समाचार ब्यूरो
29/10/2019  :  10:51 HH:MM
कब मुक्त होगी पुलिस
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पुलिस महानिदेशकों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव से संबंधित पांच राज्यों द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने काफी पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि पुलिस-प्रशासन का राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होना जरूरी है। मगर ऐसा आज तक नहीं हो पाया है।

मौजूदा दौर में भारतीय पुलिस अतिशय राजनीतिक दबाव में है। यहां तक कि विभागीय कामकाज पर भी अब राजनीतिक दबाव देखने को मिलता रहता है। नियुक्तियों एवं स्थानांतरण में तो विशेष रूप से। कहीं-कहीं तो स्थिति इतनी विकट है कि पुलिसकर्मियों की पहचान पुलिस विभाग के कर्मठ अधिकारी के रूप में नहीं बल्कि मंत्रियों के ‘आदमियों’ के रूप में की जाती है। अतएव समस्त राजनीतिक दल अपने निजी स्वार्थों के चलते ही पुलिस प्रशासन को एक स्वायत्त संस्था नहीं बनने देना चाहते। वह यह कतई नहीं चाहते हैं कि जिस पुलिस का इस्तेमाल वे अपना हित साधने के लिए करते हैं वह स्वायत्त हो। बात भले ही कड़वी लगे मगर हकीकत यही है कि नेता पुलिस की ताकत को अपने हाथ से नहीं निकलने देना चाहते। ऐसे कई सवाल हैं जो कि पुलिस को लेकर हमारे मन में उठते हैं। क्या यह वाकई आम लोगों की पुलिस है या नेताओं की? अब आम आदमी के दिमाग में पुलिस की छवि सिर्फ नेताओं को हिफाजत देने वाले की बन गई है। साफ है ऐसी स्थिति में पुलिस स्वायत्तता पर गौर करना आवश्यक है। भारतीय पुलिस स्वतंत्रता के संदर्भ में हमें पश्चिमी देशों से प्रेरणा लेनी चाहिए जहां पर पुलिस तंत्र को स्वतंत्र निष्पक्ष व जनसहयोगी बनाने पर विशेष बल दिया गया है और उसके अनुरूप सुधार भी किए गए हैं। वहां की पुलिस का स्वरूप ऐसा बनाया गया है कि शासन प्रशासन में पर्याप्त दखल रखने वाले भी पुलिस के कार्यों से घबराते हैं। यही कारण है कि वहां की पुलिस राजनीतिक व नौकरशाही के दबाव से मुक्त होकर निष्पक्ष एवं स्वतंत्र रूप से काम कर रही है। हमारे यहां स्थिति इससे बिल्कुल उलट है।

भारत में बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण पुलिस की किरकिरी बढ़ी है और उसकी निष्पक्ष छवि नहीं बन पा रही है। यही कारण है कि आज देश में पुलिस सुधार की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। पुलिस की भूमिका यदि प्रभावी और दबावमुक्त नहीं है तो अराजकता तो बढ़ती ही है साथ ही विकास पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यह आवश्यक है कि पुलिस व्यवस्था में ढांचागत सुधार किया जाए व पुलिस की कार्यशैली को दबावमुक्त बनाने के लिए उसे स्वायत्तता प्रदान की जाए। बहरहाल वर्तमान पुलिस तंत्र में व्यापक सुधार करना सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है। आजादी के सात दशक के बाद भी हमारे देश में अंगे्रजों के समय की 150 साल पुरानी पुलिस व्यवस्था लागू है। अगर इतिहास में झांककर देखें तो पता चलता है पुलिस आज भी 1861 ई. में गोरों द्वारा बनाए गए पुलिस अधिनियम के माध्यम से संचालित होती है। पुलिस प्रशासन का मूल कार्य समाज में अपराध को रोकना एवं कानून व्यवस्था को कायम रखना होता है। ब्रिटिश हुकूमत ने वर्ष 1861 के पुलिस अधिनियम का निर्माण तो भारतीयों के दमन एवं शोषण के मूल उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए किया था। तो दमनकारी एवं शोषणकारी पुलिस अधिनियम के राह पर चलने वाली पुलिस व्यवस्था से आखिर स्वच्छ छवि की परिकल्पना कैसे की जा सकती है? इसी कारण से समाज में पुलिस का चेहरा बदनाम हुआ है। आज समाज के लोगों में क्रूर एवं आराधिक किस्म की पुलिस का चेहरा समा गया है।

ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जिस दिन पुलिसकर्मियों की क्रूर व काली करतूतें पढने या फिर सुनने को न मिलें। दरअसल इसमें पूरी तरह का दोषी इन पुलिसकर्मियों को नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि इन सभी के अंदर भी शोषण एवं दु:ख की एक कहानी दबी हुई होती है। क्रूर एवं निर्दयी पुलिस के दिल की बात जानने पर हमें यह पता चलता है कि वह आखिर ऐसी क्यों बनी? पुलिस वाले भी तो समाज के ही अंग होते हैं। उन्हें भी घूमने टहलने एवं घर परिवार वालों के साथ समय बिताने की इच्छा होती है और इसके लिए उन्हें फुर्सत तो मिल ही नहीं पाती। मिले भी कहां से जब उनसे 18-20 घंटे की नौकरी कराई जाती है। हालांकि, मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार ने पुलिस कर्मियों के साप्ताहिक अवकाश का निर्णय लिया है, जिसे पुलिस के साथ समाज के विभिन्न वर्गों ने सराहा है, लेकिन जरूरत इसे समग्र रूप में लेने की है। मनोविज्ञान यह कहता है कि लगातार काम करने से व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है और अपने मन की खुन्नस दूसरों पर उतारने पर उतारू हो जाता है। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए आज देश में पुलिस सुधार की अतिशय आवश्यकता महसूस हो रही है। ऐसा नहीं है कि इस व्यवस्था को बदलने की कोशिश नहीं की गई है। आजादी से लेकर आज तक पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए न जाने कितनी समितियां एवं आयोग गठित किए गए और न जाने कितनी रिपोर्ट सौंपी गईं लेकिन अमल के स्तर पर नतीजा सिफर ही साबित हुआ। अभी तक जितने भी प्रयास किए गए हैं, उनमें राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव देखा गया है। पुलिस सुधार के लिए कई समितियों और आयोगों का गठन किया गया और इन सबने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी पर उन पर कोई अमल ही नहीं किया। 1996 में पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह और एनके सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल लगाकर यह अनुरोध किया था कि केंद्र एवं राज्य सरकारें 1979 के राष्ट्रीय पुलिस आयोग (एनपीसी) रिपोर्ट को लागू करें। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1998 में पूर्व पुलिस अधिकारी रिबेरो कमेटी गठित कर दी और उसने अपनी रिपोर्ट 1999 में दे दी। इसके बाद पद्मनभैया कमेटी का गठन किया गया, जिसने वर्ष 2000 में रिपोर्ट दी। यह सही है कि कानून व्यवस्था राज्य सूची में होने के कारण ज्यादातर पुलिस राज्य सरकारों के अधीन होती है और राज्यों में पुलिस व्यवस्था पर पूरी तरह राजनीतिक प्रभाव होता है। राज्य में जैसी सरकार होगी वैसी ही उसकी पुलिस भी होगी। आज ऐसी पुलिस की आवश्यकता है जो राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त हो तथा जनतांत्रिक हो।






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