेमाल के बाद फेंक दिया जाता है। इस प्रकार के ह्रश्वलास्टिक में पाए जाने वाले रसायन पर्यावरण के साथ-साथ लोगों और तमाम जीव-जंतुओं व पशु-पक्षियों के लिए बहुत घातक साबित होते हैं। पॉलीथिन चूंकि पेपर बैग के मुकाबले सस्ती पड़ती हैं, इसीलिए अधिकांश दुकानदार इसका इस्तेमाल करते रहे हैं। प्रतिवर्ष उत्पादित ह्रश्वलास्टिक कचरे में से सर्वाधिक ह्रश्वलास्टिक कचरा सिंगल यूज पलास्टिक का ही होता है और इसका खतरा इसी से समझा जा सकता है कि ऐसे ह्रश्वलास्टिक में से केवल 20 फीसदी ह्रश्वलास्टिक ही रिसाइकल हो पाता है, करीब 39 फीसदी ह्रश्वलास्टिक को जमीन के अंदर दबाकर नष्ट किया जाता है, जिससे जमीन की उर्वरक क्षमता प्रभावित होती है और यह जमीन में केंचुए जैसे जमीन को उपजाऊ बनाने वाले जीवों को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर देती है। 15 फीसदी ह्रश्वलास्टिक जलाकर नष्ट किया जाता है और ह्रश्वलास्टिक को जलाने की इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में वातावरण में उत्सर्जित होने वाली हाइड्रो कार्बन, कार्बन मोनोक्साइड तथा कार्बन डाईऑक्साइड जैसी गैसें फेफड़ों के कैंसर व हृदय रोगों सहित कई बीमारियों का कारण बनती हैं। ब्रसेल्स आयोग के सदस्य फ्र ांस टिमरमंस के अनुसार ह्रश्वलास्टिक की थैली सिर्फ पांच सकै ें ड म ें ही तैयार हो जाती है, जिसका लोग अमूमन पांच मिनट ही इस्तेमाल करते हैं, जिसे गलकर नष्ट होने में पांच सौ साल लग जाते हैं।






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