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समाचार ब्यूरो
19/10/2019  :  11:29 HH:MM
अभिजीत का नोबेल पुरस्कार है बेहद खास
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दुनिया भर में इस बात को लेकर अक्सर शक रहता है कि सरकार की गरीबों के लिए लोकलुभावन योजनाएं जमीनी हकीकत में कितनी सफल होंगी। दरअसल इसकी वजहें भी हैं और वह यह कि दफ्तरों में कागजों पर तो ये बहुत उपयोगी और जनकल्याणकारी दिखती हैं पर हकीकत में इसका लाभ उन तक नहीं पहुँच पाता है जिनके लिए बनी होती हैं।

कारण पर चिन्ता किए बगैर योजनाओं को अमल में लाने से इन पर अंधाधुंध खर्च तो हो जाता है लेकिन जब नतीजों का लिटमस टेस्ट होता है तो योजनाओं का सारा अर्थशास्त्र नकारा साबित होता है. इस वर्ष के नोबल पुरुस्कार विजेता अभिजीत बैनर्जी की इसी चिन्ता और उस पर लगातार काम तथा हासिल परिणामों ने उन्हें न केवल दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पुरुस्कार तक पहुंचाया बल्कि उन्होंने दुनिया भर की आंखें भी अपने छोटे-छोटे सफल प्रयोगों से खोल दी जो गरीबी मिटाने के खातिर बनी योजनाओं पर बरसों बरस से सराकरों और
प्रशासन की कथनी और करनी का फर्क बनी हुई थी. बिरले लोग ही होते हैं जो हकीकत के धरातल पर उतरकर, गरीबी भोगकर, देखकर किसी नतीजे पर पहुंचते हैं. कम से कम अर्थशास्त्र में यह फण्डा जरूरी होता है जो अभिजीत बैनर्जी उनकी अर्धांगिनी एस्थर डुफ्लो और माइकल क्रेमर ने कर दिखाया तथा संयुक्त विजेता बने। अभिजीत बनर्जी मानते हैं कि गरीबी के बारे में बातें तो बहुत की जाती हैं, उन पर बड़े और बुनियादी सवाल भी होते हैं लेकिन गरीबी की असल वजह और केवल अनुदान से इसे हटाने की हकीकत और सरकारी योजनाओँ को अमल में लाते सरकारी और गैर सरकारी महकमों की भूमिकाओं के रियलिटी चेक पर ही सारा दामोदार टिका होता है. यानी इसकी तह में गए बिना ही योजनाओं पर भारी भरकम खर्च हो जाता है और नतीजे उत्साहजनक नहीं होते. बाद में इस पर बहसें होती हैं जिसका कोई नतीजा नहीं निकलता है. वह यह मानते भी हैं और कर भी दिखाया। उन्होंने गरीबी को सुलझाने लायक हिस्सों को तीन बांटा और एक हिस्से पर एक किलो दाल के प्रयोग ने सरकारी योजनाओं की सफलता को न केवल पंख लगा दिए बल्कि यह भी साबित कर दिया कि जरा सी अतिरिक्त मदद किस तरह सफलता का कारण बनती है. टीकाकरण की कामियाबी को बढ़ाने के लिए लॉटरी से चयनित 120 गाँवों को तीन अलग हिस्सों में बांटा. पहले में लोगों से अस्पताल पहुंचकर टीके लगवाने, दूसरे में लोगों के दरवाजों तक मोबाइल अस्पताल पहुंचाकर टीके लगवाने तथा तीसरे में मोबाइल क्लीनिक सहित एक दाल पहुंचाने का ऑफर रखा गया. जब नतीजों को परखा गया तो पाया कि जहां दाल दी गई वहां टीकाकरण की सफलता 39 प्रतिशत तक पहुंच गई जबकि बाकी दोनों हिस्सों में इससे आधे से कम रही. इस तरह अर्थशास्त्री अभिजीत ने साबित कर दिखाया कि गरीबी से निपटने के लिए बहुत ही छोटे प्रोत्साहन हैरत अंगेज नतीजे देने वाले होते हैं जिससे सरकार की हजार गुना बड़ी बचत भी होती है तथा यह एक किलो दाल की तुलना में हजार गुना ज्यादा है। इससे साबित भी हो गया कि गरीबों की जरूरतें और मजबूरी के बीच का वह फर्क समझना होगा जो बहुत मामूली होता है और जिसके चलते गरीब एक दिन के खाने के जुगाड़ की कीमत के एवज में सेहत कई गुना फायदेमंद मुफ्त की बड़ी सुविधा तक छोड़ देते हैं. इन अर्थशास्त्रियों ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारी सब्सीडी देने का जो मॉडल तैयार किया है उसे कई देशों ने लागू कर दिया. इनके रिसर्च पर ही भारत में गरीब दिव्यांग बच्चों की स्कूली शिक्षा को बेहतरी मिली और करीब 50 लाख बच्चों का फायदा मिला. तीन नोबेल पुरुस्कार विजेताओं ने अपने सहयोगियों के साथ स्वास्थ्य के क्षेत्र में सब्सीडी का जो मॉडल तैयार किया उसे कई देशों में लागू किया जा चुका है. इन्होंने केन्या में यह साबित भी किया कि स्कूलों के नतीजे सुधारने में यह कितना सफल है।

