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20/10/2019  :  10:10 HH:MM
किंग बनाम किंगमेकर की लड़ाई
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हरियाणा में मतदान के लिए उल्टी गिनती शुरू हो गई है। शुरुआती एकतरफा नजर आ रही लड़ाई के बीच प्रचार में स्थानीय उम्मीदवारों की ताकत और समीकरण ने नए रंग उकेर दिए हैं। मतदाताओं के मन में क्या कैद है इससे इतर मैदानी फिजा बताती है कि मुकाबला दिलचस्प हो रहा है।

सूबाई राजनीति के महारथी भूपेंद्र हुड्डा और कुमारी सैलजा के अनुभव की वजह से मुश्किलों के बावजूद कांग्रेस ने वाकओवर नही दिया है। वहीं नई नवेली जजपा का तेवर भी युवा दुष्यंत चौटाला की अगुवाई में कम दिलचस्प नहीं है। बड़े से बड़े सियासी जानकार हरियाणा 
की तासीर समझने में भूल कर जाते हैं। यहाँ की माटी का अलग मोल है। भाजपा ने मनोहर लाल के ढेर सारे कामकाज के बावजूद आम जनमानस की फिजा को लहर में तब्दील करने के लिए धारा 370 की समाप्ति को अपना चुनावी खुराक बना लिया है। भाजपा राष्ट्रवाद
की पिच पर खुलकर खेल रही है। वहीं कांग्रेस ने इस मुद्दे पर यहाँ बिना कोई असहमति जताए स्थानीय मुद्दों और जातीय समीकरण के सहारे मनोहर लाल सरकार को घेरने की कोशिश की है। भूपेंद्र हुड्डा ने हरियाणा की  नब्ज समझकर पहले ही पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से अलग लाइन ले ली थी। उन्होंने धारा 370 समाप्त करने का न सिर्फ समर्थन किया था बल्कि इसका विरोध करने की वजह से अपने ही केंद्रीय नेतृत्व को खरी खोटी सुनाते हुए कहा था कि कांग्रेस अपनी राह से भटक गई है। फिलहाल आलाकमान ने मजबूरी में पार्टी को विघटन से बचाने के लिए उन्हें कमान सौंपी थी। हुड्डा को पता है कि ये उनके लिए करो या मरो का चुनाव है। लोकसभा में बुरी पराजय के बाद अगर विधानसभा में भी दुर्गति हुई तो उनकी पारी कांग्रेस में खत्म हो सकती है। साथ ही सूबाई राजनीति में उनकी सक्रिय प्रासंगिकता पर भी सवाल खड़ा हो जाएगा। हुड्डा यह बखूबी जानते हैं कि पार्टी में तमाम नेता इस चुनाव को उनके निपटने के चुनाव के रूप में देख रहे हैं। लिहाजा हुड्डा चुनाव में जितनी ताकत झोंक सकते हैं झोंक रहे हैं शायद किंग न बन पाए तो किंगमेकर की भूमिका नसीब हो जाये। और ये नौबत आई तो पर्दे के पीछे असली किंग भी वे बन सकते हैं। यही लड़ाई जननायक जनता पार्टी जेजेपी की भी लगती है। दुष्यंत फिलहाल उन्ही सीटों पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं जहां उनकी जीत की संभावना है। लेकिन उनकी बड़ी जीत फिलहाल ये नजर आ रही है कि उन्होंने खुद को मुकाबले में बनाये रखते हुए इनेलो को सत्ता की चर्चा से काफी दूर कर दिया है। यानी साफ है कि अगर वे अपनी जगह बना पाने में सफल हुए तो चौधरी देवीलाल की सियासत के असली वारिश वही साबित होंगे। लेकिन सियासी दांवपेंच में उनकी पार्टी किंगमेकर भी बन जाये तो इससे बड़ी उपलब्धि उनके लिए नही हो सकती। जजपा का पूरा अभियान इसी रणनीति के इर्द गिर्द नजर आ रहा है। मतदान का प्रतिशत, युवाओं का मूड और राष्ट्रवाद के प्रति जुनून पर आम हरियाणवीं का रुख सूबे की भावी सत्ता की दिशा तय करेगा। फिलहाल यही कह सकते हैं ये किंग बनाम किंगमेकर की लड़ाई है। -जय हिंद






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