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21/10/2019  :  12:35 HH:MM
संतान की दीर्घायु का पर्व है अहोई अष्टमी
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भारतीय सनातन धर्म की परंपरा में कुटुंब के विकास की सहज भावना संस्कृ ति के रूप में समाहित है। जिस तरह करवा चौथ सुहाग की रक्षा के लिए किया जाता है उसी तरह अहोई अष्‍टमी का व्रत संतान की सुख-समृद्धि एवं लंबी आयु के लिए रखा जाता हैं। किवदंती है कि जो भी महिला पूरे मन से इस व्रत को रखती है उसके बच्‍चे दीर्घायु होते हैं। अहोई अष्‍टमी के दिन माता पार्वती की पूजा का विधान है।

यह व्रत मुख्‍य रूप से उत्तर भारत की महिलाएं करती है। अहोई अष्‍टमी का व्रत करवा चौथ के चार दिन बाद और दीपावली से आठ दिन पहले अर्थात कार्तिक मास की कृष्‍ण पक्ष अष्‍टमी को होता है या जिस वार की दिपावली होती है तो उससे सात दिन पूर्व उसी वार को अहोई आठे के रूप मे त्योहार मनाया जाता है। इसे स्थानीय भाषा में ‘अहोई आठे’ भी कहा जाता है क्‍योंकि यह व्रत अष्टमी के दिन पड़ता है।अहोई शब्द अनहोई से रूपांतरित हुआ है। किसी भी अमंगल या अनिष्‍ट से अपने बच्‍चों की रक्षा करने के लिए महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं। यही नहीं संतान की कामना के लिए भी यह व्रत रखा जाता है। इस दिन महिलाएं कठोर व्रत रखती हैं और पूरे दिन पानी की बूंद भी ग्रहण नहीं करती हैं। दिन भर के वत्र के बाद शाम को तारो ं को अघय्र्‍ दिया जाता ह।ै मान्‍यता है कि इस व्रत के प्रताप से बच्‍चों की रक्षा होती हैं, साथ ही इस व्रत को संतान प्राह्रश्व‍ति के लिए सर्वोत्‍तम माना गया है। 

अहोई अष्‍टमी की पूजा विधि इस प्रकार हैं : अहोई अष्‍टमी के दिन सबसे पहले स्‍नान कर स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करके सर्वप्रथम घर के मंदिर में पूजा के लिए बैठें और व्रत का संकल्‍प लें तत्पश्चात दीवार पर गेरू और चावल से अहोई माता यानी कि मां पार्वती और स्‍याहु व उसके सात पुत्रों का चित्र बनाएं, फिर मां पार्वती के चित्र के सामने चावल से भरा हुआ कटोरा, मूली, सिंघाड़े और दीपक रखें। अब एक लोटे में पानी रखें और उसके ऊपर करवा रखें। इस करवे में भी पानी होना चाहिए।ध्‍यान रहे कि यह करवा कोई दूसरा नहीं बल्‍कि करवा चौथ में इस्‍तेमाल किया गया होना चाहिए। दीपावली के दिन इस करवे के पानी का छिडक़ाव पूरे घर में किया जाता है। अब हाथ में चावल लेकर अहोई अष्‍टमी व्रत कथा पढऩे के बाद आरती उतारें। कथा पढऩे के बाद हाथ में रखे हुए चावलों को दुपट्टे या साड़ी के पल्‍लू में बांध लें। शाम के समय दीवार पर बनाए गए चित्रों की पूजा करें और अहोई माता को 14 पूरियों, आठ पुओं और खीर का भोग लगाएं। अब माता अहोई को लाल रंग के फूल चढ़ाएं।अहोई अष्‍टमी व्रत की कथा पढ़ें। अब लोटे के पानी और चावलों से तारों को अघ्र्य दें। अब बायना में 14 पूरियां या मठरी और काजू इत्यादि प्रसाद रखकर चुनरी की ओट दिखाकर निकाले और रोली के द्वारा चीर्च दे अर्थात तिलक की परंपरा के रूप मे दुर्वा से रोली के छीटें थाली के पास दे दे। इस बायने को घर की बड़ी स्‍त्री को सम्‍मानपूर्वक दें। पूजा के बाद सास
या घर की बड़ी महिला के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लें। अब घर के सदस्‍यों में प्रसाद बांटने के बाद अन्‍न-जल ग्रहण करें। अहोई अष्‍टमी की कथा इस प्रकार है।

पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार प्राचीन काल में एक साहुकार था, जिसके सात बेटे और सात बहुएं थीं। साहुकार की एक बेटी भी थी जो दीपावली में ससुराल से मायके आई थी। दीपावली पर घर को लीपने के लिए सातों बहुएं मिट्टी लाने जंगल में गईं तो ननद भी उनके साथ
चली गई। साहुकार की बेटी जहां मिट्टी काट रही थी उस स्थान पर स्याहु (साही) अपने सात बेटों से साथ रहती थी। मिट्टी काटते हुए गलती से साहूकार की बेटी की खुरपी की चोट से स्याहू का एक बच्चा मर गया। स्याहू इस पर क्रोधित होकर बोली, "मैं तुम्हारी कोख बांधूंगी"
स्याहू के वचन सुनकर साहूकार की बेटी अपनी सातों भाभियों से एक-एक कर विनती करती रही कि वह उसके बदले अपनी कोख बंधवा लें। सबसे छोटी भाभी ननद के बदले अपनी कोख बंधवाने के लिए तैयार हो जाती है। इसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चे होते हैं वे सात दिन बाद मर जात े ह।ंै सात पत्र्ु ाो ं की इस पक्र ार मृत्य ु होन े के बाद उसन े पंडित को बुलवाकर इसका कारण पूछा। पंडित ने सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी। सुरही सेवा से प्रसन्न होती है और उसे स्याहु के पास ले जाती है। रास्ते में थक जाने पर दोनों आराम करने लगते हैं। अचानक साहुकार की छोटी बहू देखती है कि एक सांप गरुड़ पंखनी के बच्चे को डंसने जा रहा है और वह सांप को मार देती है। इतने में गरुड़ पंखनी वहां आ जाती है और खून बिखरा हुआ देखकर उसे लगता है कि छोटी बहू ने उसके बच्चे के मार दिया है. इस पर वह छोटी बहू को चोंच मारना शुरू कर देती है। छोटी बहू इस पर कहती है कि उसने तो उसके बच्चे की जान बचाई है। गरुड़ पंखनी इस पर खुश होती है और सुरही सहित उन्हें स्याहु के पास पहचुं ा दते ी ह।ै वहा ं स्याह ु छोटी बह ू की सवे ा स े पस्र न्न होकर उस े सात पुत्र और सात बहू होने का अशीर्वाद देती है। स्याहु के आशीर्वाद से छोटी बहू का घर पुत्र और पुत्र वधुओं से हरा-भरा हो जाता है। कथानक का आशय आज के परिप्रेक्ष्य में यहीं है कि मां अपनी संतान की सुख-समृद्धि और उसकी रक्षा के लिए कुछ भी कर सकती है। आज फादर्स डे मदर्स डे के आधुनिक युग में आने वाली पीढ़ी को पता होना चाहिए कि हमारी सनातन परंपरा मे भी सब के अभ्युत्थान के लिए कोई न कोई तिथि निर्धारित है। इन कथाओं को वर्तमान सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में जानना और समझना चाहिए।






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