हालाकि नोबेल पुरुस्कार जीतने वाले अभिजीत बनर्जी 2017 में अमेरिकी नागरिकता ले चुके हैं, लेकिन उनका काम भारत में गहराइयों तक रहा है. गरीबी पर बड़े शोध की छाप यहाँ के गरीबों के लाभ के लिए बनी तमाम सरकारी योजनाओं में झलकती है. पंजाब में बीते साल शुरू हुई योजना ‘पानी बचाओ, पैसा कमाओ’ को अमेरिका के मास्साचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की अब्दुल लतीफ जमील पावर्टी एक्शन लैब (जे-पाल) ने बनाया था जिसके सह-संस्थापक हैं अभिजीत और उनकी पत्नी एस्थर दुफ्लो हैं. दोनों पति पत्नी नोबेल पुरस्कार में भी साझीदार हैं। इसमें किसानों को कम बिजली और पानी उपयोग करने के बदले सब्सीडी में पैसे मिलते हैं जो किसानों के खाते में भेजे जाते हैं। बिजली और अब पानी की कमीं से तमाम राज्य सरकारों की मुश्किलें बढ़ी हुई हैं ऐसे में कम बिजली और पानी से खेती की इस स्कीम ने कमाल दिखाया। इसमें पानी बचाने के लिए किसानों को सब्सिडी सीधे उनके खातों में दी जाती है। 6 फीडऱों प्रायोगिक तौर पर शुरू स्कीम की सफलता का अंदाज इसी से दिखता है कि राज्य सरकार ने इसे 250 फीडरों पर लागू कर दिया है. कांग्रेस के वचनपत्र में किसानों को 6 हजार की मासिक मदद भी इनकी सोच थी। शिक्षा के क्षेत्र में भी अभिजीत और उनकी पत्नी एस्थर डुफ्लो का भारत में जबरदस्त योगदान है। दिल्ली में राज्य सरकार द्वारा चलाये जा रहे स्कूलों में श्चुनौतीश् नाम की एक योजना चलाई गई जो दोनों के शोध पर आधारित है. इस अनूठी योजना में कमजोर विद्यार्थियों की रीडिंग स्किल पर खास ध्यान दिया जाता है और उन्हें उनकी उम्र के बजाय जहां तक सीख पाए हैं उस स्तर के आधार पर अलग पढ़ाया जाता है. इसकी तह में पंद्रह साल पहले सही स्तर पर पढ़ाने को ले कर भारत में किया वह व्यापक शोध है जिसमें उन्होंने दस साल काम कर मौजूदा शिक्षा प्रणालियों का अध्ययन और आंकलन किया तथा खाका तैयार कर दिल्ली और 6 और राज्यों में परीक्षण भी किया। प्रदूषण के क्षेत्र में सूरत में हाल ही में अनूठी स्कीम शुरू की गई जिसमें प्रदूषण में कमीं और उत्सर्जन के मानकों को कम करने हेतु उद्योग के खर्चों में कैसे कमीं आएगी बताना है. इसके तहत 155 औद्योगिक इकाइयां पार्टिकुलेट मैटर का व्यापार कर रही हैं जिसमें अभी से उत्सर्जन के स्तरों में कमी आती हुई दिख रही है। इसके
पीछे भी अभिजीत की ही सोच है। 21 फरवरी 1961 को मुंबई में जन्में अभिजीत यूनिवर्सिटी ऑफ कोलकता, जेएनयू दिल्ली और हावर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़े हुए हैं। 1988 में हावर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर चुके इस शख्सियत ने 2015 में अपनी सह नोबल पुरुस्कार विजेता एस्थर डुफ्लो से विवाह विवाह किया जिनसे 1990 में मुलाकात हुई और वह उनके पीएचडी सुपरवाइजर भी थे. हालाकि पहले 1988 में इनका विवाह एमआईटी की प्रो. डॉ. अरुंधती बनर्जी से हुआ दोनों ने था लेकिन 1991 में दोनों का तलाक हो चुका है. अभिजीत ने अर्थशास्त्र पर कई पुस्तकें लिखी हैं पहली पुस्तक वोलाटिलिटी एण्ड ग्रोथ 2005 में प्रकाशित हुई उसके बाद 6 और पुस्तकें लिखीं. स्टॉकहोम में अर्थशास्त्र के नोबेल पुरुस्कार के संयुक्त विजेता अभिजीत बनर्जी, उनकी पत्नी एस्थर डुफ्लो और अमरीकी अर्थशास्त्री माइकल क्रेमर को यह नोबेल वैश्विक स्तर पर गरीबी खत्म करने के काम पर मिलना बदलती और तरक्की की और बढत़ ी दुि नया के लिए बड़ी उपलब्धि है. तीनों ही डेवलपमेण्ट इकॉनामिक्स में माहिर हैं और गरीबी घटाने में अद्भुत काम किया है।






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